एबीसी डेस्क 27 दिसंबर 2025
हरियाणा के गुरुग्राम जिले के टीकली गांव में चर्च निर्माण का मामला अब सिर्फ स्थानीय विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, निजी संपत्ति के अधिकार और कानून के पालन पर बड़ा सवाल बनता जा रहा है। आरोप है कि ईसाई समुदाय ने दो एकड़ की निजी जमीन पूरी तरह कानूनी तरीके से खरीदी, राज्य सरकार के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से भूमि उपयोग परिवर्तन (CLU) की अनुमति भी ली, इसके बावजूद चर्च का निर्माण इसलिए रोका जा रहा है क्योंकि बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) जैसे दक्षिणपंथी संगठन वहां चर्च नहीं चाहते।
शुक्रवार को टीकली और आसपास के गांवों से आए लोगों ने एक महापंचायत आयोजित की, जिसमें बजरंग दल और VHP से जुड़े नेता भी शामिल हुए। इस महापंचायत में चर्च निर्माण के खिलाफ खुलकर विरोध दर्ज कराया गया। ग्रामीणों की ओर से आशंका जताई गई कि चर्च धार्मिक गतिविधियों और कथित धर्मांतरण का केंद्र बन सकता है, जबकि इस दावे के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं रखा गया।
दूसरी ओर, इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू यह है कि चर्च का निर्माण किसी सरकारी या विवादित जमीन पर नहीं, बल्कि निजी भूमि पर किया जा रहा है, और वह भी सभी कानूनी अनुमतियों के साथ। इसके बावजूद निर्माण को लेकर माहौल इस कदर दबावपूर्ण बना दिया गया कि सवाल उठने लगे हैं—क्या किसी समुदाय को सिर्फ इसलिए अपने धार्मिक स्थल से वंचित किया जा सकता है क्योंकि कुछ संगठन उसका विरोध कर रहे हैं?
महापंचायत में यह भी कहा गया कि पहले गांव को आश्वासन दिया गया था कि चर्च नहीं बनेगा, लेकिन बाद में सीएलयू की अनुमति लेकर निर्माण शुरू कर दिया गया। वहीं, ईसाई समुदाय के लोगों का कहना है कि जब सरकार की ओर से वैध अनुमति मिल चुकी है, तो स्थानीय दबाव के आधार पर निर्माण रोकना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।
महापंचायत के बाद 52 सदस्यों की एक समिति बनाई गई है, जो सोमवार को जिला उपायुक्त से मुलाकात करेगी और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपेगी। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में चर्च निर्माण कराने वाले पक्ष से कोई आधिकारिक बातचीत या सार्वजनिक संवाद अब तक सामने नहीं आया है।
यह मामला अब सिर्फ एक गांव या एक इमारत का नहीं रहा। यह उस सवाल से जुड़ गया है कि क्या भारत में अल्पसंख्यक समुदाय कानून के दायरे में रहते हुए भी अपने धार्मिक अधिकारों का इस्तेमाल कर पाएंगे, या फिर सड़क की ताकत और संगठनों का दबाव संविधान से ऊपर साबित होगा। अब नजर प्रशासन और सरकार पर है—कि वे कानून के साथ खड़े होते हैं या दबाव की राजनीति के आगे झुकते हैं।




