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तेल का समंदर, फिर भी दाने-दाने को मोहताज: वेनेज़ुएला की दर्दभरी दास्तां

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क | 5 जनवरी 2026

कभी दुनिया का चौथा सबसे अमीर देश कहलाने वाला वेनेज़ुएला आज ऐसी हालत में पहुंच चुका है, जहां आम आदमी के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी सबसे बड़ी लड़ाई बन गया है। यह वही देश है, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है—यहां तक कि सऊदी अरब से भी ज़्यादा। इसके बावजूद आज वेनेज़ुएला की पहचान तेल की दौलत नहीं, बल्कि भूख, गरीबी और मजबूरी बन चुकी है। कभी खुशहाली की मिसाल रहा यह देश अब टूटे सपनों और खाली पेट की कहानी कह रहा है।

एक दौर ऐसा भी था जब वेनेज़ुएला का नाम दुनिया के अमीर देशों में शुमार होता था। 1950 से लेकर 1980 के दशक तक यहां की अर्थव्यवस्था मज़बूत थी, लोगों की आमदनी अच्छी थी और जीवन स्तर ऊँचा माना जाता था। उस समय वेनेज़ुएला के लोग शॉपिंग और घूमने के लिए मियामी जैसे महंगे शहरों का रुख करते थे। तेल से होने वाली कमाई ने देश को आधुनिक सुविधाएं दी थीं, डॉलर की चमक हर तरफ दिखती थी और भविष्य को लेकर लोगों के सपने बड़े थे।

लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलते चले गए। देश की पूरी अर्थव्यवस्था सिर्फ तेल पर निर्भर हो गई। खेती, उद्योग, उत्पादन और रोज़गार के दूसरे साधनों को नज़रअंदाज़ किया गया। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन नीतियों में सुधार की जगह भ्रष्टाचार, लापरवाही और अव्यवस्था बढ़ती चली गई। जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें गिरीं, तो वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था भी ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी।

तेल उत्पादन लगातार घटता गया, रिफाइनरियां और मशीनें पुरानी होती चली गईं और नए निवेश लगभग रुक गए। इसी बीच अमेरिका और कुछ अन्य देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने हालात को और बदतर बना दिया। नतीजा यह हुआ कि देश में महंगाई बेकाबू हो गई। हालात इतने बिगड़ गए कि नोटों की गड्डियां लेकर भी लोग आटा, दूध और दवा नहीं खरीद पा रहे। कई मौकों पर एक साधारण रोटी की कीमत लाखों में पहुंच गई।

आज वेनेज़ुएला की सड़कों पर ऐसे दृश्य आम हैं, जिन्हें देखकर दिल दहल जाता है। कभी मिडिल क्लास या अच्छे हालात में जीने वाले लोग आज कूड़ेदानों से खाने की चीज़ें ढूंढने को मजबूर हैं। अस्पतालों में दवाइयों की भारी कमी है, बिजली और पानी की सप्लाई बार-बार ठप हो जाती है। बच्चों की पढ़ाई छूट रही है और लाखों लोग बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद में देश छोड़कर दूसरे देशों की ओर पलायन कर चुके हैं।

अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ इस स्थिति को “तेल का अभिशाप” कहते हैं—यानी जब किसी देश के पास प्राकृतिक संसाधनों की भरमार हो, लेकिन सही नीतियां, ईमानदार व्यवस्था और दूरदर्शी सोच न हो, तो वही संसाधन वरदान की जगह अभिशाप बन जाते हैं। वेनेज़ुएला आज इसका सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक उदाहरण बन चुका है।

वेनेज़ुएला की यह कहानी सिर्फ एक देश की त्रासदी नहीं है, बल्कि दुनिया के लिए एक चेतावनी भी है। यह बताती है कि केवल तेल, दौलत या संसाधन ही किसी देश को मजबूत नहीं बनाते। असली ताकत होती है—सही नीति, पारदर्शी शासन और इंसान को केंद्र में रखकर की गई सोच, जो किसी भी देश को लंबे समय तक टिकाऊ और खुशहाल बना सकती है।

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