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अनुच्छेद 240 के बहाने चंडीगढ़ पर कब्ज़ा? अब पंजाब में भी ‘LG राज’ मॉडल लागू करने की तैयारी!

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पंकज सिंह | चंडीगढ़ 23 नवंबर 2025

केंद्र का विधेयक और पंजाब की चिंता: क्या लोकतंत्र पर सीधा हस्तक्षेप?

केंद्र की मोदी सरकार चंडीगढ़ को लेकर जिस नए विधेयक की तैयारी कर रही है, उसने पंजाब की राजनीति में भूचाल ला दिया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 240 के तहत चंडीगढ़ को उन केंद्र शासित प्रदेशों की श्रेणी में शामिल करने की योजना बनाई जा रही है, जिनके पास अपनी कोई विधायिका नहीं होती। इसका सीधा अर्थ यह होगा कि चंडीगढ़ में एक स्वतंत्र प्रशासक या लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त किया जाएगा, जो सीधे केंद्र के नियंत्रण में काम करेगा। अभी तक चंडीगढ़ का प्रशासनिक नियंत्रण पंजाब के राज्यपाल के हाथों में रहा है, लेकिन नए विधेयक के लागू होते ही यह अधिकार समाप्त हो जाएगा, और प्रशासन पूरी तरह केंद्र सरकार के हाथों में चला जाएगा। यही बिंदु पंजाब की चिंताओं का केंद्र है—क्योंकि यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं, चुनी हुई सरकार के प्रभाव को सीमित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

क्यों उठ रहा है सवाल: क्या यह पंजाब पर अप्रत्यक्ष सत्ता का विस्तार है?

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार चंडीगढ़ के जरिए पंजाब की चुनी हुई सरकार पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करना चाहती है। उनका कहना है कि अनुच्छेद 240 का इस्तेमाल एक संवैधानिक बहाने के तौर पर किया जा रहा है, ताकि दिल्ली की तरह यहां भी ‘LG राज’ लागू किया जा सके। पंजाब पहले ही आर्थिक, जल, कृषि और सुरक्षा मामलों में केंद्र के प्रभाव का सामना करता रहा है, और अब प्रशासनिक ढांचे पर नियंत्रण खोना राजनीतिक स्वायत्तता पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। पंजाब की राजनीति में यह भावना गहरी है कि केंद्र बार-बार पंजाब के अधिकारों को कमजोर करता आया है—चाहे SYL नहर का मामला हो, सुरक्षा एजेंसियों का दखल हो या अब चंडीगढ़ का मुद्दा।

दिल्ली का उदाहरण: चुनी हुई सरकार बनाम LG मॉडल

पंजाब में विरोध की सबसे बड़ी वजह दिल्ली का उदाहरण है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 2015 में 70 में से 67 सीटें और 2020 में 70 में से 62 सीटें मिलीं—इतना प्रचंड जनादेश आज़ाद भारत के इतिहास में बहुत कम देखा गया है। जनता ने साफ संदेश दिया कि वह अरविंद केजरीवाल की सरकार को पूर्ण अधिकारों के साथ काम करते देखना चाहती थी। लेकिन इसके बावजूद दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर विनय कुमार सक्सेना और उससे पहले के LGs ने लगातार चुनी हुई सरकार के फैसलों में अड़ंगे लगाए, फाइलें रोकीं, नियुक्तियों को रोका, योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

केजरीवाल सरकार ने कई बार आरोप लगाया कि विनय सक्सेना सरकार को चलने नहीं दे रहे, हर निर्णय पर रोक लगा रहे हैं, और प्रशासनिक मशीनरी पर कब्ज़ा करके केंद्र ने दिल्ली की चुनी हुई सरकार को सिर्फ “नाम मात्र की सरकार” बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट तक को हस्तक्षेप करना पड़ा, और उसने कहा कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को प्रशासनिक अधिकार मिलने चाहिए। लेकिन इसके बावजूद केंद्र ने अध्यादेश लाकर अधिकारियों के नियंत्रण को फिर से LG के हाथों में दे दिया। यह उदाहरण अब पंजाब में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है—क्योंकि पंजाब को डर है कि यही मॉडल चंडीगढ़ और फिर पंजाब के प्रशासन पर लागू होगा।

क्या मोदी-शाह अब पंजाब पर भी दिल्ली वाला ‘कंट्रोल सिस्टम’ लागू करने जा रहे हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चंडीगढ़ पर सीधा प्रशासनिक कब्ज़ा केंद्र को पंजाब की नौकरशाही, सुरक्षा तंत्र और नीतिगत फैसलों पर प्रभाव बढ़ाने का रास्ता देगा। आलोचकों का दावा है कि यह कदम केवल चंडीगढ़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धीरे-धीरे पंजाब के प्रशासनिक ढांचे को भी केंद्र के प्रभाव में लाने की कोशिश की जाएगी। विरोधी दल इसे “अप्रत्यक्ष राष्ट्रपति शासन” या “केंद्र संचालित राज्य मॉडल” की शुरुआत बता रहे हैं, जिसमें चुनी हुई सरकार का अधिकार सीमित कर दिया जाता है और LG या केंद्र द्वारा नियुक्त अधिकारी वास्तविक सत्ता चलाते हैं।

यही वजह है कि विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों यह सवाल उठा रहे हैं—क्या मोदी सरकार अनुच्छेद 240 के बहाने पंजाब की चुनी हुई सरकार पर अपना कब्ज़ा चाहती है? क्या यह लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की दिशा में कदम है? क्या पंजाब में भी दिल्ली जैसा मॉडल लागू कर दिया जाएगा, जहाँ जनता ने सरकार चुनी, पर सत्ता LG ने चलाई?

विवाद की जड़: भूमि नहीं, पहचान और राजनीतिक शक्ति

चंडीगढ़ का विवाद सिर्फ जमीन का नहीं है। यह पहचान, इतिहास और राजनीतिक शक्ति का प्रश्न है। 1947 के विभाजन के बाद जब लाहौर पाकिस्तान चला गया, तब पंजाब के पास राजधानी नहीं बची। इसी इतिहास से चंडीगढ़ का जन्म हुआ, और पंजाब का दावा भावनात्मक और ऐतिहासिक दोनों आधारों पर मजबूत माना जाता है। हरियाणा का तर्क भी प्रशासनिक और भाषाई आधार पर है। लेकिन अब यह विवाद केंद्र बनाम राज्य की स्वायत्तता की लड़ाई में बदल गया है।

नया विधेयक इस पुराने घाव को फिर से ताज़ा कर गया है और अब संघर्ष सिर्फ पंजाब-हरियाणा के बीच नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के अधिकारों के बीच दिखाई दे रहा है।

यह लड़ाई अब संविधान, संघीय ढांचे, लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनी हुई सरकारों की स्वायत्तता की दिशा तय करेगी। सवाल बड़ा है—क्या भारत एक मजबूत संघीय लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है, या केंद्रित सत्ता की ओर लौट रहा है?

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