अवधेश कुमार । नई दिल्ली 2 दिसंबर 2025
भारत सरकार के संचार साथी ऐप को लेकर देशभर में उठे राजनीतिक तूफ़ान के बीच केंद्र ने मंगलवार को अपनी औपचारिक सफाई पेश की। विपक्ष की ओर से ऐप पर जासूसी, निगरानी और निजता पर हमले जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे थे। वहीं नागरिक अधिकार समूहों ने भी सरकार के इस कदम को निजी डिजिटल उपकरणों पर “एक्ज़िक्यूटिव कंट्रोल का चिंताजनक विस्तार” बताया है। इस विवाद के दबाव में केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने साफ कहा कि संचार साथी ऐप “न तो जासूसी करता है, न ही किसी तरह की कॉल-मॉनिटरिंग प्रणाली का हिस्सा है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार ने भले ही इस ऐप को नए फोन में प्री-लोड करने का निर्देश दिया हो, लेकिन उपभोक्ता इसे अपनी इच्छा से डिलीट कर सकते हैं। यह बयान उस समय आया जब विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा था कि ऐप को हटाने का विकल्प ही नहीं है, जिससे यह नागरिकों की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बनता है।
सिंधिया ने आंकड़ों के साथ यह भी बताया कि इस ऐप का उद्देश्य केवल उपभोक्ताओं को सुरक्षित करना है। उनके अनुसार, संचार साथी प्लेटफ़ॉर्म—जिसे लोग मोबाइल चोरी होने, फर्जी IMEI की शिकायत करने और सिम धोखाधड़ी रोकने के लिए उपयोग करते हैं—अब तक 1.75 करोड़ फर्जी मोबाइल कनेक्शन बंद करा चुका है। लगभग 20 लाख चोरी हुए मोबाइल फोन का पता लगाया जा चुका है और 7.5 लाख मोबाइल उनके असली मालिकों को लौटाए गए हैं। सिंधिया के मुताबिक, ये आंकड़े साबित करते हैं कि यह ऐप नागरिक सुरक्षा और टेलीकॉम सिस्टम की शुचिता के लिए एक उपयोगी साधन है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि “जब बात करने के लिए असली मुद्दे नहीं होते, तो वे तकनीकी सुविधाओं को भी निगरानी का औज़ार बताने लगते हैं।”
हालांकि सरकार के इस बयान ने विवाद को कम नहीं किया, बल्कि विपक्षी दलों और डिजिटल अधिकार समूहों ने इसे अपर्याप्त और “आधे सच” वाला बताया। कांग्रेस ने कहा कि ऐप को अनिवार्य रूप से इंस्टॉल करने का निर्देश ही अपने आप में निगरानी की मंशा दिखाता है। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि “निजता का अधिकार संविधान का मौलिक अधिकार है, और किसी भी ऐसे ऐप को मजबूरी में फोन में डालना—और संभावित रूप से डेटा एक्सेस देना—सीधे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अतिक्रमण है।” शिवसेना (उद्धव) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे “बिग बॉस निगरानी संस्कृति” करार दिया और चेतावनी दी कि जनता ऐसे प्रयासों का कड़ा प्रतिरोध करेगी। विपक्ष की दलील यह है कि चाहे ऐप डिलीट किया जा सके या नहीं, सरकार की नीयत और उसके दुरुपयोग की संभावनाओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
डिजिटल अधिकारों पर काम करने वाले संगठन इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) ने भी चिंता जताई कि सरकार का यह कदम भारतीय नागरिकों की डिजिटल स्वतंत्रता को सीमित करने वाला गंभीर संकेत है। IFF ने कहा कि मोबाइल फोन नागरिकों की सबसे निजी और व्यक्तिगत वस्तु है, और उस पर किसी सरकारी ऐप को अनिवार्य बनाना “व्यक्तिगत डिजिटल डिवाइसों पर सरकार के गहरे नियंत्रण की शुरुआत” हो सकती है। उन्होंने सरकार से पारदर्शिता बढ़ाने, ऐप के डेटा-एक्सेस अनुमतियों को सार्वजनिक करने और स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग की है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसे निगरानी के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता।
इस विवाद के बीच जनता में भी एक दोफाड़ देखने को मिल रही है। एक ओर, लोग ऐप के सुरक्षा लाभों को स्वीकार कर रहे हैं—विशेषकर चोरी हुए या फर्जी मोबाइल गतिविधियों से बचाव को लेकर। लेकिन दूसरी ओर, सरकार की बढ़ती डिजिटल पहुंच ने उन नागरिकों में शंका पैदा की है, जो पहले से ही व्हॉट्सऐप चैट निगरानी, पेगासस विवाद, और सोशल मीडिया मॉनिटरिंग जैसे मामलों से चिंतित हैं। इन घटनाओं के चलते संचार साथी को लेकर संदेह और अविश्वास स्वाभाविक हो गया है।
कुल मिलाकर, संचार साथी ऐप पर जारी यह विवाद सिर्फ एक तकनीकी बहस नहीं है, बल्कि भारत में डिजिटल निजता, नागरिक अधिकार, और सरकारी पारदर्शिता को लेकर एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई का रूप ले चुका है। सरकार अपनी सफाई के जरिए इसे “उपभोक्ता सुरक्षा” का मामला बता रही है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर खतरा मान रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि सरकार इस विवाद को शांत करने के लिए क्या कदम उठाती है और क्या ऐप की तकनीकी संरचना तथा डेटा उपयोग को लेकर विस्तृत पारदर्शिता जनता के सामने रखी जाएगी।




