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ब्रिक्स चाहता है नई दुनिया की व्यवस्था, लेकिन अभी डॉलर की जरूरत

ओपिनियन | प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 सितंबर 2026

दुनिया बदल रही है, ब्रिक्स भी अपनी जगह तलाश रहा है

दुनिया इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अमेरिका और पश्चिमी देशों का पुराना प्रभाव अभी भी मजबूत है, लेकिन चीन, भारत, रूस, ईरान, सऊदी अरब और दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब वैश्विक फैसलों में अपनी आवाज ज्यादा मजबूती से रखना चाहती हैं। व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, युद्ध, जलवायु और अंतरराष्ट्रीय वित्त—हर क्षेत्र में पुराने नियमों पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे समय में ब्रिक्स का महत्व बढ़ना स्वाभाविक है। भारत की अध्यक्षता में 2026 का ब्रिक्स सम्मेलन इसी बदलती दुनिया के बीच हो रहा है। ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रहा। इसमें 11 सदस्य देश और 10 साझेदार देश शामिल हैं। यह समूह दुनिया की करीब आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या ब्रिक्स सचमुच दुनिया की नई व्यवस्था बनाने की ताकत हासिल कर चुका है, या अभी भी उसे उसी पुरानी व्यवस्था के सहारे आगे बढ़ना पड़ेगा जिसे वह बदलना चाहता है?

ब्रिक्स का सपना बड़ा है, लेकिन रास्ता आसान नहीं

ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। भारत और चीन के बीच सीमा और व्यापार से जुड़े मतभेद हैं। रूस और पश्चिमी देशों के बीच गंभीर टकराव है। ईरान का अमेरिका और इजरायल के साथ तनाव बेहद गहरा है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के अपने क्षेत्रीय हित हैं। दूसरी तरफ भारत अमेरिका और इजरायल के साथ भी मजबूत संबंध रखता है और रूस तथा ईरान के साथ भी अपने पुराने रिश्ते बनाए हुए है। यानी एक ही मंच पर ऐसे देश मौजूद हैं जिनके हित कहीं मिलते हैं तो कहीं बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। इसके बावजूद वे एक साथ बैठे हैं और बातचीत कर रहे हैं। यही ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत है। भारत के सामने इसलिए चुनौती केवल ब्रिक्स को बड़ा दिखाने की नहीं, बल्कि इतने अलग-अलग देशों के बीच सहमति बनाकर उसे काम करने वाला और परिणाम देने वाला संगठन बनाने की है।

ब्रिक्स अमेरिका को हटाना नहीं, दुनिया का संतुलन बदलना चाहता है

ब्रिक्स को अक्सर अमेरिका और पश्चिम के विरोधी संगठन के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसकी पूरी कहानी इतनी सरल नहीं है। ब्रिक्स के पीछे मूल सोच यह थी कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को दुनिया के आर्थिक और राजनीतिक फैसलों में उनकी ताकत के हिसाब से ज्यादा जगह मिलनी चाहिए। 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी और विश्व व्यापार संगठन की व्यापार वार्ताओं में लंबे समय तक चली रुकावट ने इस सोच को और मजबूत किया। उभरते देशों को लगा कि वैश्विक संस्थाओं में उनकी आवाज कमजोर है। इसलिए ब्रिक्स का लक्ष्य केवल अमेरिका को हटाना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में शक्ति का संतुलन बदलना और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करना है। आज अमेरिका और यूरोप के बीच भी कई मुद्दों पर मतभेद सामने आ रहे हैं। ऐसे में ब्रिक्स अगर पश्चिम विरोधी मंच बनने के बजाय दुनिया के विकासशील देशों के लिए एक मजबूत विकल्प और सहयोग का मंच बनता है, तो उसका प्रभाव कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है।

डॉलर को चुनौती देने की बात बहुत हुई, लेकिन डॉलर अभी भी सबसे आगे

ब्रिक्स के भीतर कई वर्षों से डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा चल रही है। कभी साझा मुद्रा की बात सामने आती है, कभी अपनी भुगतान व्यवस्था की और कभी सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की। लेकिन वास्तविक दुनिया में डॉलर को हटाना आसान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की भूमिका आज भी बहुत बड़ी है। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है, लेकिन उस व्यापार में भी डॉलर और दूसरी मजबूत मुद्राओं की जरूरत बनी हुई है। किसी मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने के लिए केवल राजनीतिक इच्छा पर्याप्त नहीं होती। उस मुद्रा पर दुनिया का भरोसा, मजबूत अर्थव्यवस्था, बड़ा वित्तीय बाजार, स्थिरता और हर जगह उसका आसानी से इस्तेमाल होना जरूरी है। यही वजह है कि ब्रिक्स नई वित्तीय व्यवस्था की बात तो कर सकता है, लेकिन डॉलर को तुरंत पीछे छोड़ना अभी संभव नहीं दिखता।

