राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | दार्जिलिंग/नई दिल्ली | 24 अगस्त 2026
दार्जिलिंग की पहाड़ियों और उत्तर बंगाल के आसपास के इलाकों में दशकों से चले आ रहे गोरखालैंड आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार ने एक अहम पहल की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 22 अगस्त को सिलीगुड़ी में दार्जिलिंग हिल्स के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद इस मुद्दे के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा की है। इस समिति का उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की पहचान, संवैधानिक मान्यता और लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक मांगों को ध्यान में रखते हुए ‘स्थायी राजनीतिक समाधान’ का रास्ता तैयार करना होगा। केंद्र के इस कदम को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दार्जिलिंग और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में अलग गोरखालैंड राज्य की मांग कई दशकों से राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख मुद्दा रही है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, बैठक में पश्चिम बंगाल की पहाड़ियों की आबादी से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दे पहचान, स्थायी राजनीतिक समाधान और भारतीय संविधान के तहत मान्यता से जुड़े रहे। बैठक के बाद केंद्र ने पूर्व डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर और वर्तमान इंटरलोक्यूटर पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता में समिति गठित करने का फैसला किया है। समिति को स्थायी राजनीतिक समाधान की दिशा में आवश्यक तौर-तरीकों को अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि समिति किस मॉडल की सिफारिश करेगी और क्या उसके दायरे में अलग राज्य की मांग भी शामिल होगी। यही वजह है कि केंद्र के इस फैसले को तत्काल किसी अंतिम राजनीतिक व्यवस्था की घोषणा के बजाय समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
दार्जिलिंग पहाड़ियों में अलग गोरखालैंड राज्य की मांग कोई नई राजनीतिक मांग नहीं है। गोरखा समुदाय और इस क्षेत्र के कई राजनीतिक संगठनों की ओर से लंबे समय से दार्जिलिंग पहाड़ियों के साथ-साथ तराई और डूआर्स के कुछ हिस्सों को मिलाकर अलग राज्य बनाने की मांग की जाती रही है। इस मांग के पीछे क्षेत्र की अलग भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को प्रमुख आधार बनाया जाता है। पिछले कई दशकों में यह मुद्दा कई बार बड़े राजनीतिक आंदोलनों, बंद, प्रदर्शन और लंबे गतिरोध का कारण बन चुका है। अलग-अलग दौर में केंद्र और राज्य सरकारों ने पहाड़ी क्षेत्र में राजनीतिक व्यवस्था और स्वायत्तता से जुड़े समझौतों के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल सका।
22 अगस्त की बैठक क्यों महत्वपूर्ण है? केंद्र और पहाड़ी क्षेत्र के प्रतिनिधियों के बीच हुई यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल किसी एक राजनीतिक दल या संगठन की मांग पर चर्चा नहीं हुई, बल्कि दार्जिलिंग हिल्स से जुड़े अलग-अलग हितधारकों को बातचीत की प्रक्रिया में शामिल किया गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हुई बैठक में सांसदों, विधायकों और गोरखा समुदाय के विभिन्न राजनीतिक प्रतिनिधियों ने अपनी मांगें और चिंताएं रखीं। केंद्र ने इसके बाद समिति गठित करने का निर्णय लिया। इसका संकेत यह है कि सरकार इस मुद्दे को केवल कानून-व्यवस्था या क्षेत्रीय प्रशासन के सवाल के रूप में नहीं, बल्कि पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े व्यापक विषय के रूप में देख रही है।
हालांकि, इस प्रक्रिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘स्थायी राजनीतिक समाधान’ की परिभाषा होगी। गोरखालैंड समर्थक संगठनों के लिए लंबे समय से अलग राज्य की मांग केंद्रीय मुद्दा रही है, जबकि पश्चिम बंगाल की राजनीतिक व्यवस्था और राज्य सरकार के लिए क्षेत्र की अखंडता भी महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे में केंद्र की समिति को ऐसा समाधान तलाशना होगा जो पहाड़ी क्षेत्र की राजनीतिक और सांस्कृतिक आकांक्षाओं को संबोधित करने के साथ-साथ संवैधानिक और प्रशासनिक ढांचे के भीतर स्वीकार्य हो। समिति की सिफारिशें किस दिशा में जाती हैं और क्या वे अलग राज्य की मांग, अधिक स्वायत्तता, संवैधानिक संरक्षण या किसी अन्य प्रशासनिक व्यवस्था की ओर संकेत करती हैं, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
गोरखा पहचान का सवाल भी इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की ओर से लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि उनकी विशिष्ट पहचान और राजनीतिक अधिकारों को संवैधानिक स्तर पर पर्याप्त मान्यता मिले। केंद्र ने भी बैठक के बाद अपने बयान में पहचान और संविधान के तहत मान्यता से जुड़े मुद्दों का विशेष उल्लेख किया है। इससे साफ है कि प्रस्तावित समिति के सामने केवल प्रशासनिक सीमाओं या सत्ता के बंटवारे का सवाल नहीं होगा, बल्कि उसे क्षेत्र की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक आकांक्षाओं को भी समझना होगा।
अब निगाहें समिति की आगे की प्रक्रिया पर होंगी। समिति किन पक्षों से बातचीत करती है, किन क्षेत्रों और संगठनों को इसमें शामिल करती है, मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था का किस तरह मूल्यांकन करती है और केंद्र को किस प्रकार की सिफारिश देती है—इन सभी सवालों का जवाब आगे की बैठकों में सामने आएगा। साथ ही पश्चिम बंगाल सरकार और क्षेत्र के विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी इस प्रक्रिया की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी। दार्जिलिंग जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से जटिल क्षेत्र में किसी भी समाधान के लिए व्यापक सहमति बनाना आसान नहीं होगा।
केंद्र की पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दशकों पुराने गोरखा राजनीतिक सवाल को एक बार फिर औपचारिक बातचीत और समाधान की प्रक्रिया में लाने की कोशिश की गई है। फिलहाल इसे गोरखालैंड राज्य के गठन की घोषणा के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। केंद्र ने केवल स्थायी राजनीतिक समाधान के तौर-तरीकों को अंतिम रूप देने के लिए समिति बनाने की बात कही है। लेकिन इतना जरूर है कि इस कदम ने दार्जिलिंग की राजनीति में एक नए दौर की संभावनाएं पैदा कर दी हैं। आने वाले महीनों में समिति की बातचीत और सिफारिशें यह तय करेंगी कि यह पहल केवल एक और संवाद प्रक्रिया बनकर रह जाती है या वास्तव में दशकों पुराने गोरखा राजनीतिक विवाद के किसी स्थायी समाधान की नींव रखती है।




