सरोज सिंह | पटना 5 नवंबर 2025
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का पहला चरण प्रचार के चरम पर है, जहाँ चुनावी रणनीतियाँ राज्य की चिरपरिचित राजनीतिक धुरी—जाति-आधारित लामबंदी और वंशवादी (परिवारवाद) प्रभाव—के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। विस्तृत तथ्यात्मक सत्यापन से यह स्पष्ट होता है कि, भले ही युवा बेरोजगारी और प्रवासन जैसे सामाजिक-आर्थिक मुद्दे चर्चा में हैं, लेकिन उम्मीदवार चयन से लेकर वोट बैंक की गोलबंदी तक, पारंपरिक समीकरण आज भी चुनाव के परिणाम निर्धारित करने की कुंजी बने हुए हैं। 2023 के जाति सर्वेक्षण और चुनाव आयोग के नवीनतम आंकड़ों के विश्लेषण से ये प्रवृत्तियाँ पुष्ट होती हैं।
जाति का अटल केंद्र: उम्मीदवार चयन और वोट समीकरण
बिहार की चुनावी रणनीति में जाति आज भी अपरिहार्य केंद्र बिंदु है। विभिन्न राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चयन विशुद्ध रूप से जातिगत समीकरणों के आधार पर कर रहे हैं, जिससे कई विधानसभा क्षेत्रों में विजेता की जाति पहले से ही लगभग तय हो जाती है। सत्ताधारी गठबंधन (NDA) ने अपनी रणनीति में सवर्ण जातियों को एक मज़बूत आधार दिया है, जहाँ उन्होंने 49 सामान्य वर्ग के उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण प्रमुख हैं। विशेष रूप से, भूमिहार समुदाय, जो कुल आबादी का एक छोटा हिस्सा है, लेकिन कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है, को बड़ी संख्या में प्रतिनिधित्व दिया गया है। वहीं, जनता दल (यूनाइटेड) ने ओबीसी और ईबीसी उम्मीदवारों को टिकट देकर सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाला महागठबंधन अपने पारंपरिक M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर दृढ़ता से टिका है, जिसके तहत बड़ी संख्या में यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया है।
इस बार दोनों प्रमुख गठबंधनों द्वारा कुशवाहा (कोइरी) उम्मीदवारों को समान संख्या में टिकट देना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राज्य की 30-35 सीटों पर इस समुदाय का वोट निर्णायक हो सकता है। 2023 के जाति सर्वेक्षण के आंकड़े, जो ईबीसी, ओबीसी, एससी और एसटी की बड़ी आबादी को दर्शाते हैं, यह प्रमाणित करते हैं कि प्रभावशाली जातियों (जैसे यादव, मुस्लिम, कुर्मी-कोएरी) के रणनीतिक वितरण के बिना सत्ता की राह मुश्किल है। पहले चरण के मतदान के लिए प्रमुख सीटों पर प्रचार का शोर स्पष्ट रूप से इस जाति-आधारित ध्रुवीकरण को प्रदर्शित करता है।
वंशवाद का वर्चस्व: विरासत पर आधारित राजनीति
वर्तमान चुनाव यह भी सिद्ध करते हैं कि बिहार की राजनीति में वंशवाद एक व्यापक और सर्वव्यापी प्रवृत्ति है। सत्यापन से पता चलता है कि 40 से अधिक उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके पारिवारिक संबंध पूर्व सांसद या विधायक से हैं। यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी प्रमुख गठबंधनों में गहरे तक व्याप्त है।
प्रमुख सहयोगी दलों, जैसे HAM और RLM, ने भी अपने परिवार के सदस्यों को बड़ी संख्या में टिकट दिए हैं। यहाँ तक कि भारतीय जनता पार्टी (BJP), जो अक्सर परिवारवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती है, ने भी कई सीटों पर राजनीतिक विरासत वाले उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। वहीं, RJD में लालू प्रसाद यादव के परिवार से कई प्रमुख उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं, जो इस दल में वंशवादी नेतृत्व की निरंतरता को दर्शाते हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि राज्य विधानसभा और परिषद में एक महत्वपूर्ण संख्या में सदस्य परिवार-केंद्रित पृष्ठभूमि से आते हैं।
राजनीतिक दल अक्सर इसे ‘परंपरा’ या ‘आर्थिक लाभ’ से जोड़कर सही ठहराते हैं, लेकिन यह चुनावी मैदान में स्वच्छ राजनीति के दावों को कमज़ोर करता है। चिराग पासवान जैसे नेता अपने दिवंगत पिता की राजनीतिक विरासत का प्रभावी ढंग से उपयोग करके अपने समुदाय (पासवान) के वोटों को एकजुट करने में सफल रहे हैं, जो वंशवादी राजनीति के गहरे प्रभाव को दर्शाता है।
पहले चरण का चुनावी परिदृश्य: आंकड़े और चुनौतियाँ
पहले चरण का चुनाव प्रचार, जो 4 नवंबर को अपने चरम पर था, 6 नवंबर को 121 सीटों पर मतदान के साथ संपन्न होगा। इस चरण में 3.75 करोड़ से अधिक मतदाता और 1,314 उम्मीदवार शामिल हैं। इन उम्मीदवारों में महिला प्रतिनिधित्व कम है और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की संख्या चिंताजनक है।
विश्लेषण से पता चलता है कि पहले चरण के कुल उम्मीदवारों में से लगभग एक-तिहाई पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास, और महिला-संबंधी अपराध जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। राजद (RJD) में आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों का अनुपात सबसे अधिक है।
यह विरोधाभास दर्शाता है कि राजनीतिक दल ‘स्वच्छ छवि’ के वादे के बावजूद, जाति और परिवार के जटिल समीकरणों को साधने के लिए आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को भी टिकट देने से नहीं हिचकिचाते। हालांकि, मतदान प्रतिशत में संभावित वृद्धि इस बात का भी संकेत है कि मतदाता अपने जातिगत हितों के प्रति जागरूक होकर मतदान कर रहे हैं।
उपरोक्त विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि जाति और परिवारवाद बिहार चुनाव की मूल संरचना बने हुए हैं और वे ही सत्ताधारी और विपक्षी गठबंधन के बीच शक्ति संतुलन को निर्धारित करते हैं। हालाँकि, इस चुनाव में युवा बेरोजगारी और प्रवासन जैसे सामाजिक-आर्थिक मुद्दों का उदय भी हो रहा है, जो जाति के पारंपरिक खेल को एक नई चुनौती दे रहे हैं। मतगणना के परिणाम ही यह तय करेंगे कि इस बार पारंपरिक समीकरणों का पलड़ा भारी रहेगा या नए मुद्दे निर्णायक साबित होंगे।




