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BRICS का मेगा शो, रणनीति का फ्लॉप शो: मोदी की विदेश नीति में तस्वीरें बहुत, नतीजे शून्य?

ओपिनियन | अंतरराष्ट्रीय राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 सितंबर 2026

भव्य मंच, चमकदार तस्वीरें और खाली हाथ

दिल्ली में BRICS का मंच सजाया गया, दुनिया के बड़े नेताओं को बुलाया गया, दर्जनों बैठकें हुईं, कैमरों के सामने हाथ मिलाए गए और अंत में 45 पन्नों का 140 बिंदुओं वाला घोषणापत्र भी सामने आ गया। लेकिन इस पूरे आयोजन को अगर प्रचार के चश्मे से हटाकर रणनीतिक नजर से देखा जाए तो सवाल सीधा है—भारत को मिला क्या? महीनों की तैयारी, करोड़ों का आयोजन, सुरक्षा का अभूतपूर्व इंतजाम और दुनिया भर में प्रचार के बाद क्या भारत ने कोई ऐसी बड़ी रणनीतिक उपलब्धि हासिल की, जो चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को रोक सके, डॉलर के वर्चस्व को चुनौती दे सके, महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीक में भारत की निर्भरता कम कर सके या ग्लोबल साउथ को कोई वास्तविक आर्थिक विकल्प दे सके? घोषणापत्र में बड़ी-बड़ी बातें जरूर हैं, लेकिन विदेश नीति का मूल्यांकन शब्दों की संख्या से नहीं, परिणामों से होता है। यही वजह है कि दिल्ली का BRICS सम्मेलन मोदी सरकार की विदेश नीति में उस अंतर को उजागर करता है, जहां प्रस्तुति बहुत बड़ी है, लेकिन ठोस रणनीतिक नतीजे दिखाई नहीं देते। मंच विशाल था, कैमरे दुनिया भर के थे, तस्वीरें शानदार थीं—लेकिन चीन का व्यापार घाटा वहीं, डॉलर का दबदबा वहीं, रणनीतिक निर्भरता वहीं और कई पुराने सवाल वहीं। यही इस मेगा शो को रणनीति के फ्लॉप शो में बदल देता है।

घरेलू इवेंट मैनेजमेंट बन गई विदेश नीति

भारत की विदेश नीति कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जरिए विकासशील देशों की स्वतंत्र आवाज बनने की कोशिश करती थी। आज तस्वीर बदल गई है। विदेश नीति के हर बड़े पड़ाव को घरेलू राजनीतिक इवेंट की तरह पेश किया जाता है—भव्य मंच, विशाल होर्डिंग, कैमरों के लिए तय दृश्य, नेताओं के साथ तस्वीरें और फिर उपलब्धियों का राजनीतिक प्रचार। BRICS भी इससे अलग नहीं रहा। भारत ने अपनी अध्यक्षता में 30 से ज्यादा शहरों में 350 से अधिक बैठकें आयोजित कीं। यह संख्या बताने के लिए काफी है कि आयोजन कितना बड़ा था। लेकिन सवाल संख्या का नहीं, दिशा का है। इतनी बैठकों के बाद क्या कोई ऐसी ठोस आर्थिक या रणनीतिक व्यवस्था बनी, जिससे भारत की ताकत बढ़ी? अगर नहीं, तो फिर यह कूटनीति कम और इवेंट मैनेजमेंट ज्यादा क्यों न कहा जाए? विदेश नीति का काम केवल यह सुनिश्चित करना नहीं है कि दुनिया के नेता दिल्ली आएं; उसका काम यह सुनिश्चित करना है कि जब वे दिल्ली से जाएं तो भारत अपने राष्ट्रीय हितों के लिए कुछ ठोस हासिल कर चुका हो। मेजबानी की चमक कुछ दिनों तक रहती है, लेकिन रणनीतिक फैसलों का असर दशकों तक रहता है। मोदी सरकार ने मेजबानी को ऐतिहासिक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत की रणनीतिक स्थिति भी उतनी ही ऐतिहासिक रूप से मजबूत हुई?

