सुनील कुमार । नई दिल्ली 10 दिसंबर 2025
जनता पर महँगाई का पहाड़, लेकिन सरकार का ध्यान ‘कॉरपोरेट आराम’ पर
भारत आज ऐसी आर्थिक मार झेल रहा है जिसकी तुलना किसी प्राकृतिक आपदा से की जा सकती है। महंगाई आम आदमी की रसोई से लेकर उसके रोज़मर्रा के जीवन तक को निगल रही है। सब्ज़ियों की कीमतें आसमान छू रही हैं, गैस सिलेंडर गरीब की पहुंच से बाहर हो चुका है, और पेट्रोल–डीजल की कीमतें आम आदमी की जेब का दम घोंट रही हैं। इस आर्थिक त्रासदी के बीच सरकार बार-बार “विकास” के दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। एक तरफ लोग बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, दूसरी तरफ कॉरपोरेट जगत के लिए सुविधाएं, रियायतें और संरक्षण की झड़ी लगाई जा रही है। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है—6.15 लाख करोड़ का कर्ज़ बट्टा-खाते में डालना। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकता क्या है और किसकी कीमत पर किसे बचाया जा रहा है।
बेरोजगारी चरम पर, लेकिन सरकार को दिख रहा है सिर्फ ‘बैलेंस शीट का मेकअप’
देश में बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर है। करोड़ों युवा डिग्री हाथ में लिए नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। निजी क्षेत्र धीमा है, सरकारी भर्तियाँ बंद या लटकाई जा रही हैं। कई मंत्रालयों में वर्षों से खाली पड़े पदों पर भर्ती रुक चुकी है। क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं कि वह युवाओं के लिए रास्ता बनाए? लेकिन सरकार का ध्यान युवाओं की मजबूरी पर नहीं, बल्कि उन बैंकों की बैलेंस शीट पर केंद्रित है जो बड़े-बड़े कॉरपोरेट समूहों को दिए गए कर्ज़ के नीचे दबे पड़े थे। इसी मेकअप ऑपरेशन का हिस्सा है वह 6.15 लाख करोड़ रुपये, जिसे बैंक अपनी बहीखातों से साफ कर रहे हैं ताकि “लाभप्रदता” और “कैपिटल स्थिति” सुधरी दिखे। बेरोजगार युवाओं के सपने टूटा करें, सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता—लेकिन एक-दूसरे की पीठ ठोकते कॉरपोरेट भगत सरकार के लिए ‘मोस्ट प्रायोरिटी’ बन चुके हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली, फिर भी कॉरपोरेट कर्ज माफ़ी की बरसात
भारत की शिक्षा प्रणाली बदहाली की कगार पर है—सरकारी स्कूलों में शिक्षक नहीं, संसाधन नहीं; विश्वविद्यालयों में फंड की कमी से शोध ठप पड़े हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र की हालत इतनी दयनीय है कि एक बीमारी पूरा परिवार तबाह कर देती है। लेकिन इन गम्भीर मुद्दों के समाधान के लिए सरकार के पास न पैसा है न संवेदना। दूसरी ओर, कॉरपोरेट जगत को दी जा रही कर्ज़ राहत ने जैसे खजाने का दरवाज़ा खोल दिया है। संसद में खुद स्वीकार किया गया कि सार्वजनिक बैंकों ने पिछले पाँच वर्षों में ₹6,15,647 करोड़ के लोन बट्टा-खाते में डाल दिए। सवाल यह नहीं कि write-off प्रक्रिया क्या है—सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि कहाँ गई, किसके पास गई, और क्यों नहीं वसूल हुई? यह दो इच्छा शक्ति का अंतर बताती है—गरीब के लिए “अभाव”, अमीर के लिए “अति-सुविधा”।
किसान को एमएसपी नहीं, कर्ज़ माफी नहीं—पर कॉरपोरेट को खुलेआम रियायती रास्ता
देश का अन्नदाता सबसे बड़ी उपेक्षा का शिकार है। किसान सालों से एमएसपी को कानूनी गारंटी बनाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। हर साल लाखों किसान कर्ज़ में डूबकर आत्महत्या कर देते हैं—लेकिन किसानों के कर्ज़ माफ़ करने की बात आते ही सरकार अपने हाथ खड़े कर देती है और “राजस्व भार” का हवाला देने लगती है। मगर जब कॉरपोरेट जगत के लोन की बात आती है, तो वही सरकार खजाने का दरवाज़ा खोल देती है। 6.15 लाख करोड़ का write-off यह साबित करता है कि आर्थिक नीतियाँ वास्तव में किसके लिए बनाई गई हैं। किसानों का कर्ज़ ‘बोझ’ है—पर अमीरों का कर्ज़ लिख देना ‘सुधार’? यह कैसी व्यवस्था है जो अन्नदाता को तोड़ती है और धनदाता को बढ़ाती है?
