
‘मोदी है तो मुमकिन है’ के वादों का हिसाब: ज़मीन पर हकीकत, काग़ज़ पर नारे
एबीसी डेस्क 18 दिसंबर 2025 पिछले एक दशक में देश ने सिर्फ़ योजनाएँ नहीं देखीं, बल्कि नारों की एक पूरी संस्कृति देखी। हर चुनाव, हर मंच और हर विज्ञापन में बड़े-बड़े दावे किए गए—ऐसे दावे, जो सीधे आम आदमी की ज़िंदगी से जुड़े थे। “मोदी है तो मुमकिन है” ऐसा ही एक नारा बना, जिसने









