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अंधेर नगरी चौपट राजा: सरकार नाम बदलने में व्यस्त, जनता महंगाई–बेरोज़गारी में त्रस्त

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एबीसी डेस्क 2 दिसंबर 2025

नाम बदलने की राजनीति—तुगलकी फैसलों का नया दौर

देश में शासन व्यवस्था जिस दिशा में जा रही है, वह वास्तविक विकास की बजाय प्रतीकात्मक नौटंकियों पर अधिक केंद्रित दिखाई देती है। राजभवन को ‘लोकभवन’ और प्रधानमंत्री कार्यालय को ‘सेवा तीर्थ’ नाम देने का कदम इसी मानसिकता का हिस्सा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है जैसे सत्ता ने अंधेर नगरी चौपट राजा की पुरानी कहानी को फिर से जीवंत कर दिया है, जहाँ निर्णय हकीकत पर नहीं, बल्कि कल्पनाओं पर आधारित होते हैं। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि नाम बदलने से शासन का चरित्र बदल जाएगा, जबकि जनता कह रही है—नाम बदलो या न बदलो, जमीन पर कुछ बदला नहीं।

नाम बदलने से विकास होता तो हर शहर विदेश बन चुका होता

सरकार का दावा है कि ‘लोकभवन’ और ‘सेवा तीर्थ’ व्यवस्था में सेवा भाव का प्रतीक हैं। लेकिन जनता का कटाक्ष बेहद तीखा है—अगर विकास नाम बदलने से होता, तो अब तक भारत विश्व की सबसे समृद्ध महाशक्ति बन चुका होता। लोग कह रहे हैं कि जब सरकार इतनी ही गंभीर है, तो सीतापुर को सिंगापुर, जौनपुर को जर्मनी, पलवल को पेरिस, गया को ग्लासगो, मुरैना को मोंटेनेग्रो, और झुंझुनू को जापान क्यों नहीं बना देती? सवाल यह है कि क्या सिर्फ नाम रखने से सड़कें चमक जाएंगी, उद्योग लग जाएंगे या बेरोज़गारी खत्म हो जाएगी? शायद नहीं। यही कारण है कि विपक्ष इसे “शब्दों की जादूगरी” और “काम से भागने की राजनीति” कह रहा है।

बढ़ती महंगाई—जनता की जेब पर सबसे बड़ा प्रहार

जब सरकार नाम बदलने में व्यस्त है, तब आम नागरिक महंगाई की मार से त्रस्त है। रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर रसोई के लिए जरूरी सामान तक सबकी कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है। दालें, सब्जियाँ, दूध, गैस सिलेंडर—हर चीज़ की कीमत लगातार बढ़ रही है। मध्यमवर्ग की बचत खत्म हो रही है, गरीब की रसोई बुझ रही है, और सरकार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि नाम बदलना ही बड़ा सुधार है। सवाल उठता है: क्या ‘लोकभवन’ का बोर्ड बदलने से आम आदमी की थाली में खाना बढ़ जाएगा?

बेरोज़गारी—युवाओं का भविष्य अंधकार में

देश का युवा वर्ग पहले से ही रोजगार के अभाव में संघर्ष कर रहा है। लाखों नौजवान वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, पर या तो पेपर लीक हो जाते हैं या भर्ती रद्द हो जाती है। सरकारी पद खाली पड़े हैं, लेकिन नियुक्तियाँ नहीं हो रहीं। निजी क्षेत्र में नौकरियाँ सीमित हैं और वेतन बेहद कम। ऐसे में युवा पूछ रहे हैं—क्या PMO को ‘सेवा तीर्थ’ बना देने से हमें नौकरी मिल जाएगी?
जब तक सरकार रोजगार सृजन पर ध्यान नहीं देगी, नामों की बाजीगरी बेरोज़गारों के लिए किसी मज़ाक से कम नहीं।

शिक्षा—गरीब के लिए अब पहुंच से बाहर

शिक्षा का निजीकरण जिस गति से बढ़ा है, उससे गरीब और मध्यमवर्ग दोनों ही परेशान हैं। स्कूलों और कॉलेजों की फीस आसमान छू रही है। सरकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संसाधन, स्टाफ और सुविधाओं की भारी कमी है। छात्रवृत्तियाँ घट रही हैं और तकनीकी शिक्षा तो खासकर गरीबों के लिए लगभग असंभव होती जा रही है। इस स्थिति में सरकार नाम बदलने की नई परियोजनाएँ लेकर आती है। जनता पूछती है—क्या ‘लोकभवन’ के उद्घाटन से किसी बच्चे की फीस कम होगी?

स्वास्थ्य सेवा—लाचार व्यवस्था और बेबस जनता

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था बार-बार अपनी कमजोरी दिखा चुकी है। सरकारी अस्पतालों में बेड नहीं, डॉक्टरों की कमी, दवाओं का अभाव और उपचार में देरी आम बात हो चुकी है। गरीब मरीज इलाज के लिए भटकते हैं, और कई जीवन समय पर इलाज न मिलने से समाप्त हो जाते हैं।

जब देश की चिकित्सा स्थिति इतनी गंभीर है, तब सरकार से उम्मीद थी कि वह अस्पताल बनाएगी, डॉक्टर बढ़ाएगी, सुविधाएँ सुधारेंगी—लेकिन सरकार उल्टा PMO का नाम ‘सेवा तीर्थ’ बताने में व्यस्त है। क्या यह जनता के साथ क्रूर मज़ाक नहीं?

चुनाव—जनता का विश्वास चोरी होने लगा है

लोकतंत्र का सबसे बड़ा स्तंभ चुनाव होते हैं, लेकिन आज देश में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप लगते हैं कि चुनाव “चोरी” से जीते जा रहे हैं—प्रशासनिक दबाव, मतगणना विवाद, ईवीएम के सवाल और मतदाता दमन जैसे मुद्दे लगातार उठ रहे हैं। जनता का विश्वास चुनावों से दूर होता जा रहा है। ऐसे समय में सरकार का प्राथमिक काम चुनावी सुधार और पारदर्शिता होना चाहिए था, लेकिन वह नाम बदलने की प्रतियोगिता में लगी है। क्या लोकतंत्र को मजबूत करने का यही तरीका है?

देश को नाम नहीं, काम चाहिए

राजभवन चाहे लोकभवन हो जाए और PMO चाहे सेवा तीर्थ—लेकिन असलियत यह है कि देश को नामों की नौटंकी नहीं बल्कि जिम्मेदार, ईमानदार और ठोस काम चाहिए। महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा–स्वास्थ्य संकट और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर सरकार की चुप्पी जनता को समझ आ रही है। लोग आज एक ही सवाल पूछ रहे हैं: नाम बदलकर देश बदलेगा या काम बदलकर? सच्चाई यह है कि जनता अब प्रतीकों की राजनीति नहीं, वास्तविक सुधार चाहती है।

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