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार अच्छा विकल्प है, लेकिन पूरी कहानी नहीं

भारत ने रुपये में व्यापार बढ़ाने की कोशिश की है। रूस समेत कुछ देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन की दिशा में काम भी हुआ है। लेकिन यहां एक व्यावहारिक समस्या है। अगर भारत किसी देश से रुपये में सामान खरीदता है और वह देश भारत से उतनी मात्रा में सामान नहीं खरीदता, तो उसके पास जमा रुपये का इस्तेमाल कैसे होगा? यही समस्या दूसरी स्थानीय मुद्राओं के साथ भी है। रूस अपनी मुद्रा को मजबूत करना चाहता है, चीन अपनी मुद्रा की भूमिका बढ़ाना चाहता है और कई देश डॉलर से दूरी बनाना चाहते हैं, लेकिन कोई भी देश पूरी तरह किसी दूसरी एक मुद्रा पर निर्भर नहीं होना चाहता। इसलिए ब्रिक्स के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना एक व्यावहारिक कदम हो सकता है, लेकिन डॉलर को पूरी तरह हटाना अभी बहुत दूर की बात है।

सोना भी डॉलर का आसान विकल्प नहीं

कुछ समय पहले सोने को अंतरराष्ट्रीय भुगतान और वित्तीय सुरक्षा के एक मजबूत विकल्प के रूप में देखा जाने लगा। कई केंद्रीय बैंकों ने सोने की खरीद बढ़ाई। लेकिन सोने की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने इस रास्ते को भी महंगा बना दिया। सोना निश्चित रूप से सुरक्षित संपत्ति माना जाता है, लेकिन दुनिया के रोजाना होने वाले विशाल व्यापार को केवल सोने के सहारे चलाना आसान नहीं है। इसलिए फिलहाल दुनिया के सामने ऐसा कोई विकल्प नहीं है जो डॉलर की जगह तुरंत उसी स्तर पर खड़ा हो सके। नई वित्तीय व्यवस्था बनाने की इच्छा और उसे पूरी दुनिया में चलाने की क्षमता—दो अलग-अलग चीजें हैं। ब्रिक्स को इसी अंतर को समझना होगा।

चीन की मुद्रा का बढ़ता प्रभाव भी सवाल खड़े करता है

डॉलर के बाद अगर किसी दूसरी बड़ी मुद्रा का प्रभाव बढ़ता है, तो वह कौन होगी? इस सवाल का जवाब अक्सर चीन की मुद्रा की ओर जाता है। चीन ब्रिक्स की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसका व्यापारिक प्रभाव बहुत बड़ा है। लेकिन ब्रिक्स के कई देश यह भी नहीं चाहेंगे कि पुराने आर्थिक दबदबे की जगह नया दबदबा पैदा हो जाए। इसलिए ऐसी व्यवस्था ज्यादा स्वीकार्य होगी जिसमें किसी एक देश की मुद्रा पर पूरी निर्भरता न हो। यही वजह है कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, अलग-अलग भुगतान प्रणालियों और क्षेत्रीय वित्तीय सहयोग पर जोर बढ़ रहा है। ब्रिक्स को डॉलर का विकल्प बनना है तो उसे एक नए देश के प्रभुत्व का मंच नहीं, बल्कि कई देशों की साझेदारी का मंच बनना होगा।

भारत की सबसे बड़ी ताकत—संतुलन की नीति

इस पूरी तस्वीर में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। भारत रूस से रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखता है। ईरान के साथ चाबहार और क्षेत्रीय संपर्क को आगे बढ़ाता है। चीन के साथ सीमा विवाद के बावजूद बातचीत जारी रखता है। अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक, निवेश और व्यापारिक संबंध मजबूत कर रहा है। इजरायल के साथ भी भारत के रणनीतिक रिश्ते महत्वपूर्ण हैं। वहीं सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के साथ भारत के ऊर्जा, निवेश और व्यापार संबंध लगातार बढ़े हैं। यानी भारत किसी एक खेमे में पूरी तरह बंद नहीं है। वह अलग-अलग देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। आज की अस्थिर दुनिया में यही रणनीतिक संतुलन भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।

