राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026
जॉर्ज सोरोस का नाम आते ही बीजेपी के नेताओं की बयानबाजी तेज हो जाती है। उन्हें भारत-विरोधी, देश के आर्थिक हितों के लिए खतरा और भारतीय राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप का प्रतीक बताया जाता रहा है। कांग्रेस को भी सोरोस से जोड़कर निशाना बनाया गया। लेकिन अब सवाल बीजेपी के अपने वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के परिवार से जुड़े एक कारोबारी संबंध पर उठ रहे हैं। न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार, पुरी की बेटी द्वारा सह-स्थापित हेज फंड को सोरोस की फंड मैनेजमेंट कंपनी ने 20 करोड़ डॉलर यानी लगभग 200 मिलियन डॉलर के पोर्टफोलियो के प्रबंधन के लिए चुना था।
यहां सवाल किसी बेटी के पेशे या निजी कारोबारी फैसले पर हमला करने का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक दोहरे मापदंड का है जिसमें विरोधियों से जुड़े कथित संबंधों को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बनाया जाता है, जबकि अपने राजनीतिक खेमे से जुड़े समान सवालों पर जवाबदेही की मांग कमजोर पड़ जाती है।
सोरोस पर हमला, लेकिन अपने खेमे पर चुप्पी क्यों?
न्यूज़लॉन्ड्री की 20 अप्रैल 2026 की रिपोर्ट में अमेरिकी कॉरपोरेट फाइलिंग और केमैन आइलैंड्स की रजिस्ट्री के दस्तावेजों के आधार पर इस कारोबारी संबंध का विवरण दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, हरदीप सिंह पुरी की बेटी ने जिस हेज फंड की सह-स्थापना की, उसे सोरोस फंड मैनेजमेंट से 200 मिलियन डॉलर का पोर्टफोलियो संभालने का काम मिला था। यह संबंध बीजेपी के सोरोस-विरोधी अभियान से पहले का बताया गया है।
रिपोर्ट ने साफ कहा कि इस कारोबारी संबंध से अपने-आप किसी गलत काम का संकेत नहीं मिलता। वित्तीय दुनिया में निवेश प्रबंधन के ऐसे अनुबंध सामान्य हैं। इसलिए इस तथ्य को भ्रष्टाचार, देशविरोधी गतिविधि या किसी अपराध का प्रमाण बताना गलत होगा।
लेकिन राजनीतिक सवाल अपनी जगह कायम है। अगर सोरोस से जुड़ा हर संबंध बीजेपी के लिए संदेह का विषय है, तो क्या यही कसौटी उसके अपने नेताओं और उनके परिवारों से जुड़े मामलों पर भी लागू होगी? यदि नहीं, तो फिर यह राष्ट्रीय हित की चिंता है या राजनीतिक सुविधा के अनुसार चुना गया मुद्दा?
जांच एजेंसियां किस कसौटी पर कार्रवाई करती हैं?
सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से जुड़े संगठनों को लेकर केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों की कार्रवाई भी लंबे समय से बहस का विषय रही है। न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में गृह मंत्रालय ने ओपन सोसाइटी फाउंडेशन को ‘प्रायर रेफरेंस’ व्यवस्था के तहत रखा था, जिसके बाद भारत में उसके अनुदान पर सरकारी मंजूरी संबंधी प्रतिबंध लागू हुए।
यदि विदेशी वित्तपोषण से राष्ट्रीय हितों को खतरा है, तो सरकार को उसके लिए स्पष्ट, समान और प्रमाण-आधारित नियम लागू करने चाहिए। लेकिन यदि किसी कारोबारी संबंध को केवल इसलिए संदिग्ध बताया जाए कि उसमें सोरोस का नाम है, जबकि दूसरे मामले में उसी संबंध को सामान्य व्यापार कहकर छोड़ दिया जाए, तो सरकार की नीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
एपस्टीन प्रकरण अलग है, लेकिन जवाबदेही का सवाल वही
हरदीप सिंह पुरी का नाम जेफ्री एपस्टीन से जुड़े सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों और ईमेल में भी आया था। फरवरी 2026 में पुरी ने स्वीकार किया कि उनकी एपस्टीन से तीन या चार मुलाकातें हुई थीं। उन्होंने कहा कि संपर्क पेशेवर संदर्भ में था और किसी गलत काम में उनकी संलिप्तता के आरोपों से इनकार किया।
इन मुलाकातों या ईमेल के आधार पर पुरी को किसी अपराध का दोषी घोषित नहीं किया जा सकता। सोरोस से जुड़ा कारोबारी अनुबंध और एपस्टीन से संपर्क दो अलग मामले हैं। लेकिन सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के मामले में पारदर्शिता और स्पष्ट जवाब की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है।
अंधभक्ति नहीं, एक समान सवाल जरूरी
बीजेपी और उसके समर्थकों को कांग्रेस से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। लेकिन वही अधिकार नागरिकों और पत्रकारों को बीजेपी से सवाल पूछने के लिए भी है। लोकतंत्र में किसी दल को आलोचना से छूट नहीं मिल सकती।
हरदीप पुरी और उनकी बेटी से जुड़े कारोबारी संबंध पर उपलब्ध रिपोर्ट कोई अपराध साबित नहीं करती। मगर बीजेपी की सोरोस-विरोधी राजनीति और इस कारोबारी तथ्य के बीच विरोधाभास पर जवाब मांगना पूरी तरह जायज है।
आखिर सवाल सीधा है—यदि सोरोस से संबंध भारत के लिए इतना बड़ा खतरा है, तो यह कसौटी सब पर समान रूप से क्यों नहीं लागू होनी चाहिए? और यदि यह सामान्य कारोबारी संबंध है, तो फिर विरोधियों को इसी आधार पर देश-विरोधी ठहराने की राजनीति क्यों?
देशभक्ति का पैमाना राजनीतिक सुविधा नहीं हो सकता। सवाल कांग्रेस से हो या बीजेपी से—जवाब तथ्यों के आधार पर ही मिलना चाहिए।



