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ABC Special Report: कश्मीर पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक हस्तक्षेप, अदालत में 4 हफ्ते की डेडलाइन

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नई दिल्ली, 11 अक्टूबर 2025

जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के गंभीर और लंबे समय से लंबित मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने आज केंद्र सरकार को एक कड़ा संदेश देते हुए चार हफ्तों के भीतर निर्णायक जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से साफ और दो टूक शब्दों में कहा है कि अब इस संवैधानिक जिम्मेदारी में और अधिक देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी — देश की जनता, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को यह जानने का स्पष्ट और मौलिक अधिकार है कि केंद्र सरकार कब और किस ठोस समयसीमा के तहत जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करेगी और वहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करेगी। यह पूरा मामला उस ऐतिहासिक और विवादास्पद निर्णय से जुड़ा हुआ है जब 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35A को समाप्त कर दिया था और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख — में विभाजित कर दिया था। अब इस विभाजनकारी फैसले के लगभग छह साल बीत जाने के बाद भी राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया गया है, जिसकी वजह से इस संबंध में कई महत्वपूर्ण याचिकाएँ देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित पड़ी हैं, और अदालत ने अब इस मामले को एक निर्णायक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

 केंद्र से जवाब तलब पर न्यायालय का तीखा रुख: लोकतांत्रिक व्यवस्था कब बहाल होगी?

मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार के प्रति अपना तीखा और असंतुष्ट रुख स्पष्ट कर दिया। पीठ ने केंद्र के अधिवक्ताओं से सीधे सवाल किया, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनी गई। न्यायाधीशों ने कहा, “आपने बार-बार यह आश्वासन दिया है कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा जल्द ही बहाल किया जाएगा। अब वह समय आ गया है कि आप अदालत को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि एक ठोस और क्रियान्वित की जा सकने वाली समयसीमा बताएं। देश के नागरिकों को यह जानने का हक है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था कब बहाल होगी।” केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने जवाब दाखिल करने के लिए अधिक समय की मांग की, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सख्ती दिखाते हुए कहा कि “आपके पास केवल चार सप्ताह हैं। इसके बाद किसी भी प्रकार की टालमटोल या बहाना स्वीकार नहीं किया जाएगा।” इसके अतिरिक्त, अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी स्पष्ट रूप से पूछा है कि राज्य में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू करने और राजनीतिक पुनर्संरचना पर अब तक क्या ठोस तैयारी की गई है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि लोकतंत्र बहाली की दिशा में सरकार गंभीर है या नहीं।

लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल: अदालत की टिप्पणी में गंभीर चिंता झलकी

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपनी सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से जारी केंद्रशासित प्रशासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की अनुपस्थिति को लेकर गहरी संवैधानिक चिंता व्यक्त की है। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक संस्थाओं की अनुपस्थिति और केंद्रशासित प्रशासन का लम्बा खिंचना, स्थानीय जनता की शासन में भागीदारी पर गहरा और नकारात्मक असर डाल चुका है। पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि “राज्य के नागरिकों को शासन में भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए, क्योंकि संविधान का सार ही लोकतंत्र है, और लोकतंत्र बिना जनता की आवाज़ और भागीदारी के अधूरा है।” अदालत की यह टिप्पणी जम्मू-कश्मीर की सियासी बहस में एक नया और निर्णायक अध्याय जोड़ती है, क्योंकि स्थानीय राजनीतिक पार्टियाँ, जिनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस शामिल हैं, लंबे समय से केंद्र के पुनर्गठन के फैसले को “असंवैधानिक और अस्थायी उपाय” करार देती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती अब उन स्थानीय पार्टियों के रुख को वैधानिक समर्थन देती दिख रही है जो जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की मांग कर रही हैं।

कश्मीर की सियासत में नई हलचल: मुफ्ती और अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त आदेश के बाद जम्मू-कश्मीर की राजनीति में तत्काल एक नई और सकारात्मक हलचल मच गई है, क्योंकि स्थानीय नेताओं ने इसे अपनी जीत के रूप में देखना शुरू कर दिया है। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि “सुप्रीम कोर्ट का यह कदम जम्मू-कश्मीर की जनता की उम्मीदों को फिर से जगाता है। कश्मीर का राज्यत्व केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह वहाँ की जनता के सम्मान और गरिमा का प्रश्न है।” वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने भी इस सुनवाई को जनता की आवाज़ करार देते हुए अपने ‘X’ (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर ट्वीट किया कि “यह सुनवाई जनता के दिलों की आवाज़ है। हम चाहते हैं कि दिल्ली अब अपने वादे पूरे करे। कश्मीर की जनता को उनका हक़ वापस मिलना चाहिए।” इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश ने कश्मीर घाटी में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है और अब केंद्र सरकार पर जल्द से जल्द पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का जबरदस्त दबाव बन चुका है।

 “कश्मीर इंतज़ार में है, सुप्रीम कोर्ट अब निर्णायक मोड़ पर”

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि 2019 के फैसले के बाद से लंबित पड़े लोकतांत्रिक आत्मा की पुनर्स्थापना की एक महत्वपूर्ण लड़ाई बन चुकी है। जिस वादे के साथ केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को समाप्त करते हुए कहा था कि “राज्य का दर्जा जल्द बहाल किया जाएगा,” अब वही वादा अदालत के निर्णायक आदेश में बदल चुका है। केंद्र सरकार अब एक कठिन स्थिति में है, जहाँ एक तरफ उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “कश्मीर की लोकतांत्रिक स्थिति” पर उठ रहे सवालों का जवाब देना है, और दूसरी तरफ देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी रूप से जवाबदेही तय कर दी है। चार हफ्तों का यह वक्त केंद्र सरकार के लिए एक गंभीर परीक्षा है — या तो केंद्र ठोस रोडमैप पेश कर राज्य का दर्जा बहाल करेगा, या फिर यह सच सामने आ जाएगा कि सत्ता को कश्मीर की जनता और उनकी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं पर अभी तक भरोसा नहीं है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला अब केवल राज्य की बहाली नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा बनाम राजनीतिक सुविधा की अंतिम परीक्षा बन चुका है, और अब सवाल सिर्फ एक है — क्या मोदी सरकार संविधान की भावना का सम्मान करेगी, या जम्मू-कश्मीर की जनता को और लंबा इंतज़ार झेलना पड़ेगा?

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