चुनाव आयोग की चर्चा जब भी होती है — खासकर तब जब उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं — तो दृश्य हमेशा एक जैसा होता है: भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) तुरंत फ्रंटलाइन पर आ जाते हैं, जैसे उन्हें किसी महान अपराध का बचाव करना हो। विपक्ष जब सवाल उठाता है या डेटा सामने लाता है — जैसे राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर हरियाणा में 25 लाख फर्जी वोटों का आरोप लगाया — तो बीजेपी तुरंत खड़ी हो जाती है, शब्दों की गोलियाँ चलाती है, मीडिया पर प्रहार करती है और स्वयं को निष्पादनकर्ता से ज्यादा पीड़ित पक्ष बना देती है। यह सिलसिला दिखाता है कि जब भी सत्ता की जिम्मेदारी और सत्ता के लिए वोटों की संख्या की पारदर्शिता पर बात आती है — सत्ता पक्ष तुरंत बचाव की मुद्रा में आ जाता है।
यह सिर्फ भाषण नहीं — यह उस प्रणाली का उद्घोष है जो कहती है: “हम सिस्टम के रक्षक हैं, हम प्रणाली के प्रहरी हैं, पर हमें खुद सवालों का सामना नहीं करना।” जब चुनाव आयोग पर आरोप लगते हैं कि उसने फर्जी वोटरों को सूची में शामिल किया, पहचान की जाँच नहीं की, या वोटर लिस्ट में बड़े घोटाले हुए — तो आयोग खुद जवाब देने की बजाय तय करता है कि सवाल उठाने वाले को बदनाम किया जाए। और यह बदनाम करने का काम कौन करता है? वही दल जिनसे फायदा होता है — बीजेपी। जैसा कि मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है — “ब्राज़ीलियन मॉडल 22 बार वोट दे गई” का दावा राहुल गांधी ने किया था। जब आरोप इतनी स्पष्ट हों, तो उनकी जांच सिर्फ सहायक नहीं — जरूरी हो जाती है। पर जिस आयोग से हम निष्पक्षता की उम्मीद करते हैं, वह तुरंत तथ्य जुटाने की बजाय राजनीतिक तथ्यों का सामना करने में विफल दिख रहा है।
और फिर आती है बीजेपी की ‘आँख मिचौली’ रणनीति। सवाल उठते ही पार्टी तुरंत इस तरह सामने आती है जैसे उसे चोट लगी हो। वो कहती है कि विपक्ष “धार्मिक विभाजन की राजनीति” कर रहा है, “देश विरोधी ताकतों” के साथ मिलकर काम कर रहा है, और “युवा पीढ़ी को बहका रहा है”। इस तरह आरोप लगाने वाले को चरित्रहीन बनाने की कोशिश होती है — ताकि मुख्य विषय स्वचालित रूप से बदल जाए और जनता का ध्यान मुख्य मुद्दे से हट जाए। इस पैंतरेबाज़ी में दोष निकल जाता है वास्तविक भ्रष्टाचार का, और बच जाता है सिस्टम का दोष।
समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें — जब चुनाव आयोग बिका हुआ ठहरा दिया जाए, तो सिर्फ एक संस्था पर सवाल नहीं है — पूरा लोकतंत्र पर सवाल है। जब सत्ता पक्ष यथास्थित व्यवस्था के अंदर घुसपैठ कर जाए और वोटर लिस्ट, पहचान प्रणाली, और मतदाता की संख्याओं के मूल नियमों को बदल दे — तो जनता का वोट सिर्फ एक प्रतीक बन जाता है, अधिकार नहीं। यही वजह है कि यदि हम आज खामोश रहे, तो कल हमारी आवाज़ निकलते ही कहीं खो जाएगी। संघर्ष यही है — सत्ता की भाषा बदलने का, सत्ता के खेल उजागर करने का, और अंत में वोटर से सत्ता तक की यात्रा को बहकाने नहीं देने का।




