महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 16 नवंबर 2025
भारत में आज सब चलेगा—भ्रष्टाचार चलेगा, बेरोजगारी चलेगी, महंगाई की मार चलेगी, किसानों की आत्महत्याएँ भी चलेंगी… बस एक चीज़ नहीं चलेगी—दोस्त की पोल खोलना। यही मोदी राज का “अनकहा संविधान” है, और इसकी सबसे ताज़ा मिसाल हैं आर.के. सिंह। जो जैसे ही अडानी के बिहार बिजली सौदे को देश का सबसे बड़ा घोटाला बताने लगे, उन्हें दूध से मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका गया। यह राजनैतिक बदले की कार्रवाई नहीं, बल्कि एक उन्मादी तंत्र का परिचय है, जहां “मित्रों” को बचाने के लिए ईमानदारों को कुचला जाता है, और देश की संस्थाएँ सत्ता के मातहत बनकर ताली बजाती हैं।
आर.के. सिंह: जिसने 1990 में आडवाणी को गिरफ्तार किया, उसे 2025 में मित्र-राज ने निगल लिया
1990 में समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करने वाला यह वही अफ़सर है, जिसे आडवाणी ने 1999 में गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव बनाया। उन्होंने बतौर गृह सचिव 2013 में देश को चौंकाने वाला खुलासा किया—समझौता, मक्का मस्जिद और अजमेर धमाकों के आरोपियों में कम से कम 10 सीधे तौर पर RSS से जुड़े मिले। यह जानकारी किसी एजेंडे का हिस्सा नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय की आधिकारिक फाइलों से निकली सच्चाई थी। लेकिन इसके बावजूद, भाजपा ने उन्हें 2014 में टिकट दिया, वह जीते, 2017 में ऊर्जा मंत्री बने, और 2019 में कैबिनेट मंत्री। सत्ता को उनका तेज़, योग्यता और प्रशासनिक पकड़ तब तक पसंद थी, जब तक वे “मित्रों” के खिलाफ चुप थे।
लेकिन जैसे ही अडानी का नाम लिया—खेल खत्म
4 नवंबर 2025 को उन्होंने अडानी-बिहार बिजली समझौते को “देश का सबसे बड़ा घोटाला” कहा। यह वही समझौता है जिसके तहत बिहार को अगले 25 साल तक 6.075 रुपये प्रति यूनिट की महंगी बिजली खरीदनी पड़ेगी। कुल नुकसान—62,000 करोड़ रुपये। एक ऐसा सौदा, जिससे अडानी अमीर और बिहार गरीब होता। और जैसे ही आर.के. सिंह ने CBI जांच की मांग रखी, भाजपा ने फौरन कार्रवाई की—पहले निलंबित, फिर निष्कासित। 6 साल का प्रतिबंध। आरोप? “एंटी पार्टी एक्टिविटी।” घोटाले की जांच नहीं, बल्कि घोटाले को उजागर करने वाला ही गुनहगार बना दिया गया। यही बताता है—मोदी राज में सबसे बड़ा अपराध सच बोलना है।
अडानी का काला इतिहास: जिसे बचाने के लिए पूरा तंत्र झुक जाता है
2023 की Hindenburg रिपोर्ट में स्टॉक मैनिपुलेशन, अकाउंटिंग फ्रॉड, मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोप लगे। बाजार धड़ाम हुआ, लाखों निवेशकों का पैसा डूबा। लेकिन फिर क्या हुआ? 2025 में SEBI ने क्लीन चिट दे दी। रिपोर्ट दबी, जांच दबाई, लेकिन “मित्र” बच गया। फिर 2024–25 में अमेरिका ने अडानी पर एक के बाद एक समन भेजे—ब्राइबरी, सिक्योरिटीज फ्रॉड, वायर फ्रॉड, FCPA उल्लंघन, 265 मिलियन डॉलर की रिश्वत का आरोप। SEC ने चार्जशीट बनाई, लेकिन भारत सरकार के लिए यह “देश का अपमान” नहीं, बल्कि “दोस्त की रक्षा” का मौका था। इतना ही नहीं—मोदी जी अमेरिकी यात्रा पर अडानी को ही अपने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल में साथ ले गए। यह सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि निर्लज्ज संरक्षण का चित्र है।
मुंद्रा पोर्ट ड्रग्स स्कैंडल: 3,000 करोड़ की हेरोइन—लेकिन मालिक क्लीन
2022 से चल रहे मुंद्रा पोर्ट ड्रग्स कांड में 3,000 करोड़ की हेरोइन बरामद हुई। दुनिया के किसी भी देश में इतनी बड़ी बरामदगी पर पोर्ट ऑपरेटर की जवाबदेही तय होती, लेकिन भारत में? अडानी पर एक भी FIR नहीं, एक भी पूछताछ नहीं। NCB ने सिर्फ ड्राइवरों और पाइपलाइन लड़कों पर केस डालकर केस बंद कर दिया। TNI पर कटाक्ष करते लोग कहते हैं—“ड्रग्स कंटेनर में आया, कंटेनर पोर्ट पर आया, लेकिन पोर्ट पर कोई नहीं था।” यही है मित्र-व्यवस्था का चमत्कार।
पर्यावरण लूट, कोयला घोटाले, जमीन कब्जा—सबका कॉमन लिंक: अडानी
गोडावरी में कोयला खनन से लेकर ऑस्ट्रेलिया की विवादित Carmichael माइन तक—अडानी का पूरा बिज़नेस मॉडल “पूरी सरकारी मशीनरी को ठेका करना” जैसा है। किसानों की जमीनें हड़पना, परियोजनाओं को कागज पर ही पूरा दिखाना, विदेशी निवेशकों को थपथपाकर पैसा खींचना—इन सब पर दर्जनों रिपोर्ट हैं। लेकिन मोदी राज में अडानी को कोई नहीं छूता। क्योंकि यह “सामान्य उद्योगपति” नहीं, बल्कि सत्ता का अनौपचारिक संरक्षक है।
अब बिहार का 62,000 करोड़ का समझौता—राज्य को कर्ज में डूबाने की तैयारी
भागलपुर का 2,400 MW प्लांट 2012 में बिहार ने खरीदा था। लेकिन 2025 में इसे अडानी को कम बोली पर दे दिया गया। फिर 25 साल का बिजली खरीद समझौता—जिसमें दर बाजार से दोगुनी। इसका मतलब—बिहार अगले ढाई दशक तक महंगी बिजली खरीदेगा, उद्योग भागेंगे, युवा बेरोजगार होंगे, राज्य कर्ज में दबेगा—लेकिन अडानी का मुनाफा पक्का रहेगा। और जैसे ही आर.के. सिंह ने कहा—“इसकी CBI जांच हो”—उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।
क्यों? क्योंकि मोदी राज में देश बेचो, दोस्त बचाओ नीति चलती है
आर.के. सिंह जैसे ईमानदार अफसर को सजा मिलती है। घोटालेबाजों को संरक्षण मिलता है। CBI, ED, SEBI, NCB—सबकी रीढ़ तोड़ दी गई है। संस्थाएँ मित्र-सेवा केंद्र बन गई हैं। यह सिर्फ एक अफसर की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के पतन की दास्तां है। यही है #ModiRaj का असली चेहरा—एक ऐसा शासन, जहां देश की कीमत पर “मित्रों” का साम्राज्य खड़ा किया जाता है।