चीन के साथ 112 अरब डॉलर का घाटा—BRICS की सबसे बड़ी विडंबना

भारत की रणनीतिक कमजोरी का सबसे बड़ा आईना चीन के साथ व्यापार संबंध हैं। 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया। दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 151 अरब डॉलर से ऊपर चला गया, लेकिन भारत चीन को जितना बेच रहा है, उससे कहीं ज्यादा चीन से खरीद रहा है। यह आंकड़ा उस समय और ज्यादा गंभीर हो जाता है जब भारत चीन को अपना सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिस्पर्धी मानता है। एक तरफ सीमा पर चीन के खिलाफ रणनीतिक सतर्कता, दूसरी तरफ चीन से इतनी बड़ी आर्थिक निर्भरता—यह कैसा रणनीतिक संतुलन है? प्रधानमंत्री महत्वपूर्ण तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स के हथियारीकरण का विरोध करते हैं, लेकिन भारत खुद कई महत्वपूर्ण सप्लाई चेन में चीन पर निर्भर है। चीन को भाषण देना आसान है, चीन पर निर्भरता खत्म करना कठिन। यही मोदी सरकार की विदेश और आर्थिक नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है। BRICS जैसे मंच पर भारत को चीन के साथ व्यापार असंतुलन पर ठोस तंत्र और समयसीमा सामने रखनी चाहिए थी। लेकिन फिर वही हुआ—बात हुई, तस्वीर हुई, बयान हुआ और मूल समस्या अपनी जगह खड़ी रही। अगर 112 अरब डॉलर का घाटा भारत की रणनीतिक कमजोरी का खुला आंकड़ा है, तो फिर BRICS के मंच पर इस असंतुलन के खिलाफ निर्णायक आर्थिक रणनीति कहां थी?

डॉलर के विकल्प का सपना फिर धरा रह गया

BRICS के गठन के बाद से डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की चर्चा लगातार होती रही है। साझा मुद्रा, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की बातें वर्षों से की जा रही हैं। लेकिन दिल्ली सम्मेलन तक भी कोई ऐसी साझा मुद्रा सामने नहीं आई जो डॉलर का वास्तविक विकल्प बन सके। स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन की बातें जरूर हैं, BRICS भुगतान व्यवस्था पर भी चर्चा हुई, लेकिन वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बदलने वाला कोई ठोस और समयबद्ध रोडमैप सामने नहीं आया। यही वह जगह है जहां बड़े नारों और वास्तविक क्षमता का अंतर साफ दिखाई देता है। डी-डॉलराइजेशन भाषणों से नहीं होता। इसके लिए वैकल्पिक वित्तीय संस्थान, भुगतान नेटवर्क, मजबूत स्थानीय मुद्राएं, गहरे पूंजी बाजार और सदस्य देशों के बीच वास्तविक वित्तीय भरोसा चाहिए। मोदी सरकार BRICS को नई आर्थिक व्यवस्था के मंच के रूप में पेश करती रही, लेकिन दिल्ली में भी वह सपना ठोस संस्थागत रूप नहीं ले पाया। डॉलर वहीं है, अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था वहीं है और BRICS अब भी उसी वैश्विक वित्तीय ढांचे के भीतर अपने विकल्प खोज रहा है। सवाल यह है कि अगर वर्षों से डॉलर के विकल्प की बात हो रही थी, तो इस सम्मेलन के बाद भी दुनिया को कोई स्पष्ट समयसीमा और ठोस आर्थिक ढांचा क्यों नहीं मिला?

