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पूर्व राजनयिक पर नए सिरे से विवाद भड़का—वरिष्ठ पत्रकार के आरोप, कांग्रेस का हमला और भ्रष्टाचार केसों का लंबा इतिहास फिर सुर्खियों में

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एबीसी डेस्क 8 दिसंबर 2025

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर वरिष्ठ पत्रकार उमाशंकर ने एक तीखा और विचारोत्तेजक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने बिना नाम लिए एक पूर्व राजनयिक पर आरोप लगाया कि वह टीवी चर्चाओं में अपने “पूर्व राजनयिक” टैग का दुरुपयोग करते हुए मनमानी और अनर्गल बयान देते हैं। उमाशंकर के अनुसार, यह जनाब अपने पुराने पद की धौंस में रहते हैं और ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं, मानो देश की हर नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर अंतिम सत्य वही हों। उन्होंने लिखा कि सत्ता की चरण–वंदना करते रहने से ऐसे लोगों को अवश्य “प्रसाद” मिलता है, लेकिन पत्रकारिता और जनचर्चा की गुणवत्ता इससे गिरती है। यह टिप्पणी तुरंत राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई, क्योंकि टीवी डिबेट्स में हाल के वर्षों में कई पूर्व अधिकारी अपनी आक्रामक और पक्षपाती टिप्पणियों के कारण सुर्खियों में रहते हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता ने सूडान कार्यकाल, भ्रष्टाचार के आरोप और सीबीआई जांच की याद दिलाई

उमाशंकर की बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने X पर ही निशाना साधा और कहा कि क्या पत्रकार जिस व्यक्ति की बात कर रहे हैं, वह वही पूर्व राजनयिक तो नहीं हैं जिन पर सूडान में अपने कार्यकाल के दौरान गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे? कांग्रेस प्रवक्ता ने यह बड़ा दावा भी किया कि इस राजनयिक के खिलाफ सीबीआई की जांच चल रही है और 2022 में मोदी सरकार ने उनके विरुद्ध ‘sanction for prosecution’ (मुकदमा चलाने की अनुमति) भी दे दी थी। यह आरोप सामने आते ही बहस और तेज हो गई कि क्या टीवी स्टूडियो में राष्ट्रवाद और कूटनीति की बातें करने वाले ये “विशेषज्ञ” खुद विवादों और भ्रष्टाचार के साये में खड़े हैं। जरूरत पड़ने पर सत्ता समर्थन, और दूसरी ओर लंबित जांच—यह दोहरा चरित्र सार्वजनिक मंचों पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

विवादित नाम सामने आया—2016 में रिटायर हुए राजदूत दीपक वोहरा, जिनके परिसरों पर ईडी की छापेमारी

हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार ने नाम नहीं लिया था, लेकिन राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बाद स्पष्ट हो गया कि पूरा मामला पूर्व राजदूत दीपक वोहरा के इर्दगिर्द घूम रहा है—वह राजनयिक जो जनवरी 2016 में रिटायर हुए और उसके बाद टीवी स्टूडियो में “सर्वज्ञात कूटनीतिक विशेषज्ञ” के रूप में नियमित चेहरा बन गए। लेकिन उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व के पीछे कई विवादों की लंबी परतें छिपी हैं।

ईडी ने उनके परिसरों पर ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ धोखाधड़ी मामले में अचानक छापेमारी की थी, जिसमें उन पर आरोप था कि कुछ अफ्रीकी देशों में ठेके दिलाने के लिए कथित रिश्वत प्रथाओं में उनकी भूमिका रही। इसके अतिरिक्त, ईडी ने Angelique International नामक कंपनी से उनके वित्तीय लेन-देन को लेकर बयान दर्ज किया था। जांच एजेंसी इस बात की पड़ताल कर रही थी कि क्या अफ्रीकी देशों में अवैध फंड ट्रांसफर, अनुचित ठेके और राजनीतिक संपर्कों के दुरुपयोग में वोहरा की कोई भूमिका थी। हालांकि इस मामले का अंतिम निस्तारण अभी भी अस्पष्ट है, लेकिन एक राजनयिक के खिलाफ ऐसे गंभीर आरोप असामान्य और चौंकाने वाले माने जाते हैं।

सीबीआई केस के आरोप—सूडान मिशन में वित्तीय अनियमितताएँ और मुकदमा चलाने की अनुमति

दीपक वोहरा विवादों के घेरे में यहीं तक नहीं रहे। उन पर भारत के महावाणिज्य दूत (Consul General) के रूप में सूडान में अपने कार्यकाल के दौरान वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगा था। एक विशेष अदालत ने सीबीआई को निर्देश दिया था कि वे भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून (PC Act) और IPC की धारा 108 (उकसाने वाला/abetment) के तहत उनके विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति (sanction) केंद्र सरकार से प्राप्त करें। मोदी सरकार ने बाद में यह अनुमति दे दी, जिससे यह संकेत मिलता है कि आरोप prima facie गंभीर थे और जांच एजेंसियों के पास कार्रवाई का कानूनी आधार मौजूद था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिन पर खुद वित्तीय गड़बड़ियों का बोझ है, वे कैसे राष्ट्रीय नीति और सुरक्षा पर टीवी स्क्रीन पर दिन–रात उपदेश देते फिरते हैं?

LSR कॉलेज विवाद—‘भाषणों से ध्यान भटकाने’ की कोशिश या उग्र एजेंडा?

राजनयिक करियर के बाद दीपक वोहरा कई बार अपने बयान और भाषणों के चलते विवादों में रहे हैं। पिछले सितंबर में लेडी श्रीराम कॉलेज (LSR) में उनके भाषण ने तीखी प्रतिक्रिया पैदा की थी, जहाँ छात्राओं ने उनके वक्तव्य को स्त्री-विरोधी, इस्लाम-विरोधी और मानवता-विरोधी बताया था। सोशल मीडिया पर छात्रों ने कहा कि एक ऐसे वक्ता को मंच देना, जिस पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हों और जो मंच से नफरत भरे विचार फैलाए, संस्थान की साख को ठेस पहुँचाता है। कई लोगों ने यह भी कहा कि वोहरा अपने भ्रष्टाचार के मामलों से ध्यान हटाने के लिए आलोचनात्मक, उत्तेजक और ध्रुवीकरण वाले भाषणों का इस्तेमाल करते हैं।

सवाल बड़े हैं: टीवी स्टूडियो का ‘विशेषज्ञ’ कौन? और उसकी भूमिका कितनी निर्दोष?

यह पूरा प्रकरण भारतीय मीडिया, राजनीति और शासन–व्यवस्था के एक गहरे संकट की ओर संकेत करता है—जहाँ कई बार टीवी स्क्रीन पर बैठा “विशेषज्ञ” असल में खुद एक जाँच के घेरे में खड़ा व्यक्ति होता है। वरिष्ठ पत्रकार की टिप्पणी और कांग्रेस के आरोपों ने एक बार फिर यह बहस जगा दी है कि जनता के सामने विचार देने वाले चेहरों की विश्वसनीयता कितनी होनी चाहिए? क्या टीवी चैनल TRP के लिए ऐसे विवादित और जांचाधीन व्यक्तियों को मंच देते रहेंगे? क्या जनता भ्रमित नहीं होती जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोग राष्ट्रवाद और नीति-उपदेश देने लगते हैं?

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