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अंकिता भंडारी हत्याकांड: ‘नहीं’ कहने की सज़ा, VIP की चुप्पी और सत्ता का बुलडोजर

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महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 10 जनवरी 2026

नौकरी के नाम पर शोषण: एक महीने में ही टूट गया भरोसा
उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी किसी बड़े सपने या ऐशो-आराम की तलाश में नहीं थी। वह एक साधारण नौकरी कर रही थी—BJP नेता विनोद आर्या के बेटे के रिजॉर्ट में। नौकरी को अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि 18 सितंबर को उस पर ऐसा दबाव डाला गया, जिसने पूरे सिस्टम की आत्मा पर सवाल खड़े कर दिए। आरोप है कि अंकिता से VIP मेहमानों को “अनैतिक सेवाएं” देने को कहा गया। यह सिर्फ एक आदेश नहीं था, यह सत्ता, पैसे और रसूख की क्रूर मानसिकता का प्रदर्शन था। लेकिन अंकिता ने इनकार कर दिया। एक गरीब परिवार की बेटी ने कहा—“नहीं।” और यही “नहीं” उसकी मौत की वजह बना दी गई।

इनकार की सज़ा: हत्या और शव को नहर में फेंकने का आरोप

आरोप है कि अंकिता के इनकार के बाद उसे बेरहमी से मार दिया गया और उसके शव को नहर में फेंक दिया गया, ताकि सबूत भी बह जाएं और मामला भी। यह सिर्फ एक हत्या नहीं थी, बल्कि यह संदेश था कि अगर कोई लड़की सत्ता-संरक्षित लोगों के सामने झुकेगी नहीं, तो उसका अंजाम क्या हो सकता है। यह सवाल आज भी डराता है कि अगर अंकिता उस रात बच जाती, तो क्या वह आज भी सुरक्षित होती?

19 से 22 सितंबर: चार दिन की रहस्यमयी खामोशी

हत्या के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि 19 से 22 सितंबर तक प्रशासन क्या कर रहा था? इन चार दिनों में न हत्या का केस दर्ज हुआ, न किसी तरह की सख़्त जांच शुरू हुई। सिर्फ एक गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई। न पुलिस की तत्परता दिखी, न शासन की गंभीरता। यह देरी सामान्य लापरवाही नहीं लगती, बल्कि एक ऐसी चुप्पी थी, जिसने आरोपों को और मजबूत किया कि किसी को समय दिया जा रहा था—सबूत मिटाने का, कहानी गढ़ने का।

बुलडोजर एक्शन या सबूत मिटाने की कार्रवाई?

23 सितंबर को जो हुआ, उसने पूरे देश को चौंका दिया। स्थानीय BJP विधायक रेनू बिष्ट ने मुख्यमंत्री पुष्कर धामी के निर्देश का हवाला देते हुए उसी रिजॉर्ट पर बुलडोजर चलवा दिया, जहाँ अंकिता रहती थी और जहाँ से यह पूरा मामला जुड़ा था। सवाल यह नहीं है कि अवैध निर्माण था या नहीं—सवाल यह है कि बिना किसी न्यायिक आदेश के, बिना फॉरेंसिक जांच पूरी किए, बुलडोजर क्यों चलाया गया? विपक्ष का आरोप साफ है—यह कार्रवाई सबूत नष्ट करने के लिए की गई, ताकि सच्चाई मलबे में दब जाए।

24 सितंबर: शव बरामद, लेकिन इंसाफ़ पर भरोसा खत्म

24 सितंबर को अंकिता का शव नहर से बरामद किया गया। लेकिन तब तक उसके माता-पिता का सिस्टम से भरोसा पूरी तरह टूट चुका था। उन्होंने बेटी का अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया। यह सिर्फ शोक नहीं था, यह सरकार और प्रशासन के खिलाफ एक मौन आरोप था—कि पहले सच सामने लाओ, फिर बेटी को विदा करेंगे।
गिरफ़्तारियां हुईं, लेकिन क्या सच पूरी तरह सामने आया?
मामले ने जब ज़ोर पकड़ा, तब पुलकित आर्या, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता की गिरफ्तारी हुई। जनता सड़कों पर उतरी, पूरे उत्तराखंड में गुस्सा फूट पड़ा। दबाव बढ़ा तो सरकार ने SIT का गठन किया और अक्टूबर 2022 में जांच सौंपी गई। अंततः तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सज़ा मिली। लेकिन सज़ा के साथ ही एक बड़ा सवाल भी बचा रहा—वो VIP कौन था, जिसके लिए अंकिता पर दबाव डाला गया?

