एबीसी नेशनल न्यूज | 16 जनवरी 2026
रात के ठीक ढाई बजे थे। शहर गहरी नींद में था, लेकिन भूख और मोबाइल ऐप की घंटी जाग रही थी। Zomato का एक डिलीवरी बॉय लंबी दूरी तय कर ग्राहक के घर पहुंचा। नीचे खड़े होकर उसने शालीनता से फोन किया—“सर, नीचे आ जाइए।” दूसरी तरफ से जवाब आया—“पैसे नहीं ले रहे क्या? ऑर्डर ऊपर देकर जाओ।” डिलीवरी बॉय ने अपनी मजबूरी बताई। बाइक नीचे खड़ी थी, वक्त आधी रात का था और चोरी का डर भी। उसने फिर विनम्र लहजे में आग्रह किया कि ग्राहक नीचे आ जाए। लेकिन संवेदनशीलता की जगह अहंकार हावी रहा। ग्राहक ने साफ शब्दों में कहा—“तो फिर ऑर्डर कैंसिल कर दो।”
डिलीवरी बॉय ने आखिरी बार इंसानियत की अपील की—“सर, इतनी दूर से रात के ढाई बजे आया हूं, आप नीचे तक नहीं आ सकते?” मगर सामने वाला नहीं पिघला। आखिरकार गुस्से, थकान और बेबसी के बीच ऑर्डर कैंसिल कर दिया गया।
इसके बाद जो हुआ, वह सोशल मीडिया की भाषा में एक “मूक विरोध” बन गया। डिलीवरी बॉय ने वहीं खड़े-खड़े पैकेट खोला—पहले गुलाब जामुन खाए और फिर बिरयानी। न कोई हंगामा, न कोई गाली। बस एक थका हुआ आदमी, जिसने तय किया कि अपनी मेहनत का अपमान वह अब चुपचाप नहीं सहेगा।
यह घटना सिर्फ एक डिलीवरी विवाद नहीं है, बल्कि गिग वर्कर्स की रोज़मर्रा की सच्चाई को उजागर करती है। कुछ दिन पहले ही डिलीवरी कर्मचारी कम मेहनताना, असुरक्षित कामकाज और कंपनियों के दबाव के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे। लेकिन यह मामला बताता है कि संघर्ष सिर्फ कंपनियों से नहीं, बल्कि उन ग्राहकों से भी है जो डिलीवरी करने वालों को इंसान नहीं, मशीन समझते हैं।
रात में काम करने वाला हर डिलीवरी बॉय किसी का बेटा, भाई या पिता है। वह सुविधा देता है, एहसान नहीं मांगता। नीचे आकर ऑर्डर लेना कोई अपमान नहीं, बल्कि बुनियादी शिष्टाचार है। शायद अब वक्त आ गया है कि ऐसे असंवेदनशील ग्राहकों के खिलाफ भी सामूहिक रूप से आवाज उठाई जाए—ताकि उन्हें याद दिलाया जा सके कि हम भी इंसान हैं। थोड़ा तमीज सीखिए, थोड़ा संवेदनशील बनिए।




