अंतरराष्ट्रीय डेस्क 28 दिसंबर 2025
गाजा की ज़मीन पर सिर्फ इमारतें नहीं ढह रहीं, सच की आवाज़ भी मलबे में दबाई जा रही है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, इजरायल–गाजा युद्ध के दौरान अब तक करीब 300 फिलिस्तीनी पत्रकारों की मौत हो चुकी है, जबकि उनके 700 से अधिक परिजन भी हमलों की भेंट चढ़ चुके हैं। यह आंकड़े महज संख्या नहीं हैं—ये उन परिवारों की टूटी हुई ज़िंदगियों की कहानी हैं, जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे सच्चाई को कैमरे और कलम के ज़रिए दुनिया तक पहुंचा रहे थे।
गाजा में काम करने वाले पत्रकार सबसे खतरनाक हालात में रिपोर्टिंग कर रहे हैं। न बंकर हैं, न सुरक्षित रास्ते, न ही यह भरोसा कि प्रेस जैकेट उन्हें बचा पाएगी। कई मामलों में पत्रकारों के घरों को ही निशाना बनाया गया—जहां बच्चे, बुज़ुर्ग और महिलाएं मौजूद थीं। सवाल उठता है कि क्या यह महज़ “कोलैटरल डैमेज” है, या फिर मीडिया को चुप कराने की सुनियोजित रणनीति?
विश्लेषकों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि गाजा में स्वतंत्र रिपोर्टिंग इजरायली सरकार के लिए असहज सच्चाइयों को उजागर करती है—नागरिकों पर हमले, अस्पतालों और स्कूलों का तबाह होना, और मानवीय संकट की भयावह तस्वीरें। ऐसे में पत्रकारों को निशाना बनना, या उनके परिवारों पर दबाव बनना, सूचना युद्ध का हिस्सा लगता है—जहां बमों के साथ-साथ नैरेटिव भी नियंत्रित किया जाता है।
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर आरोप हैं कि उनकी सरकार मीडिया कवरेज को सीमित करने, अंतरराष्ट्रीय आलोचना से बचने और जमीनी सच्चाइयों को धुंधला करने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि गाजा में पत्रकारों के लिए काम करना मौत को न्योता देने जैसा हो गया है। कई पत्रकार आख़िरी सांस तक रिपोर्टिंग करते पाए गए—किसी का कैमरा गिरा, किसी की कलम।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं—क्या युद्ध में भी पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं? प्रेस की आज़ादी और मानवाधिकारों की बातें करने वाली दुनिया गाजा में मारे गए पत्रकारों के लिए कब और कैसे जवाबदेही तय करेगी? संयुक्त राष्ट्र और मीडिया संगठनों की अपीलें अब तक ज़मीन पर सुरक्षा में नहीं बदल सकीं।
गाजा की यह त्रासदी याद दिलाती है कि जब पत्रकार मारे जाते हैं, तो सिर्फ लोग नहीं मरते—सच भी घायल होता है। और जब सच दबाया जाता है, तो युद्ध और लंबा, और ज़्यादा बेरहम हो जाता है।




