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बिहार में ‘विकास’ पगला गया है: रेवड़ी मॉडल पर 40,000 करोड़ की बारिश, इंफ्रास्ट्रक्चर हाशिए पर

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महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 16 नवंबर 2025

बिहार में जिस विकास मॉडल की आज चर्चा हो रही है, वह वास्तविक प्रगति का नहीं बल्कि चुनावी गणित का मॉडल है—जहाँ सड़कें, पुल, अस्पताल, बिजली, पानी और उद्योगों से पहले रेवड़ियों का भारी-भरकम खर्च प्राथमिकता बन चुका है। राज्य के बजट दस्तावेज़ों और आर्थिक विश्लेषणों के मुताबिक, चुनाव से पहले जिस तरह से ‘वोट-कैप्चर’ की रणनीति के तहत मुफ्त योजनाओं और नकद प्रोत्साहनों की बरसात हुई है, उसका कुल बोझ लगभग ₹40,000 करोड़ रुपए, यानी राज्य के GDP का करीब 4% बैठता है। यह आंकड़ा इतना विशाल है कि यह राज्य के पूरे वार्षिक पूंजीगत निवेश (capital expenditure) यानी वास्तविक विकास बजट से भी कहीं अधिक है। इसका सीधा मतलब है—बिहार ने अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को उलट-पुलट कर दिया है, और इंफ्रास्ट्रक्चर से ऊपर चुनाव को रख दिया है।

जब मुफ्त बिजली, पेंशन और छात्रवृत्ति का कुल खर्च सड़क निर्माण से अधिक हो जाए

मुफ्त बिजली की योजना पर FY26 में अनुमानित ₹74 अरब, यानी 7,400 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सामाजिक पेंशन को बढ़ाकर ₹400 से ₹1,100 करने का बोझ लगभग ₹4,600 करोड़ है। छात्रों के लिए नई मासिक स्कॉलरशिप योजनाओं—हाई स्कूल पास के लिए ₹4,000, इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग वालों के लिए ₹5,000, स्नातक–स्नातकोत्तर छात्रों के लिए ₹6,000—का खर्च करीब ₹700 करोड़ बैठता है। मेडिकल इंटर्न्स के लिए बढ़ी हुई स्टाइपेंड का प्रभाव नगण्य है, लेकिन सबसे बड़ा झटका महिलाओं को दिया जाने वाला ₹10,000 ग्रांट और छह महीने बाद ₹2 लाख का ऋण है, जिसका बोझ अकेले ₹27,700 करोड़ से ज़्यादा बैठेगा।

यह सब मिलाकर बिहार केवल चुनावी साल में ₹40,000 करोड़ से ज्यादा सिर्फ उन योजनाओं पर खर्च कर रहा है जो सीधे जेब में जाती हैं—जिनका उद्देश्य जीवन स्तर सुधारने से ज्यादा चुनावी लाभ उठाना लगता है।

बिहार में ‘इंफ्रास्ट्रक्चर की राजनीति’ को बदलकर कर दिया गया है ‘तुरंत कैश की राजनीति’

इस भारी खर्च का सबसे बड़ा खतरा यह है कि राज्य की वास्तविक ज़रूरतें—नई सड़कें, ग्रामीण कनेक्टिविटी, अस्पतालों का आधुनिकीकरण, स्कूलों का निर्माण, स्वास्थ्य उपकेंद्रों की कमी, उद्योगों का अभाव—ये सब अब बजट संरचना में द्वितीयक हो गए हैं।

पूरे वित्तीय वर्ष में बिहार जितना पूंजीगत निवेश करता है, उससे अधिक पैसा अब सीधे ‘चुनावी उपहारों’ पर खर्च हो रहा है। यह उस राज्य की कहानी है जो पहले ही देश के सबसे गरीब राज्यों में गिना जाता है, जहाँ प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से आधी से भी कम है। ऐसे में, जब विकास की हर दिशा में बिहार को दोगुनी गति से आगे बढ़ने की आवश्यकता है, तब उसकी ऊर्जा और बजट चुनावी रेवड़ियों में खप रहा है।

‘वोटों की खरीद’ को अब नीति का नाम दे दिया गया है

पिछले कुछ महीनों में जो ₹10,000 महिलाओं के खातों में भेजे गए—जिसे कई राजनीतिक विशेषज्ञ खुले तौर पर चुनावी रिश्वत कह रहे हैं—वह इस पूरी रणनीति की रीढ़ बनी। चुनाव निकलते ही, वित्तीय रिपोर्ट्स बता रही हैं कि इसकी वजह से बिहार का वित्तीय भार इतिहास में पहली बार इतना अधिक बढ़ गया। इस पैसे को उद्योग लगाने, नई सड़कों की फंडिंग, स्वास्थ्य ढांचे या स्कूली शिक्षा के लिए खर्च करने के बजाय इसे ‘जनता को खुश रखने’ की तात्कालिक रणनीति बना दिया गया। विडंबना यह है कि इसे ही ‘विकास मॉडल’ कहकर प्रचारित किया जा रहा है—जबकि इसमें दीर्घकालिक विकास की एक भी ईंट नहीं जुड़ रही। यह ऐसा है जैसे—“कल की पीढ़ियों के भविष्य को गिरवी रखकर आज की वोट-तिजोरी को भरना।”

सवाल यह नहीं कि रेवड़ियाँ गलत हैं—सवाल यह है कि क्या पूरा बजट सिर्फ रेवड़ियाँ होगा?

बिहार में गरीबी गहरी है, बेरोज़गारी अधिक है, और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की आवश्यकता भी वास्तविक है। परंतु जब पूरा बजट संतुलन खोकर 4% GDP तक सिर्फ मुफ्त योजनाओं में बहने लगे, तब यह अर्थशास्त्र नहीं, चुनावी इंजीनियरिंग बन जाता है। अगर चुनाव जीतने के लिए वित्तीय अनुशासन को इस तरह तिलांजलि दी जाती रहेगी, तो राज्य की आर्थिक सेहत को भारी नुकसान होगा। आने वाले वर्षों में सामाजिक योजनाओं की फंडिंग और कठिन हो जाएगी, कर्ज़ बढ़ेगा, और विकास परियोजनाओं की रफ्तार और धीमी होगी।

यह विकास नहीं—वोटों के बदले आर्थिक आत्मसमर्पण है

बिहार में आज जो हो रहा है, वह केवल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि एक खतरनाक वित्तीय मिसाल है। संदेश साफ है— “सड़कें–अस्पताल–स्कूल बाद में, चुनाव पहले।” और अगर यही दिशा जारी रही, तो आने वाले वर्षों में बिहार का आर्थिक ढांचा और कमजोर होगा, विकास और पिछड़ जाएगा, और राज्य फिर उसी पुराने दुष्चक्र में फंस जाएगा—जहाँ राजनीति तरक्की से बड़ी हो जाती है।

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