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इलेक्ट्रिक कारों की वैश्विक रेस में अमेरिका पिछड़ा या उसने सच्चाई पहले समझ ली?

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वॉशिंगटन डी.सी. / नई दिल्ली  5 अक्टूबर 2025

 बैटरी, बाजार और भविष्य की असली लड़ाई पर गहराई से विश्लेषण

दुनिया आज एक नई औद्योगिक क्रांति के दौर से गुजर रही है — ऊर्जा की, और उसके केंद्र में है इलेक्ट्रिक वाहन (EV)। चीन, यूरोप और दक्षिण कोरिया इस दौड़ में तेजी से आगे बढ़ चुके हैं। वहीं अमेरिका, जो कभी ऑटोमोबाइल उद्योग का धुरंधर हुआ करता था, अब पीछे छूटता दिख रहा है। लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि अमेरिका पिछड़ गया — असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका वाकई पिछड़ा, या उसने उस सच्चाई को पहले पहचान लिया जिसे बाकी दुनिया अभी नज़रअंदाज़ कर रही है?

वैश्विक दौड़: चीन की रफ्तार, यूरोप की नीति, और अमेरिका की हिचकिचाहट

पिछले पांच वर्षों में चीन ने इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति को सरकारी नीति, सब्सिडी, और विनिर्माण क्षमता के सहारे एक विशाल औद्योगिक अभियान में बदल दिया है। बीवाईडी (BYD) जैसी कंपनियाँ न सिर्फ घरेलू बाजार में बल्कि वैश्विक स्तर पर टेस्ला जैसी अमेरिकी कंपनियों को चुनौती दे रही हैं। यूरोप ने भी ग्रीन डील और कार्बन उत्सर्जन के नियमों के माध्यम से EV को अपनाने को मजबूती दी।

इसके विपरीत, अमेरिका की EV नीति कभी स्थायी नहीं रही। Inflation Reduction Act (IRA) के तहत दी जाने वाली टैक्स छूटें, बैटरी के स्रोत और असेंबली लोकेशन की शर्तों में उलझ गईं। परिणाम यह हुआ कि अमेरिकी उपभोक्ता भ्रमित हैं — क्या खरीदें, किसे चुनें, और क्या सब्सिडी वाकई मिलेगी या नहीं।

इसी बीच, चीन के पास EV बैटरियों का 70% उत्पादन नियंत्रण है, जबकि अमेरिका अभी भी अपनी बैटरी सप्लाई चेन के लिए एशियाई देशों पर निर्भर है। यही कारण है कि कई अमेरिकी ऑटो निर्माता, जैसे फोर्ड और जनरल मोटर्स, लागत और तकनीक दोनों में चीनी प्रतिस्पर्धा से पिछड़ रहे हैं।

क्या बैटरी उतनी स्वच्छ है जितना प्रचार किया गया है? — अमेरिकी शंका का तर्क

अमेरिकी वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के एक वर्ग का मानना है कि अमेरिका का “धीमी चाल” अपनाना एक रणनीतिक और पर्यावरणीय सोच से प्रेरित है। उनका कहना है कि बैटरी क्रांति का ग्लैमर असलियत से बहुत अलग है।

लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसी धातुओं की भारी खपत ने खनन के नए संकट पैदा कर दिए हैं — अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया में इन खदानों से न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है बल्कि स्थानीय समुदायों के अधिकार और स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ा है।

बैटरियों का उत्पादन अत्यधिक ऊर्जा-गहन है, और यदि यह ऊर्जा कोयले या गैस से आती है, तो पूरा उद्देश्य ही धुंधला हो जाता है। नेशनल रिन्यूएबल एनर्जी लैबोरेटरी (NREL) की रिपोर्ट कहती है कि “एक औसत EV बैटरी बनाने में उतना ही कार्बन उत्सर्जन होता है जितना एक पारंपरिक पेट्रोल कार को 3 से 5 साल चलाने में होता।”

अमेरिका के कुछ नीति विशेषज्ञों का मानना है कि EV उद्योग का यह उन्माद असल में “ग्रीनवॉशिंग” (Greenwashing) है — यानी पर्यावरण के नाम पर प्रदूषण को नए रूप में पेश करना। तर्क है कि अमेरिका केवल “देर” नहीं कर रहा, बल्कि “सोच-समझकर कदम उठा रहा है।”

आर्थिक गणित: अमेरिकी उपभोक्ता का भरोसा क्यों नहीं बन पाया?

EV उद्योग में चीन का मॉडल “सस्ता बनाओ, जल्दी बेचो” है, जबकि अमेरिका का मॉडल “नवाचार पर भरोसा करो” रहा है। लेकिन जब नवाचार और मूल्य दोनों का संतुलन बिगड़ता है, तो उपभोक्ता हिचकिचाने लगते हैं। अमेरिका में औसत EV की कीमत अभी भी 47,000 डॉलर से ऊपर है, जबकि चीनी EV बाजार में 20,000 डॉलर से नीचे के दर्जनों मॉडल मौजूद हैं।

इसके अलावा, अमेरिका का चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर अभी भी असमान और अधूरा है। ग्रामीण इलाकों में एक चार्जिंग स्टेशन ढूंढ़ना किसी लक्ज़री सुविधा जैसा है। नतीजा यह है कि अमेरिकी उपभोक्ता अभी भी “रेंज एंग्ज़ायटी” (range anxiety) से जूझ रहे हैं — यानी बैटरी खत्म होने के डर से लंबी दूरी तय करने में झिझकते हैं।

 क्या अमेरिका ने रफ्तार धीमी रखकर सही किया?

कई ऊर्जा विश्लेषक मानते हैं कि अमेरिका ने EV दौड़ में धीमा चलने का फैसला इसलिए लिया है क्योंकि वह “अगले टेक्नोलॉजिकल चरण” पर दांव लगा रहा है — हाइड्रोजन फ्यूल सेल, सॉलिड-स्टेट बैटरियाँ, और सिंथेटिक फ्यूल जैसी तकनीकें जो बैटरियों की मौजूदा सीमाओं को खत्म कर सकती हैं।

अमेरिकी रक्षा और ऊर्जा विभाग की कई परियोजनाएँ इस दिशा में काम कर रही हैं जहाँ ऊर्जा दक्षता, पुनर्चक्रण और स्थायित्व को केंद्र में रखा गया है। रणनीति “धीमी लेकिन टिकाऊ” प्रतीत होती है — जैसे कोई मैराथन धावक, जो स्प्रिंटर्स को शुरुआत में आगे निकल जाने देता है, लेकिन अंतिम मोड़ पर उन्हें पीछे छोड़ देता है।

 अमेरिका पिछड़ा नहीं, बल्कि सोच-समझकर चल रहा है

दुनिया भले ही आज चीन की EV क्रांति को ग्रीन मॉडल कह रही हो, पर अमेरिका शायद यह बेहतर समझ चुका है कि यह तकनीक उतनी भी निर्दोष नहीं जितना उसका प्रचार है। वह यह भी जानता है कि पर्यावरण की असली जंग बैटरी से नहीं, बुद्धिमान ऊर्जा नीति और सतत् तकनीक से जीती जाएगी। शायद यही कारण है कि अमेरिका फिलहाल EV रेस की भीड़ में नहीं दौड़ रहा — वह अपनी दिशा खुद तय कर रहा है। इतिहास बताता है कि जब अमेरिका किसी दौड़ में देर से आता है, तो अक्सर वह उस दौड़ का नया नियम तय कर देता है।

 

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