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13 दिसंबर 2001: संसद हमला, ताबूत घोटाला और बदला हुआ राष्ट्रवादी विमर्श—क्या यह महज़ संयोग था या सोची-समझी क्रोनोलॉजी?

एबीसी डेस्क 13 दिसंबर 2025

नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 13 दिसंबर 2001 की तारीख एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है, जिसने न सिर्फ सुरक्षा और राष्ट्रवाद की बहस को नई दिशा दी, बल्कि उस समय संसद में उठने वाले कई गंभीर सवालों और घोटालों को भी हाशिये पर धकेल दिया। इसी दिन संसद पर आतंकी हमला हुआ और उसी दिन संसद में जिन मुद्दों पर चर्चा होनी थी, उनमें कुख्यात ‘ताबूत घोटाला’ भी शामिल था। लेकिन हमले के बाद पूरा राष्ट्रीय विमर्श अचानक बदल गया—भ्रष्टाचार, जवाबदेही और सरकार से सवाल पूछने की जगह ‘राष्ट्रवाद’ और ‘सुरक्षा’ चर्चा का केंद्र बन गए।

संसद पर हमले के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे “आर या पार की लड़ाई” करार दिया। इसके बाद ‘ऑपरेशन पराक्रम’ की घोषणा हुई और भारतीय सेना ने बड़े पैमाने पर सीमावर्ती इलाकों की ओर कूच किया। देश में युद्ध जैसे हालात बन गए, मीडिया में राष्ट्रवादी उफान चरम पर था और हर असहमति या सवाल को संदेह की निगाह से देखा जाने लगा। लेकिन आज भी यह सवाल अनुत्तरित है कि ‘ऑपरेशन पराक्रम’ आखिर क्यों शुरू हुआ और उसका ठोस रणनीतिक उद्देश्य क्या था, जब अंततः युद्ध हुआ ही नहीं।

इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम लेकिन कम चर्चित पहलू तब सामने आता है, जब यह पता चलता है कि जैसे ही भारतीय सेनाएं निर्णायक स्थिति के करीब पहुंच रही थीं, उस समय प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा ने अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कोंडोलीज़ा राइस से संपर्क किया। खुद कोंडोलीज़ा राइस ने अपनी किताब ‘No Higher Honour’ में इस बात का उल्लेख किया है कि उनसे पाकिस्तान को ‘एस्केलेशन’ न करने के लिए कहने और मध्यस्थता करने का अनुरोध किया गया था। यानी ज़मीन पर युद्ध जैसी स्थिति और सार्वजनिक तौर पर ‘आर-पार’ की भाषा के बीच, कूटनीतिक स्तर पर तस्वीर कुछ और ही थी।

इन तथ्यों के मद्देनज़र यह सवाल और गहरा हो जाता है कि 13 दिसंबर 2001 के बाद देश के राजनीतिक एजेंडे में आए अचानक बदलाव को कैसे देखा जाए। जिस दिन संसद में ‘ताबूत घोटाले’ जैसे संवेदनशील मुद्दे उठने थे, उसी दिन ऐसा हमला हुआ, जिसने पूरी बहस को पलट कर रख दिया। इसके बाद वे मुद्दे, जिन पर सरकार से जवाब मांगा जाना था, धीरे-धीरे पीछे चले गए और फिर कभी उसी तीव्रता से सामने नहीं आए।

आज के दौर में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं दिखती। जैसे ही कोई बड़ा राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक मुद्दा चर्चा में आता है, अचानक हेडलाइंस बदल जाती हैं। और जब उससे भी बड़ी कोई हिंसक या सनसनीखेज घटना हो जाती है, तो पहले वाला मुद्दा पूरी तरह गायब हो जाता है। सवाल यह है कि क्या यह सब केवल संयोग है, या फिर बार-बार दोहराया जाने वाला एक पैटर्न—एक तयशुदा क्रोनोलॉजी?

कांग्रेस का यह स्पष्ट कहना रहा है कि उसने कभी संयोग और प्रयोग की ओछी राजनीति नहीं की। लेकिन जो लोग हर बार इन घटनाओं को महज़ ‘संयोग’ बताकर टाल देते हैं, उनसे अब यही कहा जा रहा है—“क्रोनोलॉजी समझिए।” क्योंकि जब बार-बार सवालों से ध्यान हटता है, विमर्श बदलता है और जवाबदेही पीछे छूट जाती है, तो लोकतंत्र में सवाल उठना न सिर्फ ज़रूरी, बल्कि अनिवार्य हो जाता है।

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