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बजट FY27 से बड़ी उम्मीदें: स्थिरता काफी नहीं, अब ज़रूरत है मज़बूत बुनियाद की

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प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री

वित्त वर्ष 2026–27 यानी FY27 के बजट को लेकर पहली नज़र में तस्वीर कुछ सुकून देने वाली लगती है। देश की आर्थिक वृद्धि 7 प्रतिशत से ऊपर रहने की उम्मीद है, महंगाई महामारी के बाद के ऊँचे स्तर से नीचे आई है और सरकार का वित्तीय घाटा भी काबू में दिख रहा है। वैश्विक मंदी के माहौल में भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत नजर आती है। लेकिन बजट केवल अच्छे समय के लिए नहीं बनाए जाते, बल्कि आने वाली मुश्किलों से निपटने की तैयारी के लिए होते हैं। सच्चाई यह है कि इस चमकती तस्वीर के नीचे कई गहरी चुनौतियाँ छुपी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना FY27 के बजट के लिए भारी पड़ सकता है।

सबसे बड़ी चिंता आम लोगों की बचत को लेकर है। हाल के वर्षों में घरों की वित्तीय बचत घटकर जीडीपी के करीब 5.2 प्रतिशत पर आ गई है, जो दशकों में सबसे कम स्तरों में से एक है। इसका मतलब यह हुआ कि लोग ज़्यादा खर्च कर रहे हैं और कम बचा पा रहे हैं, साथ ही कर्ज भी बढ़ रहा है। सरकार को टैक्स से जो आमदनी हो रही है, वह भी काफी हद तक इसी बढ़े हुए खर्च पर टिकी है। लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती। जिस समाज में लोग बचत नहीं कर पा रहे हों, वहां से बार-बार टैक्स निकालना अर्थव्यवस्था को कमजोर बना सकता है। इसलिए FY27 बजट के लिए ज़रूरी है कि वह केवल उपभोग से होने वाली कमाई पर निर्भर न रहे, बल्कि रोजगार बढ़ाकर और निवेश को प्रोत्साहित करके टैक्स का आधार मजबूत करे।

सरकारी खर्च का एक और पहलू भी ध्यान देने लायक है। बीते कुछ सालों में सरकार ने पूंजीगत खर्च यानी इंफ्रास्ट्रक्चर पर खूब ज़ोर दिया है और यह अपने आप में एक सकारात्मक कदम है। सड़कें, रेल, पुल और अन्य ढांचे देश की रीढ़ होते हैं। लेकिन समस्या यह है कि इंसानों पर होने वाला निवेश, यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रिसर्च पर खर्च, उसी गति से नहीं बढ़ पाया है। शिक्षा पर खर्च आज भी जीडीपी के करीब 3 प्रतिशत पर ही अटका है, जबकि रिसर्च पर तो और भी कम। अगर हम केवल इमारतें और सड़कें बनाएंगे, लेकिन लोगों को योग्य और स्वस्थ नहीं बनाएंगे, तो इन ढांचों का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा। इसलिए बजट में मानव संसाधन पर खर्च को बढ़ाना बेहद ज़रूरी हो गया है।

सरकार ने हाल ही में राजस्व बढ़ाने के लिए पान मसाला, सिगरेट और तंबाकू जैसे उत्पादों पर जीएसटी बढ़ाया है और रेलवे किराए में भी बढ़ोतरी की गई है। इन कदमों से सरकारी खजाने को थोड़ी राहत ज़रूर मिलेगी, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF पहले ही चेतावनी दे चुका है कि आने वाले समय में सरकार को राजस्व संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसका मतलब है कि अब सिर्फ टैक्स बढ़ाकर काम नहीं चलेगा, बल्कि आर्थिक ढांचे को मजबूत बनाना होगा।

उद्योग और निवेश की हालत भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। भले ही ‘मेक इन इंडिया’ और PLI योजनाओं से कुछ निवेश और नौकरियां आई हों, लेकिन बड़े पैमाने पर निजी निवेश अभी भी झिझक रहा है। फैक्ट्रियों में उत्पादन की रफ्तार धीमी हो रही है और नए ऑर्डर कम हो रहे हैं। कंपनियाँ सरकारी भुगतान में देरी, नियमों की अनिश्चितता और MSME सेक्टर की कमजोर क्रेडिट व्यवस्था से परेशान हैं। अगर सरकार सच में निवेश बढ़ाना चाहती है, तो उसे समय पर भुगतान सुनिश्चित करना होगा, नियमों को सरल और पारदर्शी बनाना होगा और छोटे उद्योगों को लंबे समय के लिए पूंजी जुटाने में मदद करनी होगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जोखिम कम नहीं हैं। अमेरिका में यदि पुराने टैरिफ जैसे फैसले फिर लौटते हैं तो भारत के स्टील, दवाइयों और आईटी सेवाओं जैसे क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है। वहीं कई फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के बावजूद निर्यात में उतनी बढ़त नहीं हो पाई, जितनी उम्मीद थी। रूस के साथ व्यापार बढ़ा है, लेकिन वह अधिकतर तेल और ऊर्जा तक सीमित है। इससे भारत के उद्योगों को उतना फायदा नहीं मिल रहा जितना मिलना चाहिए। इसलिए FY27 बजट को केवल समझौतों पर नहीं, बल्कि देश की निर्यात क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।

कृषि क्षेत्र भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। देश की लगभग आधी आबादी खेती पर निर्भर है, लेकिन उसका योगदान जीडीपी में 20 प्रतिशत से भी कम है। उत्पादकता कम है, आमदनी अनिश्चित है और मौसम का खतरा लगातार बढ़ रहा है। बजट में अब तक ज़्यादातर ज़ोर सब्सिडी पर रहा है, लेकिन ज़रूरत है सिंचाई, भंडारण, फूड प्रोसेसिंग और फसल विविधीकरण जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की। अगर किसानों की आमदनी मजबूत नहीं होगी तो न तो खपत बढ़ेगी और न ही बचत।

एक और अहम मुद्दा है आम परिवारों की सुरक्षा। स्वास्थ्य खर्च, अचानक बीमारी या नौकरी जाने जैसी स्थितियाँ आज भी लाखों परिवारों को आर्थिक संकट में डाल देती हैं। जब तक लोगों को यह भरोसा नहीं होगा कि मुश्किल वक्त में उन्हें सहारा मिलेगा, तब तक वे न निवेश करेंगे और न जोखिम उठाएंगे। इसलिए बजट को केवल मदद बाँटने तक सीमित न रखकर स्वास्थ्य बीमा और आय सुरक्षा जैसे ठोस उपायों पर ज़ोर देना होगा।

सरल शब्दों में कहें तो FY27 बजट के सामने असली सवाल यह नहीं है कि भारत स्थिर रहेगा या नहीं — भारत शायद स्थिर रहेगा। असली सवाल यह है कि क्या यह स्थिरता टिकाऊ और सबको साथ लेकर चलने वाली वृद्धि में बदलेगी या नहीं। इसके लिए सरकार को साहसिक फैसले लेने होंगे, खर्च की प्राथमिकताएँ बदलनी होंगी और उन क्षेत्रों पर ध्यान देना होगा, जिन्हें अब तक नज़रअंदाज किया गया है।

भारत किसी बड़े वित्तीय संकट में नहीं है, लेकिन वह एक बड़े इम्तिहान के दौर में ज़रूर है। FY27 का बजट यह तय करेगा कि देश केवल आंकड़ों को संभालता रहेगा या वास्तव में अपनी आर्थिक नींव को मजबूत बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

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