शाकाहारी मेन्यू और मेहमानों की बेरुखी ने खोली मेजबानी की पोल

BRICS सम्मेलन में पूरी तरह शाकाहारी मेन्यू का फैसला भी चर्चा में रहा। रूस, चीन, ईरान और खाड़ी देशों से आए प्रतिनिधिमंडलों की अपनी अलग भोजन संस्कृति है, लेकिन दिल्ली में मेहमानों के लिए एकतरफा शाकाहारी व्यवस्था रखी गई। इसके बाद शी जिनपिंग गाला डिनर में नहीं पहुंचे और यूएई के क्राउन प्रिंस भी दिनभर के कार्यक्रमों के बाद जल्दी रवाना हो गए। मेहमान गए तो गए—लेकिन सवाल यह है कि जिस भारत की परंपरा ‘अतिथि देवो भवः’ की रही है, उसने इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मेहमानों की पसंद और सुविधा को इतना पीछे क्यों रखा? BRICS कोई घरेलू सरकारी कार्यक्रम नहीं था, जहां एक ही तरह का मेन्यू सब पर लागू कर दिया जाए। यह अलग-अलग सभ्यताओं, संस्कृतियों और देशों का मंच था। अंतरराष्ट्रीय मेजबानी का मतलब सिर्फ भव्य मंच और लाल कालीन नहीं होता; उसमें मेहमानों की संस्कृति और जरूरतों का सम्मान भी शामिल होता है। दुनिया के सामने भारत अपनी सभ्यतागत ताकत दिखाना चाहता है और उसी समय अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के लिए भोजन तक में इतनी संकीर्णता दिखाई दे—तो यह कैसी वैश्विक मेजबानी है?

गाजा पर एक भाषा, इजरायल के साथ दूसरी तस्वीर

दिल्ली BRICS घोषणापत्र में गाजा में युद्धविराम, मानवीय सहायता, फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन के विरोध और 1967 की सीमाओं के आधार पर दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन की बात कही गई। एकतरफा प्रतिबंधों का भी विरोध किया गया। लेकिन उसी दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इजरायल के प्रधानमंत्री और यहूदी समुदाय को रोश हशनाह की शुभकामनाएं देना भारत की विदेश नीति के विरोधाभास को सामने लाता है। सवाल शुभकामना देने का नहीं, सवाल उस व्यापक राजनीतिक संदेश का है जो दुनिया तक जाता है। एक तरफ ग्लोबल साउथ के मंच पर फिलिस्तीन के अधिकारों और गाजा में मानवीय संकट की बात, दूसरी तरफ इजरायल के साथ लगातार मजबूत रणनीतिक साझेदारी—तो आखिर भारत की स्पष्ट प्राथमिकता क्या है? अगर भारत ग्लोबल साउथ की आवाज बनने का दावा करता है, तो उसे पश्चिम एशिया के सबसे बड़े संकट पर अपनी नीति में वह स्पष्टता दिखानी होगी जिसकी दुनिया उससे अपेक्षा करती है। कूटनीति में हर दरवाजा खुला रखना ठीक है, लेकिन हर दरवाजे पर अलग भाषा बोलने से विश्वसनीयता नहीं बनती।

शी जिनपिंग आए, हाथ मिलाया और चले गए—लेकिन असली सवाल वहीं

करीब सात साल बाद शी जिनपिंग भारत आए। मोदी और शी की मुलाकात हुई। दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने, व्यापार और सीमा पर शांति जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। लेकिन चीन के साथ वास्तविक समस्या हाथ मिलाने से खत्म नहीं होगी। सीमा पर भरोसा, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक निर्भरता—ये तीनों भारत के सामने खड़े हैं। क्या इस मुलाकात के बाद 112 अरब डॉलर का व्यापार घाटा कम करने की कोई समयसीमा बनी? क्या महत्वपूर्ण सप्लाई चेन पर निर्भरता घटाने का कोई ठोस तंत्र बना? क्या सीमा पर स्थायी भरोसे की कोई नई व्यवस्था सामने आई? अगर नहीं, तो फिर शी जिनपिंग की भारत यात्रा को सिर्फ ऐतिहासिक तस्वीरों और कूटनीतिक गर्मजोशी से मापना किस काम का? चीन की रणनीति लंबे समय की होती है। भारत को भी तस्वीरों से आगे जाकर उसी स्तर की दीर्घकालिक रणनीति चाहिए। हाथ मिलाना कूटनीति की शुरुआत हो सकता है, लेकिन रणनीतिक सफलता का प्रमाण नहीं।

रूस को भरोसा, चीन पर दबाव और अमेरिका से दोस्ती—आखिर नीति है क्या?

