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संचार साथी अनिवार्य—प्रियंका ने बताया जासूसी का डिजिटल तानाशाही ऐप

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महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 2 दिसंबर 2025

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने केंद्र सरकार के उस फैसले पर तीखा हमला बोला है, जिसमें देश में बिकने वाले सभी नए स्मार्टफ़ोन्स में ‘संचार साथी’ (Sanchar Saathi) ऐप को अनिवार्य रूप से पूर्व-इंस्टॉल करने का निर्देश दिया गया है। संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि यह कदम सिर्फ साइबर सुरक्षा या चोरी हुए मोबाइल ट्रैक करने की सुविधा भर नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की निजता में “गंभीर सेंध” लगाने का प्रयास है। प्रियंका गांधी ने सीधे आरोप लगाया कि मोदी सरकार “लोगों के फोन पर नज़र रखना चाहती है” और इस ऐप के बहाने देश को “तानाशाही की तरफ़ मोड़ रही है।” उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक राष्ट्रों में नागरिकों की स्वतंत्रता सर्वोच्च होती है, लेकिन यह सरकार उलटे रास्ते पर चल रही है।

प्रियंका गांधी ने कहा कि सरकार का असली उद्देश्य सुरक्षा नहीं, बल्कि निगरानी (Surveillance) है। उन्होंने कहा कि यदि किसी ऐप को अनिवार्य कर दिया जाए और उसे फोन से हटाने का विकल्प भी न हो, तो यह खुला संकेत है कि सरकार आम नागरिकों के मोबाइल डेटा, कॉल रिकॉर्ड, और व्यक्तिगत गतिविधियों पर लगातार नज़र रखना चाहती है। उन्होंने जोड़ा कि “यह सिर्फ फोन पर जासूसी नहीं है… यह देश को धीरे-धीरे तानाशाही में बदलने की कोशिश है।” प्रियंका गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार संसद में संवाद से बच रही है, विपक्ष को बोलने नहीं दे रही, और ऐसे माहौल में इस तरह की “निगरानी-नीति” लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है।

दूसरी ओर, दूरसंचार विभाग (DoT) का तर्क है कि संचार साथी ऐप साइबर फ्रॉड, फर्जी IMEI नंबर, और चोरी हुए मोबाइल की ट्रैकिंग जैसी समस्याओं से नागरिकों को बचाने के लिए विकसित किया गया है। सरकार का कहना है कि यह ऐप टेलीकॉम सिस्टम को सुरक्षित बनाने का प्रयास है, और इसमें किसी प्रकार की जासूसी की बात “बे-बुनियाद” है। विभाग का आदेश है कि मोबाइल निर्माता कंपनियाँ 90 दिनों के भीतर सभी नए मॉडल्स में इस ऐप को पहले से इंस्टॉल करें और पुराने हैंडसेट्स में सॉफ़्टवेयर अपडेट के ज़रिए इसे लाएँ। हालांकि सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह ऐप नॉन-डिलीटेबल क्यों होगा और उपयोगकर्ता इसे हटाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं रखेंगे—यही सवाल विवाद के केंद्र में है।

इस पूरे विवाद ने देश में एक बड़ा विमर्श खड़ा कर दिया है। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी ऐप को अनिवार्य बनाना और उसे फोन से हटाने का विकल्प न देना डेटा सुरक्षा और निजी स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों से टकराता है। विपक्ष इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक उठाने की तैयारी में है। यह देखना रोचक होगा कि सरकार इस मसले पर कितनी पारदर्शिता दिखाती है और क्या वह ऐप के डेटा-कलेक्शन, सर्वर लोकेशन और निगरानी-सक्षम फीचर्स पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण देगी।

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