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संदिग्ध जीत के बाद श्मशान-सा सन्नाटा: क्या लोकतंत्र सिर्फ मशीनों और जालसाजी का खेल? जीतने वाले भी नहीं मानते जश्न

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समी अहमद। पटना 16 नवंबर 2025

देश के राजनीतिक इतिहास में कभी ऐसा दौर नहीं आया था जब जीतते हुए दल भी इस कदर खामोश दिखाई दें, जैसे उन्हें अपनी ही जीत पर यकीन न हो। आज का भारत वही भयावह मोड़ देख रहा है — चुनाव हो रहे हैं, जनता बोल रही है, माहौल कुछ और बता रहा है, लेकिन परिणाम आते ही पूरी हवा बदल जाती है। और सबसे अजीब बात यह कि इस ‘चमत्कारी’ जीत के बाद भी जश्न का कोई स्वर नहीं फूटता। हर ओर श्मशान-सी चुप्पी, अविश्वास, संदेह और एक अदृश्य डर का संयोजन दिखाई देता है। विरोधियों का शांत रहना तो समझ आता है, पर विजयी दल भी जब जुलूस निकालने के बजाय अंदर बैठकर ‘नारेटिव मैनेजमेंट मीटिंग’ कर रहा होता है, तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र की नसों में कुछ बहुत गलत इंजेक्ट किया जा रहा है।

बिहार से पहले हरियाणा इसका ताज़ा उदाहरण है — जहां पूरे चुनाव अभियान में सत्ता-विरोधी भावनाएं उफान पर थीं, किसान आक्रोशित थे, युवा बेरोज़गारी से त्रस्त, व्यापारी दबाव में, कर्मचारी असंतुष्ट और आम लोग परिवर्तन की अपेक्षा में थे। माहौल दिन के उजाले जैसा स्पष्ट था कि जनता सत्ता को सबक सिखाने के मूड में है। लेकिन जब परिणाम आए, तो न केवल पूरा समीकरण उलट गया, बल्कि जिस दल को डूबता जहाज़ माना जा रहा था, वह अचानक उफनते समुद्र की लहरों पर तैरता हुआ विजेता बन गया। परिणामों का यह विरोधाभास इतना गहरा था कि पूरा राज्य जश्न के बजाय अविश्वास और शंकाओं के साए में डूब गया।

इन संदिग्ध जीतों के बाद जो सन्नाटा छा जाता है, वह किसी एक राज्य की कहानी नहीं है। यह परिघटना पिछले कई चुनावों में लगातार दिख रही है। बिहार में भी यही हुआ—शुरू से अंत तक जनता का मूड सत्ता-विरोधी, लेकिन परिणाम हथेली पर रखे जादू की तरह सत्ता-पक्ष के पक्ष में झुके हुए। मध्यप्रदेश में यह पैटर्न इतना साफ था कि पत्रकारों और विश्लेषकों ने इसे ‘अलौकिक पुनरुत्थान’ कहा। महाराष्ट्र, राजस्थान, और कर्नाटक में भी सीट-दर-सीट जो खेल हुआ, वह जमीनी राजनीति से मेल नहीं खाता। यह संयोग नहीं हो सकता कि देश के इतने राज्य एक ही किस्म की संदिग्ध जीत और वही ‘सन्नाटा मॉडल’ दिखाएं।

सबसे बड़ा सवाल यह है — जनता उत्सव क्यों नहीं मना रही? यह वही देश है जहाँ जीत का मतलब पटाखे, बैंड-बाजा, आतिशबाज़ी, मिठाइयाँ, मोटरसाइकिल रैली और जुलूस हुआ करता था। पर अब? जश्न गायब। सड़कें शांत। मोहल्ले सुनसान। विजयी दल के कार्यालयों में लाइटें जल रही हैं, पर भीतर का माहौल डर और असहजता से भरा हुआ है। कार्यकर्ता तक यह नहीं समझ पा रहे कि जनता की स्पष्ट राय के विरुद्ध आए परिणाम को कैसे ‘जनादेश’ का चोला पहनाया जाए। और भीतर ही भीतर हर कोई जानता है कि यह जीत जनता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं है — इसलिए जनता उसमें शामिल भी नहीं।

यहां सवाल ईवीएम, चुनाव आयोग, और चुनावी पारदर्शिता का भी है। जब ECI महत्वपूर्ण डेटा पब्लिक नहीं करता, जब बूथवार गड़बड़ियों और VVPAT मismatch की रिपोर्टें दबा दी जाती हैं, जब परिणामों में सामूहिक पैटर्न दिखने लगता है, और जब हर बार वही दल संदिग्ध रूप से लाभ में रहता है — तब यह कहना भी कठिन नहीं कि जनता अब चुनावी प्रक्रिया से खुद को अलग-थलग महसूस कर रही है। लोग खुले में कहने लगे हैं कि अब चुनाव जनता का नहीं, ‘मशीनों का खेल’ बन चुके हैं। और यह अविश्वास इस कदर बढ़ चुका है कि परिणाम का उत्सव मनाने के बजाय लोग परिणाम का अर्थ समझने में लगे हैं।

सबसे डरावना दृश्य वह होता है जब विजेता दल भी अपने कार्यकर्ताओं को यह भरोसा नहीं दिला पाता कि जीत असली है। जब जीत कोई उल्लास नहीं पैदा करती, बल्कि सवालों की बाढ़ लाती है, तब वह जीत लोकतंत्र के ताबूत की कील बन जाती है। यह स्थिति सिर्फ़ राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि उस मूलभूत विश्वास का टूटना है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है — कि “जनता की आवाज़ अंतिम है।”

अगर जनता की आवाज़ और नतीजों की भाषा अलग हो गई हो,अगर विजेता दल को भी जश्न मनाने में शर्म आ रही हो, अगर कार्यकर्ता तक यह न मान पाए कि जीत जनता की है, तो फिर यह पूछना ज़रूरी है — वास्तव में जीत रहा कौन है? और हार रहा कौन?

आज देश का लोकतंत्र इस मोड़ पर खड़ा है जहाँ जीत के शोर की बजाय हार की खामोशी गूंज रही है। संदिग्ध जीतों के बाद यह श्मशान-सा सन्नाटा सिर्फ़ एक राजनीतिक घटना नहीं — यह एक चेतावनी है। और यह चेतावनी कह रही है:

“अगर जनता की खुशी न दिखे, तो समझ लो लोकतंत्र कहीं और लिखा जा रहा है — जनता के हाथों में नहीं।”

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