एबीसी नेशनल न्यूज | 31 जनवरी 2026
वैशाली (बिहार)। Bihar के Vaishali जिले से सामने आई यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक विफलता की कहानी है, बल्कि समाज के उस कड़वे सच को भी उजागर करती है, जहां आज भी जाति के नाम पर इंसान की गरिमा को कुचला जा रहा है। यहां एक महादलित परिवार को अपनी बुजुर्ग महिला के शव को श्मशान घाट तक ले जाने से रोक दिया गया। परिजन शव को कंधे पर उठाए रास्ता खोलने की गुहार लगाते रहे, हाथ जोड़ते रहे, लोगों से विनती करते रहे, लेकिन उन्हें आगे बढ़ने नहीं दिया गया। हालात इतने अमानवीय हो गए कि अंततः मजबूर होकर परिवार को बीच सड़क पर ही अंतिम संस्कार करना पड़ा। यह दृश्य जिसने भी देखा, वह स्तब्ध रह गया।
स्थानीय लोगों के अनुसार, जिस रास्ते से शव को श्मशान ले जाया जाना था, वहां जानबूझकर बाधा खड़ी की गई। परिवार ने घंटों इंतजार किया कि शायद प्रशासन पहुंचेगा, रास्ता खुलवाया जाएगा और सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो सकेगा। लेकिन न तो समय पर पुलिस पहुंची और न ही किसी अधिकारी ने हस्तक्षेप किया। हालात ऐसे बन गए कि शोक में डूबे परिवार के पास कोई विकल्प नहीं बचा। मजबूरी में सड़क पर ही चिता सजाई गई और वहीं अंतिम संस्कार किया गया। यह सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं थी, बल्कि पूरे समाज के लिए शर्मसार करने वाला क्षण था।
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब यह सब हो रहा था, तब स्थानीय प्रशासन कहां था? क्या किसी की मौत के बाद भी उसे जाति के नाम पर अपमान झेलना पड़ेगा? जिन लोगों ने शव को श्मशान तक ले जाने से रोका, उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की गई? बताया जा रहा है कि घटना के बाद भी प्रशासन की प्रतिक्रिया बेहद धीमी रही। न तो मौके पर तुरंत रास्ता खुलवाया गया और न ही दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की कोई ठोस जानकारी सामने आई।
इस घटना ने बिहार की BJP-JDU सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब अंतिम संस्कार जैसे बुनियादी और संवैधानिक अधिकार की भी रक्षा नहीं हो पा रही, तो सामाजिक न्याय और सुशासन के दावे किस हकीकत पर टिके हैं। दलित अधिकार संगठनों ने मांग की है कि दोषियों पर तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और पीड़ित परिवार को न्याय व सुरक्षा दी जाए। वैशाली की यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि कानून, संविधान और बराबरी की बातें जमीनी हकीकत में कितनी खोखली साबित हो रही हैं। अब निगाहें सरकार और प्रशासन पर टिकी हैं—क्या इस मामले में सिर्फ बयान आएंगे या सच में न्याय होगा।