ब्रिक्स के भीतर मतभेद हैं, लेकिन यही उसकी असली परीक्षा है

रूस और ईरान अमेरिकी नीतियों और पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ ज्यादा खुलकर बोलते हैं। चीन अपनी वैश्विक भूमिका बढ़ाना चाहता है। खाड़ी देश अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है। ऐसे में ब्रिक्स के सभी देशों का हर मुद्दे पर एक राय होना संभव नहीं है। लेकिन किसी संगठन की सफलता का मतलब भी यही नहीं कि उसके सभी सदस्य हर विषय पर एक जैसा सोचें। असली सफलता यह है कि मतभेदों के बावजूद वे कुछ साझा मुद्दों पर साथ काम कर सकें। भारत की अध्यक्षता में आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकास जैसे मुद्दों पर साझा रुख बनना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

दक्षिण एशिया में भी बदल रहा है समीकरण

ब्रिक्स की कहानी को दक्षिण एशिया से अलग करके नहीं देखा जा सकता। बांग्लादेश ने नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन से दूरी बनाए रखी है। वहीं पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देश ब्रिक्स के साथ नजदीकी बढ़ाने में रुचि रखते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच इतिहास, सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े गंभीर मतभेद हैं। लेकिन बदलती दुनिया में कूटनीति को केवल पुराने विवादों के आधार पर हमेशा नहीं चलाया जा सकता। पाकिस्तान के अमेरिका, खाड़ी देशों और तुर्किये के साथ संबंध और उसका नया सुरक्षा सहयोग भी क्षेत्रीय समीकरण बदल रहा है। ऐसे में भारत के सामने एक बड़ा सवाल है—क्या दक्षिण एशिया को फिर से एक मजबूत क्षेत्रीय मंच की जरूरत है? बदली हुई परिस्थितियों में सार्क को नए तरीके से सक्रिय करने की कोशिश पूरे क्षेत्र के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकती है।

लाल सागर का संकट और चाबहार की अहमियत

यमन में हूती हमलों और लाल सागर के समुद्री रास्ते पर बढ़ते खतरे ने भारत के लिए समुद्री व्यापार की सुरक्षा को और महत्वपूर्ण बना दिया है। बाब-अल-मंदब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते में अस्थिरता का असर एशिया और यूरोप के बीच व्यापार पर पड़ सकता है। ऐसे समय में ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बन जाता है। चाबहार भारत को ईरान के रास्ते मध्य एशिया और आगे के बाजारों तक पहुंच देता है। अगर दक्षिण एशिया के बंदरगाह, चाबहार और दूसरे संपर्क मार्ग बेहतर तरीके से एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तो क्षेत्र अपनी व्यापारिक और रणनीतिक सुरक्षा मजबूत कर सकता है। आने वाले समय में बंदरगाह केवल व्यापार के केंद्र नहीं होंगे, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक ताकत के महत्वपूर्ण साधन होंगे।

ब्रिक्स भारत के लिए नए अवसरों का मंच भी है

नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत ने चीन, रूस, ईरान, खाड़ी देशों और दूसरे साझेदार देशों के साथ कई स्तरों पर बातचीत की है। रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, निवेश, महत्वपूर्ण खनिज, अंतरिक्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में नए अवसर तलाशे जा रहे हैं। रूस की ओर से लड़ाकू विमान और रक्षा तकनीक से जुड़े प्रस्ताव भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। चीन के साथ सीमा विवाद के साथ-साथ व्यापार और आर्थिक संबंधों को सामान्य करने की कोशिश भी जारी है। वियतनाम, मलेशिया, मिस्र और इथियोपिया जैसे देशों के साथ भी भारत नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अगर इन बातचीतों से वास्तविक समझौते, निवेश और तकनीकी सहयोग सामने आते हैं, तो ब्रिक्स भारत के लिए केवल कूटनीतिक मंच नहीं रहेगा, बल्कि आर्थिक और तकनीकी विकास का बड़ा माध्यम बन सकता है।

नई तकनीक में भारत को अपनी जगह बनानी होगी

आने वाली दुनिया में केवल तेल, गैस और बड़े कारखाने ही किसी देश की ताकत तय नहीं करेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा, जैव तकनीक और दूसरी नई तकनीकें आने वाले दशकों की आर्थिक और रणनीतिक ताकत तय करेंगी। इसलिए भारत को ब्रिक्स के माध्यम से केवल व्यापार बढ़ाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि तकनीक साझा करने, शोध बढ़ाने और अपनी घरेलू तकनीकी क्षमता मजबूत करने पर भी जोर देना चाहिए। भारत अगर चीन और पश्चिमी देशों के बीच संतुलन रखते हुए अपनी स्वतंत्र तकनीकी ताकत विकसित करता है, तो उसकी वैश्विक भूमिका और मजबूत हो सकती है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक को मजबूत करना जरूरी

