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“संपूर्ण क्रांति” की नई व्याख्या: जयप्रकाश नारायण की प्रासंगिकता और अखिलेश यादव का नया संकल्प

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 जयप्रकाश नारायण — एक नाम, जो ‘सत्ता से बड़ा विचार’ बना और कालजयी हो गया

जयप्रकाश नारायण, जिन्हें प्रेम से ‘जेपी’ कहा जाता है, केवल एक राजनीतिक नेता या स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र के उस निर्णायक दौर की आत्मा थे जब सत्ता के निरंकुश अहंकार के सामने देश की लोकशक्ति और जनमत ने सामूहिक रूप से सिर उठाया था। उन्होंने अपने समय की सबसे सशक्त और स्थापित सरकार को सीधी और निर्भीक चुनौती दी, और यह सिद्ध किया कि जनता की चेतना और जनमत की संगठित ताक़त किसी भी राजनीतिक कुर्सी या सत्ता के शीर्ष से कहीं अधिक बड़ी और मौलिक होती है। उनकी दी गई “संपूर्ण क्रांति” केवल एक राजनीतिक बदलाव या सत्ता परिवर्तन का नारा नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सबसे बढ़कर, नैतिक पुनर्जागरण की एक समग्र और दूरगामी पुकार थी। जेपी ने स्वयं कहा था कि “मैं ऐसी क्रांति चाहता हूँ जिसमें आदमी का पूरा जीवन बदले, समाज बदले, सोच बदले।” 

आज, जब भारत देश फिर से बढ़ती हुई असमानताओं, तीखे वैचारिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर संस्थागत भय के बढ़ते दबाव के दौर से गुज़र रहा है, जेपी के मौलिक विचार पहले से कहीं अधिक ज्वलंत और प्रासंगिक हो गए हैं। उनकी क्रांति को अपूर्ण या अधूरा मानना सही नहीं है — उसे बस वर्तमान युग की सामाजिक-आर्थिक सच्चाइयों और चुनौतियों के अनुरूप एक नई भाषा में फिर से गढ़े जाने और पुनर्जीवित करने की ज़रूरत है।

 ‘संपूर्ण क्रांति’ से ‘सामाजिक न्याय के राज’ तक — अखिलेश यादव का नये दौर का संदेश

समाजवादी पार्टी ने जब जयप्रकाश नारायण की जयंती के अवसर पर उनके कालजयी विचारों को पुनर्जीवित करने का राजनीतिक निर्णय लिया, तो अखिलेश यादव का वक्तव्य केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं था, बल्कि यह 21वीं सदी के लिए एक स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक घोषणा-पत्र बन गया। अखिलेश यादव ने बड़ी दृढ़ता के साथ यह संकल्प लिया कि “हम जयप्रकाश नारायण जी की संपूर्ण क्रांति को पूर्ण करने का संकल्प उठाते हैं। ‘सामाजिक न्याय का राज’ और ‘पीडीए समाज’ का उत्थान ही उस क्रांति का आधुनिक रूप होगा।” 

यह वाक्य वर्तमान राजनीति के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि अखिलेश यादव जेपी की उस मौलिक क्रांति को आज के दौर की गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं और जातिगत उत्पीड़न के साथ जोड़ रहे हैं। जेपी की क्रांति का मूल लक्ष्य सत्ता को पलटना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के मौलिक ढांचे को बदलकर उसे समानता और न्याय पर आधारित करना था। आज अखिलेश यादव भी उसी दिशा में ‘पीडीए समाज’ — यानी पिछड़े (पिछड़ा), दलित (दलित) और अल्पसंख्यक (अल्पसंख्यक) तबकों — को उनका न्यायोचित हिस्सा, सम्मान और राजनीतिक शक्ति दिलाने की लड़ाई को “नई संपूर्ण क्रांति” का आधुनिक रूप दे रहे हैं। उनका यह घोषणात्मक वादा कि “2027 में सत्ता में आकर विश्वस्तरीय जेपी स्मारक बनाएंगे” मात्र प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक प्रतिबद्धता है जो दर्शाती है कि जेपी केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि भारत की भविष्य की राजनीतिक नैतिकता के आधारस्तंभ हैं।

