कुमार गणेश । हैदराबाद 10 दिसंबर 2025
तिरुपति बालाजी जैसे देश के सबसे पवित्र और भरोसेमंद मंदिर में एक के बाद एक घोटालों का खुलासा होना करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं पर सीधा प्रहार है। पहले प्रसाद में इस्तेमाल होने वाले घी में मिलावट का मामला सामने आया, और अब 54 करोड़ रुपये का ‘नकली शॉल घोटाला’ पूरे देश में हड़कंप मचा रहा है। मंदिर प्रशासन को जो 100% सिल्क की पवित्र शॉलें दी जा रही थीं, वे असल में सस्ती पॉलिस्टर की बनी नकली शॉलें थीं। यानी आस्था के नाम पर खुला धोखा, भावनाओं के नाम पर खुली लूट।
इस घोटाले की शुरुआत तब सामने आई जब मंदिर प्रबंधन को कुछ शॉलों की गुणवत्ता पर संदेह हुआ। जांच में पता चला कि जिस कंपनी को मंदिर के लिए उच्च गुणवत्ता वाली शुद्ध रेशम की शॉलें सप्लाई करने का जिम्मा दिया गया था, उसी कंपनी ने पॉलिस्टर को सिल्क बताकर करोड़ों रुपये का बिल थमा दिया। श्रद्धालुओं को चढ़ाने और प्रसाद स्वरूप दी जाने वाली इन शॉलों का महत्व सिर्फ कपड़े का नहीं, बल्कि आस्था का होता है। लेकिन घोटालेबाजों ने इसे भी कमाई का आसान रास्ता समझकर मंदिर की मर्यादा और भक्तों की भक्ति दोनों को ठेस पहुंचाई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल को बेहद सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। सप्लाई के लिए दिया गया टेंडर, उसके बाद क्वालिटी चेक में मिली छूट, निरीक्षण में की गई लापरवाही—सब कुछ इस तरह सेट था कि नकली माल मंदिर तक पहुंच सके। जबतक कोई आवाज उठाता, तबतक 54 करोड़ रुपये की भारी-भरकम धोखाधड़ी हो चुकी थी। यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों के विश्वास पर किया गया सबसे बड़ा हमला है।
तिरुपति बालाजी मंदिर देश का सबसे धनी और प्रतिष्ठित धार्मिक स्थल माना जाता है। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु सिर झुकाते हैं, अपने मन की इच्छा पूरी होने की दुआ मांगते हैं और विश्वास की पोटली लेकर घर लौटते हैं। लेकिन जब ऐसे पवित्र स्थान पर नकली घी और अब नकली शॉल जैसे घोटाले सामने आते हैं, तो लोगों की आस्था भी सवालों के घेरे में पड़ जाती है। आखिर भक्त किस पर भरोसा करें? किसे अपना अर्पण सौंपें? किससे उम्मीद रखें कि उनकी श्रद्धा के साथ खिलवाड़ नहीं होगा?
इस घोटाले ने मंदिर प्रशासन की कार्यप्रणाली को भी कठघरे में ला खड़ा किया है। सवाल उठ रहा है—क्या इतनी बड़ी धोखाधड़ी बिना मिलीभगत के संभव है? क्या निरीक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी सो रहे थे या जानबूझकर आंखें बंद किए बैठे थे? श्रद्धा के नाम पर चल रही इस लूट में अंदर तक कोई न कोई गहरी साजिश का संकेत दिख रहा है, जिसकी परतें अभी खुलना बाकी हैं।
फिलहाल जांच शुरू हो चुकी है और जिम्मेदार लोगों को चिन्हित किया जा रहा है। लेकिन यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि जब धर्म के केंद्रों में ही भ्रष्टाचार दस्तक देने लगे, तो यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं होता—यह समाज की आत्मा पर सीधा वार होता है। श्रद्धालु अपने विश्वास को लेकर मंदिर आते हैं, और बदले में अगर उन्हें धोखा मिले, तो यह किसी भी संस्था के लिए सबसे बड़ा कलंक है।
तिरुपति का यह नया ‘शॉल घोटाला’ पूरे देश की आंखें खोलने वाला मामला है। अब समय आ गया है कि धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता और सख्त निगरानी सुनिश्चित की जाए। क्योंकि आस्था की रक्षा करने में असफल होना—किसी भी घोटाले से बड़ा अपराध है।




