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हार्वर्ड के वैज्ञानिक के साथ चीन में ‘सुपर सोल्जर’ टेक्नोलॉजी पर काम! अमेरिका में सजा काट चुके चार्ल्स लीबर फिर चर्चा में

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टेक्नोलोजी | अमित भास्कर | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग/वॉशिंगटन | 1 मई 2026

चीन और अमेरिका के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच एक नई रिपोर्ट ने हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े रहे अमेरिकी वैज्ञानिक चार्ल्स लीबर अब चीन में एक बड़े रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, जिसका संबंध मानव दिमाग में इलेक्ट्रॉनिक तकनीक जोड़ने से है। यह वही वैज्ञानिक हैं जिन्हें अमेरिका में चीन से जुड़े संबंधों को छिपाने के मामले में दोषी ठहराया गया था। चार्ल्स लीबर को दुनिया के प्रमुख वैज्ञानिकों में गिना जाता है, खासकर ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तकनीक में। यह तकनीक ऐसी है जिससे इंसान के दिमाग और मशीन के बीच सीधा संपर्क बनाया जा सकता है। इससे लकवे के मरीजों को मदद मिल सकती है, गंभीर बीमारियों का इलाज आसान हो सकता है, लेकिन इसके सैन्य इस्तेमाल की भी आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी रक्षा विभाग से जुड़े लोगों का मानना है कि इस तकनीक के जरिए सैनिकों की मानसिक क्षमता और फैसले लेने की गति बढ़ाई जा सकती है।

साल 2021 में अमेरिकी अदालत ने लीबर को इस बात के लिए दोषी पाया था कि उन्होंने चीन के एक सरकारी कार्यक्रम से मिले पैसों और अपने संबंधों की जानकारी अधिकारियों से छिपाई थी। उन्हें दो दिन की जेल, छह महीने नजरबंदी और आर्थिक जुर्माना झेलना पड़ा था। इसके कुछ साल बाद अब वह चीन के शेनझेन शहर में एक नई लैब का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसे सरकार का समर्थन प्राप्त है।

बताया जा रहा है कि यह रिसर्च सेंटर अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। यहां चिप बनाने की उन्नत मशीनें, बड़े स्तर पर रिसर्च के लिए संसाधन और यहां तक कि बंदरों पर परीक्षण की सुविधा भी मौजूद है, जो इस तरह की तकनीक को इंसानों तक पहुंचाने से पहले जरूरी मानी जाती है। अमेरिका में ऐसे प्रयोगों पर सख्त नियम हैं, लेकिन चीन में इस तरह के शोध को ज्यादा खुलकर किया जा रहा है।

इस पूरे मामले ने अमेरिका में चिंता बढ़ा दी है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह दिखाता है कि अमेरिका की तकनीक सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ रही है और चीन इस मौके का फायदा उठा रहा है। उनका मानना है कि जिस वैज्ञानिक को सजा दी गई, वही अब चीन में उसी क्षेत्र में आगे काम कर रहा है, जो भविष्य में सैन्य ताकत को प्रभावित कर सकता है।

चीन ने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तकनीक को अपनी नई विकास योजना में प्राथमिकता दी है और इसे आने वाले वर्षों में बड़ा औद्योगिक क्षेत्र बनाने का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है और दुनिया भर के वैज्ञानिकों को आकर्षित किया जा रहा है।

यह घटनाक्रम सिर्फ एक वैज्ञानिक या एक प्रोजेक्ट की कहानी नहीं है, बल्कि यह अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती तकनीकी प्रतिस्पर्धा की झलक भी दिखाता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह तकनीक मानव जीवन को कितना बदलती है और क्या यह वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करती है।

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