जब लोकतंत्र ‘भय’ में सिमटता है, तब जेपी की आत्मा पुकारती है

भारत आज एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जहाँ लोकतंत्र की आत्मा, उसके संस्थागत स्तंभ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गंभीर दबाव में हैं। संविधान की भावना को राजनीतिक लाभ और सत्ता की मनमानी की लाठी से लगातार चोट पहुंचाई जा रही है, मीडिया का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा सत्ता के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भय में मौन है, और समाज का एक विशाल तबका — चाहे वह संघर्षरत किसान हों, हताश बेरोजगार नौजवान हों या अल्पसंख्यक समुदाय — हाशिये पर धकेल दिया जा रहा है और खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। 

ऐसे निराशाजनक समय में जयप्रकाश नारायण की प्रासंगिकता इसलिए अत्यधिक बढ़ जाती है, क्योंकि उन्होंने उस दौर में भी अपनी आवाज़ बुलंद की थी जब ‘सत्ता सर्वोच्च’ और अजेय मानी जा रही थी। उन्होंने कहा था कि “लोकतंत्र सिर्फ वोट देने का अधिकार नहीं है, यह अन्याय और गलत के खिलाफ निडरता से बोलने का साहस भी है।” आज वही साहस और नैतिक बल समाजवादी सोच के नेताओं में दिखाई दे रहा है, जो लगातार ‘सत्ता की नीति’ के खिलाफ ‘समाज की नीति’ और ‘जनता की नीति’ की बात कर रहे हैं। यह वैचारिक संघर्ष जेपी की विरासत को आज के भारत में जीवंत बनाए रखता है।

जेपी की क्रांति का नया रूप — समानता, सम्मान और सामाजिक न्याय की राजनीति

जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ का अंतिम अर्थ केवल किसी सरकार या तख्त को पलट देना नहीं था; वह एक ऐसे समानता आधारित, शोषण-मुक्त सामाजिक ढांचे का महान स्वप्न था, जहाँ जाति, धर्म, और वर्ग की सभी दीवारें ढह जाएँ और समाज के हर वंचित व्यक्ति की आवाज़ को सम्मान और महत्व के साथ सुना जाए। अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने इस मौलिक और समावेशी विचार को एक नए और धारदार राजनीतिक नाम में ढाला है — ‘पीडीए समाज’। यह एक ऐसा मंच है जो पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों की साझा तक़दीर, साझा समस्याओं और साझी शक्ति को सामने रखता है। 

यह विचारधारा सीधे तौर पर जेपी के “समाज परिवर्तन” की आत्मा और समावेशी मूल्यों से मेल खाती है। जेपी का सपना था कि भारत में शक्ति का स्रोत ‘सत्ता का भय’ या दमन नहीं, बल्कि ‘समानता और न्याय की चेतना’ बने। आज समाजवादी आंदोलन उसी चेतना को न केवल राजनीतिक विमर्श में जीवित कर रहा है, बल्कि उसे सत्ता प्राप्ति के लक्ष्य से भी जोड़कर एक सशक्त जमीनी आंदोलन का रूप दे रहा है।

जेपी आज भी जिंदा हैं, बस नाम अब ‘नए समाज’ का है

जयप्रकाश नारायण का नाम किसी बीते हुए राजनीतिक अध्याय का शीर्षक मात्र नहीं है; उनका विचार आज भी भारत के लोकतांत्रिक विवेक की नब्ज़ में पूरी शक्ति से धड़कता है। अखिलेश यादव ने जिस दृढ़ संकल्प के साथ “जेपी की संपूर्ण क्रांति को पूर्ण करने” की बात कही है, वह केवल एक राजनीतिक घोषणा या चुनावी नारा नहीं है — यह भारत के राजनीतिक फलक पर विचारधारा के पुनर्जन्म और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की एक सशक्त घोषणा है। 

जेपी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “जब तक समाज में अन्याय है, तब तक क्रांति अधूरी है।” और आज जब समाजवादी नेतृत्व उसी अधूरी क्रांति को पूरा करने और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को मुख्यधारा में लाने का संकल्प ले रहा है, तो यह स्पष्ट है कि भारत के लोकतंत्र की नई, न्यायोन्मुख यात्रा — जेपी के दिखाए गए सामाजिक न्याय और समानता के रास्ते से होकर ही जाएगी। जेपी की विरासत आज भी राजनीति में नैतिकता और उद्देश्य की मांग करती है।

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