(तेलंगाना, जनवरी – फरवरी 2025 की पृष्ठभूमि में विस्तृत विश्लेषण)
जनवरी 2025 का महीना तेलंगाना के लिए एक अप्रत्याशित उपभोक्ता संकट और नियामकीय उलझनों का मंच बन गया, जब राज्य में बीयर की आपूर्ति पर संकट गहराने लगा। यह विवाद केवल एक लोकप्रिय पेय की उपलब्धता से जुड़ा नहीं था, बल्कि इसमें सरकार की नीतिगत अक्षमता, उद्योग के हितों की टकराहट और बाजार की प्रतिक्रियाओं का जटिल परिदृश्य छिपा था। यूनाइटेड ब्रेवरीज (UB) द्वारा आपूर्ति रोके जाने से जो संकट खड़ा हुआ, उसने तेलंगाना की शराब वितरण प्रणाली और उससे जुड़ी नीतियों की बुनियादी कमजोरियों को उजागर कर दिया।
जनवरी के पहले सप्ताह में, UB (जो ‘किंगफिशर’ ब्रांड के लिए प्रसिद्ध है) ने राज्य में बीयर की आपूर्ति अचानक बंद कर दी। यह निर्णय कंपनी द्वारा लिए गए एक प्रतिरोधात्मक कदम के रूप में सामने आया — UB का आरोप था कि तेलंगाना राज्य सरकार ने लंबे समय से बकाया भुगतान नहीं किया है और बीयर की कीमतों में संशोधन की मंज़ूरी देने में भी अस्वाभाविक देरी की जा रही थी। यह देरी उस समय और अधिक महत्वपूर्ण हो गई जब उत्पादन लागत, इनपुट शुल्क और लॉजिस्टिक्स खर्चों में वृद्धि के बावजूद राज्य सरकार ने कंपनी के मूल्य संशोधन प्रस्ताव को बार-बार टाल दिया। इससे UB के लिए कारोबार जारी रखना वित्तीय दृष्टि से असंभव होता गया।
इस आपूर्ति अवरोध का असर राज्य भर में दिखाई देने लगा। खासकर हैदराबाद और रंगा रेड्डी जिलों के शहरी केंद्रों में शराब विक्रेताओं को बीयर की भारी कमी का सामना करना पड़ा। पब, बार, और खुदरा दुकानों पर बीयर की उपलब्धता 70% तक गिर गई, जिससे आम उपभोक्ताओं में असंतोष उत्पन्न हुआ और राज्य सरकार की आलोचना भी तेज़ हुई। इसके साथ ही राज्य को एक सप्ताह में ₹30 करोड़ से अधिक के राजस्व नुकसान का अनुमान लगाया गया, क्योंकि बीयर तेलंगाना के आबकारी राजस्व में एक महत्वपूर्ण हिस्सा रखती है। यह स्थिति राजनीतिक दृष्टि से भी संवेदनशील हो गई, क्योंकि विपक्ष ने इसे सरकार की “कुप्रबंधन और उद्योग-विरोधी नीति” करार दिया।
20 जनवरी को, सरकार और UB के बीच एक उच्चस्तरीय बैठक हुई जिसमें व्यापार को नुकसान और सार्वजनिक असुविधा को देखते हुए एक अंतरिम समाधान निकाला गया। सरकार ने मौखिक आश्वासन दिया कि भुगतान शीघ्र किया जाएगा और मूल्य संशोधन के लिए पुनः विचार होगा। इसके बाद आपूर्ति धीरे-धीरे फिर शुरू की गई, जिससे बाजार में कुछ राहत मिली। इस घटनाक्रम के बाद UB के शेयर में 6.3% का उछाल देखा गया, जो निवेशकों में विश्वास की वापसी का संकेत था। स्टॉक एक्सचेंज में इसे “सरकारी हस्तक्षेप से व्यापारिक राहत” की तरह देखा गया, जिसने अस्थायी संकट को थाम लिया।
हालांकि, विवाद का अंतिम समाधान 11 फरवरी को सामने आया, जब राज्य सरकार ने मूल्यवृद्धि को औपचारिक रूप से मंज़ूरी दे दी। सरकार द्वारा अनुमोदित संशोधन के बाद UB और अन्य कंपनियों को प्रति कैन और बोतल पर मूल्य बढ़ाने की अनुमति दी गई। यह फैसला सरकार पर दबाव में लिया गया प्रतीत हुआ, लेकिन इसके परिणामस्वरूप बीयर के खुदरा दामों में 8–10% की वृद्धि हुई, जिससे आम उपभोक्ता वर्ग में फिर से असंतोष की लहर उठी। इस मूल्यवृद्धि के बाद UB के शेयर में हल्की गिरावट दर्ज की गई — विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशक मूल्य वृद्धि के चलते संभावित मांग में गिरावट को लेकर चिंतित थे।
यह पूरा विवाद तेलंगाना की शराब नीति और उद्योग के साथ उसके व्यवहार के बीच असंतुलन को उजागर करता है। एक ओर सरकार अपने राजस्व स्रोत को बनाए रखने के लिए कंपनियों पर निर्भर है, तो दूसरी ओर वह जन भावना और राजनीतिक नीतियों के दबाव में उद्योग की आवश्यकताओं को दरकिनार करती दिखती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि शराब नीति में पारदर्शिता, समयबद्ध भुगतान प्रणाली और मूल्य निर्धारण पर पूर्वानुमेय प्रक्रिया सुनिश्चित नहीं की जाती, तो ऐसे विवाद दोहराए जा सकते हैं।
निष्कर्षतः, बीयर आपूर्ति विवाद ने न केवल तेलंगाना में शराब नीति की संरचना पर सवाल खड़े किए, बल्कि निवेशकों को भी यह चेतावनी दी कि सरकार-उद्योग सहयोग में विश्वसनीयता और संवाद की कमी बाजार पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। आने वाले समय में तेलंगाना को इस दिशा में दीर्घकालिक सुधारों की आवश्यकता होगी — ताकि राज्य राजस्व भी बना रहे, उपभोक्ताओं को राहत भी मिले और उद्योग का विश्वास भी बरकरार रह सके।