बट्टा-खाते का ब्लास्ट: संसद में 6.15 लाख करोड़ का कर्ज़ गायब!
तृणमूल कांग्रेस के सांसद अबू ताहेर खान के सवाल पर वित्त मंत्रालय ने अपना जवाब देते हुए यह स्वीकार किया कि बैंकों ने पिछले पाँच वर्षों और मौजूदा वर्ष की शुरुआती तिमाहियों में कुल ₹6,15,647 करोड़ का कर्ज़ बट्टा-खाते में डाल दिया। इतने बड़े आंकड़े का संसद में सामने आना किसी वित्तीय भूकंप से कम नहीं था। write-off का मतलब यह नहीं कि कर्ज़ माफ हो गया—लेकिन यह निश्चित रूप से दर्शाता है कि बैंक इस लोन को “लगभग-अवसूल्य” मानकर अपनी बैलेंस शीट से हटा चुके हैं। यह प्रक्रिया किसके लाभ में है? जनता के नहीं। छोटे कारोबारियों के नहीं। किसानों के नहीं। यह प्रक्रिया उन बड़े कर्जदारों को एक नई राहत देती है जो अरबों-खरबों रुपये लेकर देश से भाग जाते हैं या अपने राजनीतिक संबंधों के दम पर कानूनी कार्रवाई से बच निकलते हैं।
छोटे उधारकर्ता पर सख्ती, बड़े उद्योगपतियों पर नरमी—यह कैसा न्याय?
जब एक आम आदमी बैंक की ₹10,000 की ईएमआई नहीं भर पाता, तो उसकी संपत्ति नीलाम कर दी जाती है, उसके ऊपर मुकदमे दर्ज हो जाते हैं, और उसे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन जब कोई बड़ा उद्योगपति हजारों करोड़ लेकर भाग जाता है, तब बैंक और सरकार दोनों शांत। ऐसे मामलों में “प्रकिया जारी है”, “वसूली का प्रयास चल रहा है”, “NCLT में केस पेंडिंग है”—जैसे बहाने थमा दिए जाते हैं। write-off की सांकेतिक भाषा दरअसल कॉरपोरेट जगत के लिए सुरक्षा कवच है। इसमें न सरकार की नाराजगी दिखती है, न बैंकों की। सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर यह प्रणाली किसकी रक्षा के लिए काम कर रही है?
यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं—यह देश की आर्थिक आत्मा पर लगा प्रश्नचिह्न है
6.15 लाख करोड़ रुपये लिख देना किसी गलत नीति की छोटी विफलता नहीं—यह उस आर्थिक मॉडल की असफलता है जिसे सरकार लगातार “विकास” का नाम देकर बेचती रही है। यह आंकड़ा भारतीय अर्थव्यवस्था की नसों में छिपी बीमारी को उजागर करता है—अनुचित प्राथमिकताएँ, कमजोर नियमन, राजनीतिक संरक्षण और कॉरपोरेट पावर का वर्चस्व। अगर यह पैटर्न जारी रहा, तो छोटे उद्योग, किसान, विद्यार्थी, नौकरीपेशा सभी इसी व्यवस्था के नीचे दबते चले जाएंगे, और राष्ट्र एक ऐसे वित्तीय दलदल में फँस जाएगा जिससे निकलना मुश्किल होगा।
जनता के नाम पर सत्ता, लेकिन सेवा कॉरपोरेट की—क्या यही लोकतंत्र है?
यह सरकार जनता के वोटों से बनी, लेकिन सेवा कॉरपोरेट जगत की कर रही है—ऐसा जनता का मानना है। देश को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि जब बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई बेलगाम है, किसान रो रहे हैं, आम आदमी टूट रहा है—तब आखिर किसके लिए यह छह लाख करोड़ का “त्याग” किया गया? इस write-off मॉडल ने साफ कर दिया है कि यह वही ‘अमृतकाल’ है जिसमें अमृत कुछ चुनिंदा लोगों को मिलता है और कड़वाहट पूरे देश को।