ब्रिक्स के पास न्यू डेवलपमेंट बैंक है। यह संस्था विकासशील देशों को बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन, डिजिटल व्यवस्था और जलवायु से जुड़े प्रोजेक्ट के लिए वित्त देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अगर ब्रिक्स इसे और मजबूत करता है और विकासशील देशों को आसान तथा भरोसेमंद वित्त उपलब्ध कराता है, तो ब्रिक्स की उपयोगिता सिर्फ बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहेगी। यही वह क्षेत्र है जहां ब्रिक्स वास्तव में पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं के साथ एक मजबूत विकल्प खड़ा कर सकता है।

असली मुकाबला अमेरिका बनाम ब्रिक्स नहीं है

ब्रिक्स को अगर केवल अमेरिका विरोधी संगठन बना दिया गया तो उसकी क्षमता सीमित हो जाएगी। ब्रिक्स के कई देश अमेरिका के साथ बड़ा व्यापार करते हैं, अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं और डॉलर पर निर्भर हैं। इसलिए किसी एक देश या पूरे पश्चिम से अचानक दूरी बनाकर नई आर्थिक व्यवस्था बनाना व्यावहारिक नहीं है। ब्रिक्स की असली ताकत यह होगी कि वह दुनिया के देशों को ज्यादा विकल्प दे। व्यापार के कई रास्ते हों, भुगतान के कई विकल्प हों, विकास के लिए कई वित्तीय संस्थाएं हों और किसी एक शक्ति पर पूरी निर्भरता न हो। यही दुनिया को ज्यादा संतुलित बना सकता है।

भारत की परीक्षा—घोषणाओं से आगे बढ़ना होगा

भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि दिल्ली में लिए गए फैसले कितनी जल्दी जमीन पर उतरते हैं। भाषण, घोषणाएं और संयुक्त बयान जरूरी हैं, लेकिन असली सफलता तब होगी जब व्यापार बढ़े, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़े, ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित हो, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग मजबूत हो, तकनीकी साझेदारी बढ़े और विकासशील देशों को आसानी से वित्त मिल सके। भारत ने ब्रिक्स को मानव-केंद्रित विकास, सहयोग और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज से जोड़ने की कोशिश की है। अब इस सोच को वास्तविक परिणामों में बदलना होगा।

नई दुनिया बन रही है, लेकिन डॉलर अभी गया नहीं है

सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि ब्रिक्स एक नई और ज्यादा संतुलित वैश्विक व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी वह डॉलर से मुक्त दुनिया नहीं बना पाया है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ सकता है। ब्रिक्स की अपनी भुगतान व्यवस्था मजबूत हो सकती है। न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका बढ़ सकती है। लेकिन डॉलर को हटाने में लंबा समय लग सकता है। इसलिए भारत के लिए समझदारी यही होगी कि वह डॉलर से अचानक दूरी बनाने के बजाय विकल्पों की संख्या बढ़ाए। रुपया मजबूत हो, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़े, सोने और दूसरी सुरक्षित संपत्तियों का संतुलित इस्तेमाल हो और साथ ही मौजूदा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में भारत अपने हितों को सुरक्षित रखे।

ब्रिक्स की असली जीत डॉलर हटाना नहीं, विकल्प पैदा करना होगी

आने वाले वर्षों में ब्रिक्स की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं होगी कि उसने डॉलर को दुनिया से बाहर कर दिया। असली सफलता तब होगी जब दुनिया के देशों के पास एक ही वित्तीय और आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर रहने की मजबूरी न रहे। यही भारत के लिए भी सबसे व्यावहारिक रास्ता है। भारत को अमेरिका से रिश्ते रखने हैं, रूस से भी, चीन से बातचीत करनी है, ईरान के साथ चाबहार आगे बढ़ाना है और खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा तथा व्यापार संबंध मजबूत करने हैं। यानी भारत को किसी एक खेमे की राजनीति के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों की स्वतंत्र नीति पर आगे बढ़ना होगा।

ब्रिक्स की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि असली दौर अब शुरू हो रहा है। नई दुनिया का सपना बड़ा है, लेकिन पुरानी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत—डॉलर—अभी भी बहुत मजबूत है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि ब्रिक्स कल सुबह डॉलर को हटा देगा या नहीं। असली सवाल यह है—क्या ब्रिक्स ऐसी दुनिया बनाने में सफल होगा, जहां किसी एक देश या एक मुद्रा के पास पूरी दुनिया की आर्थिक चाबी न हो?

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