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SIR के बाद ओडिशा के CEO का VRS, चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल: ‘झोल तो बहुत बड़ा है, चुनावी गड़बड़झाला आखिर क्या है?’

राष्ट्रीय राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | भुवनेश्वर | 1 अक्टूबर 2026

ओडिशा में Special Intensive Revision यानी SIR की प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी आर. एस. गोपालन का स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के लिए आवेदन करना चुनावी प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस के बीच एक नया सवाल खड़ा कर रहा है। गोपालन ने 30 सितंबर को VRS के लिए आवेदन दिया। खास बात यह है कि उनके कार्यकाल में ही ओडिशा में SIR की पूरी प्रक्रिया हुई और 21 सितंबर को संशोधित अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई। हालांकि गोपालन ने साफ कहा है कि उनका VRS आवेदन व्यक्तिगत और स्वास्थ्य कारणों से है तथा इसका SIR से कोई संबंध नहीं है।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर SIR पूरा होते ही एक वरिष्ठ चुनाव अधिकारी के VRS आवेदन को लेकर सवाल क्यों नहीं उठेंगे? गोपालन 2001 बैच के IAS अधिकारी हैं और ओडिशा के CEO के तौर पर जुलाई 2024 से जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनके पास अभी करीब डेढ़ साल की सेवा बाकी थी। उन्होंने कहा है कि वह कई महीनों से सेवा छोड़ने पर विचार कर रहे थे और SIR तथा अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन तक इंतजार किया। यानी उनके अनुसार फैसला अचानक नहीं था। फिर भी जिस समय देशभर में SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में बदलाव और नामों के हटने पर राजनीतिक विवाद चल रहा है, उसी समय ओडिशा के CEO का सेवा से हटने का आवेदन स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है।

ओडिशा में SIR के दौरान मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ। जुलाई में प्रकाशित ड्राफ्ट रोल में करीब 20.14 लाख नाम हटाए गए थे। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक इनमें 8.32 लाख मृत मतदाता, 10.07 लाख ऐसे लोग जो स्थानांतरित हो गए या सत्यापन के दौरान उपलब्ध नहीं मिले, और 1.58 लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियां शामिल थीं। करीब 14 हजार मतदाताओं ने enumeration forms वापस नहीं किए थे। चुनाव आयोग ने उस समय दावा किया था कि जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं, उन्हें दावा और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया जाएगा।

यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या इतनी बड़ी संख्या में मतदाता सूची में बदलाव के बाद पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही और पारदर्शिता पर पर्याप्त सार्वजनिक जांच हुई? विपक्षी दलों ने ओडिशा में भी नाम हटाए जाने पर सवाल उठाए थे। BJD ने आरोप लगाया था कि हटाए गए नामों की संख्या आधिकारिक आंकड़े से भी ज्यादा हो सकती है, जबकि कांग्रेस ने इसे राजनीतिक रूप से प्रभावित प्रक्रिया बताया। दूसरी ओर BJP ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि मतदाता सूची का संशोधन चुनाव आयोग ने किया है, किसी राजनीतिक दल ने नहीं।

और अब इसी पूरी प्रक्रिया के बाद CEO का VRS आवेदन सामने आया है। यह अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है। गोपालन ने खुद कहा है कि उनका फैसला व्यक्तिगत और स्वास्थ्य कारणों से है। लेकिन लोकतंत्र में चुनावी संस्थाओं से जुड़ी हर ऐसी घटना का सवालों के घेरे में आना भी असामान्य नहीं है—खासकर तब, जब मतदाता सूची को लेकर पहले से राजनीतिक विवाद चल रहा हो। इसलिए सवाल गोपालन के VRS से ज्यादा उस व्यवस्था का है जिसमें करोड़ों मतदाताओं के नाम तय होते हैं और जिसमें पारदर्शिता पर जनता का भरोसा सर्वोच्च होना चाहिए।

ओडिशा के मामले में चुनाव आयोग ने यह भी कहा था कि किसी मतदाता का नाम केवल प्रक्रिया के तहत ही हटाया जा सकता है और दावा-आपत्ति तथा अपील के रास्ते खुले हैं। इसलिए अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि SIR के दौरान हटाए गए नामों, वापस जोड़े गए नामों और लंबित दावों का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से कितना स्पष्ट और जांच योग्य है। चुनाव सिर्फ वोट डालने का दिन नहीं है; चुनाव की विश्वसनीयता मतदाता सूची तैयार होने की प्रक्रिया से शुरू होती है।

इसलिए सवाल सीधा है—SIR के बाद VRS क्यों, यह तो गोपालन ने व्यक्तिगत कारण बताया है। लेकिन SIR के दौरान कितने नाम हटे, कितने वापस जुड़े, कितनी आपत्तियां आईं और कितने मामलों में अधिकारियों ने निर्णय बदला—इन सबका पूरा हिसाब जनता के सामने कब आएगा?

फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर VRS और SIR के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन चुनावी प्रक्रिया में उठ रहे सवालों का जवाब पारदर्शी आंकड़ों और रिकॉर्ड से ही दिया जा सकता है, सिर्फ सफाई से नहीं।

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