साजिद अली। कोलकाता 1 दिसंबर 2025
पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ऑफ इलेक्ट्रोरल रोल्स को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने आज एक बार फिर बड़ा हमला बोला है। दिलचस्प बात यह है कि यह वही बीजेपी है जो अक्सर अपने ‘होलियर दैन दाओ’ यानी नैतिक रूप से श्रेष्ठ होने वाले राजनीतिक विमर्श का दावा करती है, लेकिन इस बार उसने खुद स्वीकार किया कि SIR की प्रविष्टियाँ भी धांधली का शिकार हो सकती हैं। पार्टी ने सीधे तौर पर कहा कि 1.25 करोड़ प्रविष्टियों की जांच हो, क्योंकि तीन दिनों के भीतर इतनी बड़ी संख्या में एंट्री होना डेटा में गड़बड़ी का स्पष्ट संकेत है। लेकिन इसी के साथ यह बड़ा सवाल भी उभर रहा है कि—जब बिहार में ऐसी ही शिकायतें विपक्ष उठा रहा था, तब बीजेपी इतने मुखर क्यों नहीं थी? क्यों तब इसे प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया, और आज बंगाल में इसे “संदिग्ध राजनीतिक हस्तक्षेप” कहा जा रहा है?
सोमवार को विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी और बीजेपी के कई विधायक मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के दफ्तर पहुंचे। बैठक के दौरान उन्होंने निर्वाचन आयोग से कहा कि I-PAC नामक राजनीतिक कंसल्टेंसी एजेंसी डेटा एंट्री प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रही है, जिससे तय समय में एंट्री का असामान्य रूप से बढ़ जाना शक को और गहरा करता है। बीजेपी नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि यदि चुनाव आयोग वास्तव में निष्पक्ष है, तो उसे यह सिद्ध करना होगा कि इस तरह की प्रविष्टियों में किसी प्रकार की राजनीतिक मदद या दबाव शामिल नहीं है।
उधर, दफ्तर के बाहर BLO अधिकार रक्षा समिति के सदस्यों ने प्रदर्शन किया और SIR कार्य पूरा करने के लिए अधिक समय की मांग रखी। उनका कहना था कि इतनी कम समय सीमा में कार्य पूरा करने का दबाव खुद प्रशासन की ओर से आ रहा है, जिससे संपूर्ण प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। बीजेपी अब इस तर्क को भी पकड़ चुकी है और इसे चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दल के बीच “अघोषित समझदारी” का संकेत बता रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बीजेपी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से माना कि SIR डेटा एंट्री में हेरफेर संभव है। इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या बीजेपी चुनाव आयोग पर वैसा ही भरोसा रखती है जैसा वह सार्वजनिक मंचों पर जताती है—या फिर भरोसा चुनिंदा राज्यों और चुनिंदा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदल जाता है? विपक्ष पहले से आरोप लगाता रहा है कि कई राज्यों में चुनाव आयोग की कार्रवाई सरकार और केंद्र से प्रभावित रहती है, और अब बीजेपी का यह रवैया उसी debate को और धार दे रहा है।
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि चुनाव आयोग इस शिकायत पर कैसी प्रतिक्रिया देता है। क्या वह ऑडिट की मांग मानकर खुद को पारदर्शी साबित करेगा? या फिर बीजेपी की इस राजनीतिक चाल को नज़रअंदाज़ करेगा? यह प्रकरण सिर्फ बंगाल की राजनीति नहीं, बल्कि देश में चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।