तीन साल बाद भी VIP का नाम क्यों छुपा है?

तीन साल बीत चुके हैं। कोर्ट का फैसला आ चुका है। लेकिन VIP का नाम आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया। अगर VIP था—तो उसकी पहचान क्यों छुपाई गई?
अगर VIP नहीं था—तो SIT या सरकार ने आधिकारिक रूप से इसका खंडन क्यों नहीं किया? यह चुप्पी खुद एक आरोप बन चुकी है और यही चुप्पी लोगों को सड़कों पर उतरने को मजबूर कर रही है।

सीधे सवाल, जिनसे सरकार बचती दिख रही है

महिला कांग्रेस अध्यक्ष अलका लांबा ने सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं— अगर प्रधानमंत्री मोदी एक दिन में नोटबंदी कर सकते हैं, तो तीन साल में अंकिता को पूरा न्याय क्यों नहीं? अंकिता के पिता जिन अजय कुमार और दुष्यंत कुमार का नाम बार-बार लेते हैं, वे कहां हैं? क्या SIT ने उनसे पूछताछ की? बुलडोजर चलाने का आदेश किसने दिया और क्यों? क्या मंत्री के बेटे के शामिल होने पर सिर्फ निष्कासन ही पर्याप्त था? क्या महिला सुरक्षा कानून सत्ता-संरक्षित संस्थानों पर लागू नहीं होते?

उत्तराखंड में कानून व्यवस्था पर एक के बाद एक सवाल

अंकिता मामला अकेला नहीं है। कांग्रेस ने उत्तराखंड की हालिया घटनाओं की एक पूरी श्रृंखला गिनाई है—पेपर लीक के बावजूद दावे, फिर UKSSSC परीक्षा लीक, आंदोलन के बाद मजबूरी में CBI जांच, एंजल चकमा की नस्लीय हत्या और आरोपी का फरार होना, पुलिस कस्टडी में विनय त्यागी की हत्या, और आंदोलन के बीच हल्द्वानी में BJP पार्षद द्वारा युवक की गोली मारकर हत्या। सवाल है—क्या यह सब संयोग है या सिस्टम की विफलता?

इस्तीफे की मांग: मुख्यमंत्री जनता का भरोसा खो चुके हैं

इन तमाम घटनाओं को जोड़ते हुए कांग्रेस और महिला कांग्रेस ने कहा है कि देवभूमि उत्तराखंड में कानून का राज कमजोर पड़ चुका है। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी न सिर्फ प्रशासनिक रूप से फेल हुए हैं, बल्कि नैतिक रूप से भी जनता का भरोसा खो चुके हैं। इसलिए उनका इस्तीफा अब राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक मांग है।

मांगें साफ हैं, जवाब अब भी गायब

कांग्रेस की मांग है कि VIP एंगल की स्वतंत्र जांच हो, सबूत नष्ट करने वालों पर कार्रवाई हो, बुलडोजर चलाने वाली विधायक पर केस दर्ज हो, महिला कार्यस्थलों पर सुरक्षा कानून सख़्ती से लागू हों और CBI बिना दबाव 6 महीने में जांच पूरी करे।

अंकिता का नाम अब सवाल बन चुका है

अंकिता भंडारी अब सिर्फ एक नाम नहीं है। वह एक सवाल है—न्याय का, सत्ता की जवाबदेही का और इस देश में गरीब बेटी की कीमत का। जब तक VIP का नाम सामने नहीं आता, जब तक सबूत मिटाने वालों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह मामला खत्म नहीं होगा। यह लड़ाई सिर्फ अंकिता के लिए नहीं, हर उस बेटी के लिए है जो ‘नहीं’ कहने का हक़ रखती है।

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