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एप्सटीन फ़ाइल विवाद के बीच ‘गाँधी सरनेम’ पर बयान से नई बहस, इतिहास बनाम आरोप

एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | फरवरी 2026

पीएम के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया, झूठ फैलाने का आरोप

एप्सटीन फ़ाइलों को लेकर चल रहे विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक बयान ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। प्रधानमंत्री द्वारा गाँधी परिवार के सरनेम को लेकर दिए गए कथित बयान पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार पंकज श्रीवास्तव ने इसे “झूठ और अफ़वाहों पर आधारित घृणा अभियान” करार देते हुए ऐतिहासिक तथ्यों के साथ इसका खंडन किया है।

फ़ीरोज़ गाँधी की पहचान पर सवाल

पंकज श्रीवास्तव ने अपने सार्वजनिक लेखन में कहा है कि यह दावा कि फ़ीरोज़ गाँधी को शादी के समय महात्मा गांधी ने ‘गाँधी’ सरनेम दिया था, संघ से जुड़ी पुरानी अफ़वाहों का हिस्सा है। उनके मुताबिक, फ़ीरोज़ गाँधी जन्म से ही गाँधी थे। उनके पिता जहाँगीर गाँधी गुजरात के भरूच के निवासी थे और बाद में यह पारसी परिवार बम्बई चला गया, जहाँ फ़ीरोज़ गाँधी का जन्म हुआ।

स्वतंत्रता आंदोलन और नेहरू परिवार से जुड़ाव

श्रीवास्तव के अनुसार, फ़ीरोज़ गाँधी इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए। आनंद भवन उस दौर में आंदोलन का केंद्र था, जहाँ उनकी निकटता नेहरू परिवार से बढ़ी। 1942 में उनका विवाह इंदिरा गांधी से हुआ, जिसके बाद इंदिरा ने अपने नाम के साथ ‘गाँधी’ जोड़ा—जो उस समय एक सामान्य सामाजिक चलन था। उसी दौर में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान यह नवदम्पति जेल भी गया और इंदिरा गाँधी ने अपना 25वाँ जन्मदिन जेल में बिताया।

ड्राइविंग लाइसेंस का हवाला

हाल के वर्षों में रायबरेली में एक परिवार द्वारा सांसद राहुल गांधी को सौंपे गए फ़ीरोज़ गाँधी के एक पुराने ड्राइविंग लाइसेंस का भी उल्लेख किया गया है। सितंबर 1938 में जारी इस लाइसेंस में फ़ीरोज़ का सरनेम ‘गाँधी’ दर्ज है—जो उनकी शादी से चार साल पहले का है। इसे फ़ीरोज़ गाँधी की जन्मजात पहचान के सबूत के तौर पर पेश किया जा रहा है।

गुजरात की सरनेम परंपरा और सामाजिक संदर्भ

पंकज श्रीवास्तव ने गुजरात में सरनेम की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ नाम अक्सर पेशे से जुड़ा होता है। ‘गाँधी’ सरनेम उन समुदायों में प्रचलित था जो ‘गंध’ के व्यापार से जुड़े थे। इसी तरह ‘मोदी’ सरनेम भी व्यापारिक संदर्भों से जुड़ा रहा है। उन्होंने उदाहरण दिए कि पीलू मोदी और रूसी मोदी पारसी थे, जबकि नरेंद्र मोदी हिंदू हैं—जो यह दर्शाता है कि एक ही सरनेम अलग-अलग धर्मों में प्रचलित हो सकता है।

पारसी पहचान और नामकरण

श्रीवास्तव के अनुसार, पारसी समुदाय फ़ारस (ईरान) से भारत आया और इसलिए उनके नाम फ़ारसी मूल के होते हैं—जैसे फ़ीरोज़ जहाँगीर गाँधी, होमी जहाँगीर भाभा और जमशेदजी टाटा। उनके मुताबिक, पहले ‘फ़ीरोज़’ नाम को लेकर उन्हें मुस्लिम बताने की कोशिश हुई और अब ‘गाँधी’ सरनेम को लेकर नया आरोप गढ़ा जा रहा है।

राजनीतिक निहितार्थ और तीखी भाषा

अपने लेखन में पंकज श्रीवास्तव ने कहा है कि यह बयानबाज़ी राजनीतिक लाभ के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का प्रयास है। उन्होंने इसे “छिछोरा और शर्मनाक आरोप” बताते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियाँ ऐसे दौर को झूठ और घृणा से भरा मानेंगी।

गाँधी सरनेम और फ़ीरोज़ गाँधी की पहचान को लेकर छिड़ी यह बहस एक बार फिर दिखाती है कि भारतीय राजनीति में इतिहास, पहचान और वर्तमान विवाद किस तरह आपस में गुँथे हुए हैं। एक ओर आरोप और प्रत्यारोप हैं, तो दूसरी ओर दस्तावेज़ी संदर्भ और ऐतिहासिक तथ्य। सच तक पहुँचने के लिए निष्पक्ष जाँच, प्रमाण और संयमित विमर्श की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

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