मोदी सरकार की विदेश नीति का दावा है कि भारत किसी एक शक्ति के खेमे में नहीं है और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखता है। लेकिन आज भारत को रूस के साथ पुराने रक्षा संबंधों को बचाना है, अमेरिका के साथ तकनीकी और आर्थिक साझेदारी बढ़ानी है, चीन के साथ सीमा विवाद और व्यापार घाटे से निपटना है, ईरान के साथ चाबहार को आगे बढ़ाना है और खाड़ी देशों से ऊर्जा तथा निवेश संबंध भी मजबूत रखने हैं। समस्या यह है कि इन सभी दिशाओं में संतुलन बनाने के प्रयास के बीच भारत की अपनी स्वतंत्र रणनीतिक प्राथमिकता कई बार धुंधली दिखाई देती है। रूस को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं, अमेरिका को नाराज करना संभव नहीं, चीन को नजरअंदाज करना संभव नहीं और ईरान से दूरी भारत के लिए महंगी हो सकती है। ऐसे में रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि भारत इन शक्तियों के बीच अपने हितों को कितना प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाता है। अगर हर तरफ संबंध बचाने में ऊर्जा खर्च हो और अंत में कोई बड़ा रणनीतिक लाभ हाथ न आए तो इसे रणनीतिक सफलता कैसे कहा जाएगा?

 

घोषणापत्र 140 बिंदुओं का, लेकिन असली उपलब्धि कितनी?

नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख, पहलगाम हमले की निंदा, आतंक वित्तपोषण और सुरक्षित ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई, वैश्विक शासन सुधार, महिलाओं की भागीदारी, ऊर्जा सुरक्षा, गाजा में युद्धविराम और एकतरफा प्रतिबंधों पर चिंता जैसे कई मुद्दे शामिल हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्रों का इतिहास बताता है कि शब्द लिखना आसान है, उन्हें जमीन पर उतारना मुश्किल। अगर आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख है तो साझा कार्रवाई का तंत्र कहां है? अगर वैश्विक संस्थाओं में ग्लोबल साउथ की आवाज बढ़ानी है तो उसकी समयसीमा क्या है? अगर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना है तो लक्ष्य क्या है? अगर ऊर्जा सुरक्षा साझा करनी है तो आपसी ऊर्जा सुरक्षा व्यवस्था कब बनेगी? अगर डॉलर के दबदबे को चुनौती देनी है तो वैकल्पिक वित्तीय ढांचा कब तैयार होगा? इन सवालों का जवाब घोषणापत्र में ढूंढना मुश्किल है। इसलिए 140 बिंदुओं की संख्या बड़ी जरूर है, लेकिन कूटनीतिक वजन तभी बढ़ेगा जब इनमें से ठोस परिणाम निकलेंगे। वरना 45 पन्नों का घोषणापत्र भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की लंबी सूची में एक और दस्तावेज बनकर रह जाएगा।

