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दिल्ली SIR में मुस्लिम मतदाताओं पर ज्यादा निशाना? आंकड़ों में बड़ा अंतर, चुनाव आयोग की सॉफ्टवेयर जांच पर सवाल

ड्राफ्ट मतदाता सूची में मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं के 13.6% हैं, लेकिन ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ में चिह्नित लोगों में उनकी हिस्सेदारी 20.3% और परिवार के आकार से जुड़े पांच मानकों में 30% रही।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 14 अक्टूबर 2026

दिल्ली में SIR के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सामने आए आंकड़ों ने चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल हो रहे सॉफ्टवेयर की जांच व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। ड्राफ्ट मतदाता सूची के विश्लेषण के अनुसार, मुस्लिम मतदाताओं को उनके कुल अनुपात की तुलना में अधिक संख्या में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगतियों के आधार पर चिह्नित किया गया।

आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 13.6% है, लेकिन तार्किक विसंगतियों के लिए चिह्नित मतदाताओं में उनकी हिस्सेदारी 20.3% रही। इसके अलावा, परिवार के आकार से संबंधित पांच मानकों के तहत चिह्नित लोगों में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 30% दर्ज की गई।

इन आंकड़ों ने यह सवाल खड़ा किया है कि मतदाता सूची की जांच में इस्तेमाल किए जा रहे मानक सभी समुदायों पर समान रूप से प्रभावी ढंग से लागू हो रहे हैं या नहीं।

ERONET सॉफ्टवेयर की भूमिका पर सवाल

विश्लेषण में सामने आया कि मतदाताओं को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर चिह्नित करने का काम केवल स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के स्तर पर नहीं हुआ, बल्कि भारतीय निर्वाचन आयोग के केंद्रीकृत ERONET सॉफ्टवेयर के जरिए भी यह प्रक्रिया संचालित की गई।

निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी मतदाता सूची के वैधानिक रूप से जिम्मेदार अधिकारी होते हैं। ऐसे में सॉफ्टवेयर के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं को चिह्नित किए जाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता, जांच के मानकों और मानवीय समीक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि किसी सॉफ्टवेयर के मानकों के कारण किसी विशेष समुदाय के मतदाता अनुपातहीन रूप से अधिक संख्या में चिह्नित होते हैं, तो यह जानना जरूरी है कि इसके पीछे वास्तविक दस्तावेजी विसंगतियां हैं या जांच के नियमों में कोई ऐसी कमी है, जिसका प्रभाव अलग-अलग समुदायों पर अलग पड़ रहा है।

हालांकि, केवल अधिक अनुपात में चिह्नित होने से यह अपने आप साबित नहीं होता कि सभी मामलों में गलत कार्रवाई हुई है। इसके लिए प्रत्येक श्रेणी के आंकड़ों, जांच के आधार और मतदाताओं को अपना पक्ष रखने के मिले अवसर का विस्तृत परीक्षण आवश्यक है।

मुस्लिम मतदाता 60% अधिक चिह्नित होने का विश्लेषण

प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली में मुस्लिम मतदाताओं के ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के तहत चिह्नित होने की संभावना गैर-मुस्लिम मतदाताओं की तुलना में लगभग 60% अधिक थी।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची से जुड़े किसी भी पुनरीक्षण में सभी पात्र नागरिकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। यदि किसी समुदाय के मतदाता अधिक संख्या में जांच के दायरे में आ रहे हैं, तो निर्वाचन आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसा किन कारणों से हो रहा है।

इसके लिए यह भी देखना होगा कि चिह्नित किए गए लोगों में कितने मामलों में वास्तविक विसंगतियां पाई गईं, कितनों को नोटिस जारी हुए, कितने मामलों का निपटारा हुआ और कितने मतदाताओं के नाम अंततः हटाए गए या बहाल किए गए।

बिहार के आंकड़ों से तुलना

विश्लेषण में बिहार के आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। वहां SIR के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ वाली जांच लागू नहीं थी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बिहार में हटाए गए मतदाताओं में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी 18.4% थी, जबकि राज्य की आबादी में उनकी हिस्सेदारी 17.7% बताई गई।

ये आंकड़े दिल्ली और बिहार की प्रक्रियाओं के बीच अंतर की ओर ध्यान दिलाते हैं। हालांकि, दोनों राज्यों की तुलना करते समय उनके अलग-अलग जनसांख्यिकीय स्वरूप, मतदाता सूची की स्थिति, नाम हटाने के कारणों और अपनाई गई प्रक्रियाओं को भी ध्यान में रखना होगा। केवल दो राज्यों के आंकड़ों के आधार पर किसी एक कारण को अंतिम रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

परिवार के आकार से जुड़े मानकों पर भी सवाल

दिल्ली में परिवार के आकार से संबंधित पांच कारणों के तहत चिह्नित मतदाताओं में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी 30% रही, जबकि ड्राफ्ट मतदाता सूची में उनकी हिस्सेदारी 13.6% है।

यह अंतर जांच के मानकों की समीक्षा की जरूरत को रेखांकित करता है। परिवार के आकार, पारिवारिक संबंधों और मतदाता रिकॉर्ड में मौजूद जानकारियों के बीच अंतर के कई कारण हो सकते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में दस्तावेजों की जांच और संबंधित मतदाताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का उचित अवसर मिलना चाहिए।

यदि सॉफ्टवेयर किसी परिवार में दर्ज मतदाताओं की संख्या या अन्य जानकारियों को विसंगति मानकर चिह्नित करता है, तो यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वास्तविक पारिवारिक परिस्थितियों के कारण किसी पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित न हो।

चुनाव आयोग के सामने पारदर्शिता की चुनौती

मतदाता सूची की शुद्धता लोकतांत्रिक व्यवस्था का बुनियादी हिस्सा है। गलत नामों को हटाना और पात्र मतदाताओं का नाम सूची में बनाए रखना—दोनों ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता को केवल तकनीकी विसंगति के कारण अपने अधिकार से वंचित नहीं होना चाहिए।

दिल्ली के आंकड़ों के बाद चुनाव आयोग के सामने कुछ महत्वपूर्ण सवाल हैं: ERONET सॉफ्टवेयर में विसंगतियां पहचानने के मानक क्या हैं? क्या इन मानकों का विभिन्न समुदायों पर पड़ने वाला प्रभाव नियमित रूप से जांचा जाता है? चिह्नित मतदाताओं के मामलों में मानवीय समीक्षा कैसे होती है? और क्या प्रभावित नागरिकों को अपने दस्तावेज प्रस्तुत करने तथा शिकायत का निपटारा कराने के लिए पर्याप्त समय मिलता है?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब से ही यह समझने में मदद मिलेगी कि सामने आया अंतर वास्तविक दस्तावेजी समस्याओं का परिणाम है या प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: दिल्ली SIR के आंकड़ों में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी और सॉफ्टवेयर जांच के दौरान चिह्नित लोगों में उनकी हिस्सेदारी के बीच उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है। यह अंतर स्वतंत्र समीक्षा और पारदर्शी स्पष्टीकरण की मांग करता है। अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले चिह्नित मामलों, उनके निपटारे और नाम हटाने के वास्तविक कारणों की जांच जरूरी है, ताकि मतदाता सूची की शुद्धता के साथ प्रत्येक पात्र नागरिक का मतदान अधिकार भी सुरक्षित रहे।

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