राष्ट्रीय | अरिंदम बनर्जी | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 12 मई 2026
पश्चिम बंगाल में शिवेंदु अधिकारी सरकार की नई “अन्नपूर्णा भंडार योजना” अब बड़े राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गई है। आरोप है कि जिन महिलाओं का नाम SIR प्रक्रिया में लंबित है या जिनके वोटर दस्तावेजों पर जांच चल रही है, उन्हें सरकारी लाभ से वंचित किया जा सकता है। इस फैसले को लेकर विपक्ष ने सरकार पर लोकतंत्र और गरीब महिलाओं के अधिकारों पर हमला करने का आरोप लगाया है।
विपक्षी नेताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि पहले कथित तौर पर “मनमाने ढंग” से वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई और अब उसी आधार पर महिलाओं को सरकारी योजनाओं से बाहर करने की तैयारी की जा रही है। आलोचकों का आरोप है कि यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि समाज में विभाजन और भय पैदा करने की खतरनाक राजनीति है।
राज्य सरकार की नई योजना “अन्नपूर्णा भंडार” को गरीब और जरूरतमंद महिलाओं के लिए बड़ी राहत के तौर पर पेश किया गया था। लेकिन अब खबर सामने आई है कि जिन महिलाओं की नागरिकता, दस्तावेज या SIR सत्यापन लंबित है, उन्हें योजना का लाभ मिलने में बाधा आ सकती है। यही मुद्दा अब राजनीतिक तूफान बन चुका है।
विपक्ष ने सवाल उठाया है कि आखिर किसी महिला का राशन, आर्थिक सहायता या सामाजिक कल्याण उसके वोटर स्टेटस से कैसे जोड़ा जा सकता है? आलोचकों का कहना है कि गरीबी, भूख और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार किसी राजनीतिक या चुनावी प्रक्रिया पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
कई विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि यह फैसला सीधे तौर पर गरीब, अल्पसंख्यक और सीमावर्ती इलाकों की महिलाओं को प्रभावित करेगा। उनका कहना है कि SIR प्रक्रिया पहले से ही विवादों में रही है और बड़ी संख्या में लोगों ने शिकायत की है कि बिना पर्याप्त कारण उनके दस्तावेजों पर सवाल उठाए गए या नामों की जांच शुरू कर दी गई।
सोशल मीडिया पर भी इस फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई लोगों ने इसे “वोट दो तभी हक मिलेगा” जैसी राजनीति बताया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकारी योजनाओं को वोटर सत्यापन या नागरिकता जांच से जोड़ा गया, तो आने वाले समय में यह बड़ा संवैधानिक और कानूनी विवाद बन सकता है।
इधर शिवेंदु अधिकारी सरकार का कहना है कि योजना पूरी तरह पारदर्शी तरीके से लागू की जाएगी और सिर्फ वास्तविक लाभार्थियों को फायदा मिलेगा। सरकार समर्थकों का तर्क है कि फर्जी दस्तावेजों और अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए कड़ी जांच जरूरी है। हालांकि विपक्ष इस दलील को “राजनीतिक बहाना” बता रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी नागरिक को बिना अंतिम निर्णय के सिर्फ “सत्यापन लंबित” होने के आधार पर सरकारी सुविधाओं से रोका जाता है, तो यह अदालत में चुनौती का विषय बन सकता है। संविधान सभी पात्र नागरिकों को समान अधिकार और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच की गारंटी देता है।
राजनीतिक तौर पर भी यह मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल पहले से ही सीमा, घुसपैठ, NRC, नागरिकता और पहचान की राजनीति को लेकर लगातार गरम रहा है। अब महिलाओं की कल्याणकारी योजना को इसी बहस से जोड़ने पर राज्य की राजनीति और ध्रुवीकृत होती दिखाई दे रही है।
विपक्ष का आरोप है कि यह सिर्फ प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि “डर और दबाव की राजनीति” है। उनका कहना है कि पहले वोटिंग अधिकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं और अब रोजमर्रा की जरूरतों को उसी से जोड़कर लोगों को मानसिक दबाव में लाने की कोशिश हो रही है। इस मुद्दे पर राज्य में सियासी तापमान तेजी से बढ़ चुका है। आने वाले दिनों में यह मामला अदालत से लेकर सड़क तक बड़ा संघर्ष बन सकता है।