ग्लोबल साउथ का नेता बनने का दावा और जमीन की हकीकत

भारत खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में प्रस्तुत करता है। यह भूमिका भारत के इतिहास और आकार के लिहाज से स्वाभाविक भी है। लेकिन नेतृत्व सिर्फ मंच पर भाषण देने से नहीं मिलता। नेतृत्व तब मिलता है जब दूसरे देश आपकी आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक क्षमता पर भरोसा करें। आज दुनिया बदल रही है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा तेज है, रूस और पश्चिम के बीच टकराव गहरा है, पश्चिम एशिया लगातार अस्थिर है, ऊर्जा सुरक्षा बड़ा हथियार बन चुकी है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा महत्वपूर्ण खनिज भविष्य की शक्ति का हिस्सा बन रहे हैं। ऐसे समय में भारत को केवल सम्मेलन आयोजित करने वाला देश नहीं, बल्कि नियम बनाने और नियम बदलने वाली शक्ति बनना होगा। लेकिन इसके लिए घरेलू आर्थिक ताकत, तकनीकी आत्मनिर्भरता, विनिर्माण क्षमता, मजबूत संस्थान और स्पष्ट विदेश नीति चाहिए। केवल “विश्वगुरु” या “ग्लोबल साउथ” कह देने से कोई देश वैश्विक शक्ति नहीं बन जाता। वैश्विक नेतृत्व का प्रमाण मंच की ऊंचाई नहीं, फैसलों के प्रभाव से मिलता है।

फ्लॉप शो का सबसे बड़ा सबक

दिल्ली का BRICS सम्मेलन मोदी सरकार की विदेश नीति की उस शैली को सामने लाता है जिसमें प्रस्तुति बहुत बड़ी है, लेकिन रणनीतिक परिणामों पर सवाल उससे भी बड़ा है। मंच सजा, नेता आए, हाथ मिले, तस्वीरें बनीं, घोषणापत्र आया और कैमरे चले गए। लेकिन चीन का 112 अरब डॉलर का व्यापार घाटा अभी भी है। डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर हावी है। महत्वपूर्ण सप्लाई चेन में भारत की निर्भरता अभी भी है। BRICS की साझा मुद्रा अभी भी सपना है। गाजा पर घोषणाएं और इजरायल के साथ रणनीतिक रिश्तों का विरोधाभास अभी भी है। रूस-अमेरिका-चीन-ईरान के बीच भारत की रणनीतिक दिशा पर सवाल अभी भी है। यही तो असली फ्लॉप शो है—जब आयोजन की चमक खत्म होने के बाद वही पुराने सवाल सामने खड़े मिलें।

और अब सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से होना चाहिए—क्या विदेश नीति का मतलब केवल दुनिया के बड़े नेताओं को भारत बुलाना है, या भारत को दुनिया की बड़ी रणनीतिक ताकत बनाना भी है? क्या BRICS के 140 बिंदु भारत की शक्ति बढ़ाएंगे या फिर अगली सुर्खियों तक फाइलों में दबे रहेंगे? क्या 112 अरब डॉलर का चीन व्यापार घाटा घटेगा या अगले साल नया रिकॉर्ड बनेगा? क्या डॉलर को चुनौती देने का सपना कभी वास्तविक व्यवस्था बनेगा? क्या भारत ग्लोबल साउथ का वास्तविक नेता बनेगा या केवल उसके सम्मेलनों का शानदार मेजबान?

और सबसे बड़ा सवाल—अगर इतने बड़े मंच, इतनी बड़ी मेजबानी और इतनी बड़ी राजनीतिक ब्रांडिंग के बाद भी भारत की मूल रणनीतिक समस्याएं वहीं खड़ी हैं, तो फिर इसे कूटनीतिक विजय कहने की जिद क्यों?

BRICS का मेगा शो खत्म हो गया। कैमरे बंद हो गए। मेहमान लौट गए। घोषणापत्र जारी हो गया। लेकिन अगर चीन का घाटा, डॉलर की ताकत, रणनीतिक निर्भरता और विदेश नीति के सवाल जस के तस हैं—तो इतिहास में यह आयोजन किस नाम से दर्ज होगा? नौ दिन चले अढ़ाई कोस—BRICS का मेगा शो, रणनीति का फ्लॉप शो।

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