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धामी का वादा या VIP की ढाल? CBI जांच और दुष्यंत गौतम की कॉल डिटेल पर सरकार की अग्निपरीक्षा

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शैलेन्द्र नेगी | देहरादून 7 जनवरी 2026

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का एक वाक्य—“अंकिता भंडारी के माता-पिता जो कहेंगे, वही करूंगा”—अब खुद सरकार के लिए सबसे बड़ी कसौटी बन गया है। मुख्यमंत्री के इस बयान के ठीक बाद अंकिता के पिता ने अपनी मांगें बेहद साफ शब्दों में सामने रख दी हैं। उनका कहना है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड की CBI जांच कराई जाए और इस मामले में कथित ‘VIP’ बताए जा रहे बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम समेत सभी आरोपियों की कॉल डिटेल सार्वजनिक की जाए। यह मांग सिर्फ भावनात्मक नहीं, तथ्यों और संदेहों पर आधारित बताई जा रही है।

अंकिता के पिता का कहना है कि 17 से 23 सितंबर 2022—यानी अंकिता के गायब होने, दबाव, हत्या और उसके बाद के घटनाक्रम से जुड़े सबसे निर्णायक दिन—आज भी कई सवालों के घेरे में हैं। उन्होंने साफ कहा है कि अगर सरकार और जांच एजेंसियों के पास छुपाने को कुछ नहीं है, तो इन दिनों की कॉल डिटेल सामने लाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। कॉल रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो सकता है कि उस वक्त किससे संपर्क किया गया, किन प्रभावशाली लोगों से बातचीत हुई और किन दबावों में फैसले लिए गए।

सरकार अब तक यह कहती रही है कि मामले में जांच पूरी हो चुकी है और दोषियों को सजा भी मिल चुकी है। लेकिन पीड़ित परिवार का दर्द और सवाल यहीं खत्म नहीं होते। उनका तर्क है कि सजा पाए आरोपी सिर्फ ज़मीन पर दिखाई देने वाले चेहरे हैं, जबकि असली ताकतवर और प्रभावशाली लोग अब भी परदे के पीछे सुरक्षित बैठे हो सकते हैं। इसी वजह से परिवार बार-बार कह रहा है कि CBI जैसी स्वतंत्र एजेंसी ही इस मामले की निष्पक्ष जांच कर सकती है।

यह मामला अब सिर्फ न्यायिक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और नैतिक सवाल भी बन चुका है। मुख्यमंत्री धामी का बयान उम्मीद की तरह लिया गया था, लेकिन अब वही बयान सरकार के लिए परीक्षा बन गया है। सवाल साफ है—क्या मुख्यमंत्री अपने शब्दों पर कायम रहेंगे? क्या वह अंकिता के पिता की मांग मानकर CBI जांच और कॉल डिटेल सार्वजनिक करने का फैसला लेंगे, या फिर सरकार अपने पुराने रुख पर कायम रहेगी?

सबसे बड़ा सवाल ‘VIP’ एंगल को लेकर है। पीड़ित परिवार का कहना है कि बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम का नाम जिस तरह सामने आया, उसे सिर्फ बयान कहकर टाला नहीं जा सकता। उनका कहना है कि अगर नाम निराधार है, तो कॉल डिटेल ही सबसे बड़ा सबूत बन सकती है, जो सब कुछ साफ कर देगी। लेकिन अगर इस मांग को नजरअंदाज किया गया, तो शक और गहराता जाएगा।

आज अंकिता भंडारी का मामला सत्ता बनाम सच की लड़ाई में बदल चुका है। यह सिर्फ एक बेटी के लिए न्याय की मांग नहीं, बल्कि यह देखने की घड़ी है कि सरकार अपने ही वादे को निभाती है या नहीं। उत्तराखंड ही नहीं, पूरा देश देख रहा है कि क्या मुख्यमंत्री धामी अंकिता को न्याय दिलाने के लिए कठोर फैसला लेंगे, या फिर सवालों के घेरे में आए ‘VIP’ को बचाने की राजनीति हावी होगी।

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