राहुल गांधी ने जब हरियाणा चुनाव में वोट चोरी की बात की तो शायद लोगों ने इसे सामान्य चुनावी बयानबाज़ी समझा होगा, लेकिन जब उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में फर्जी वोट की तस्वीरें और उदाहरण दिखाने शुरू किए, तो मामला अचानक बेहद अजीब और गंभीर मोड़ ले गया। सबसे विस्फोटक खुलासा उस वक्त हुआ जब राहुल गांधी ने ये बताया कि हरियाणा की वोटर लिस्ट में एक ब्राज़ीलियन पेशेवर मॉडल का चेहरा भी अलग-अलग भारतीय नामों के साथ शामिल है, और उस मॉडल के नाम पर एक या दो नहीं, बल्कि 22 वोट डाले गए। यह सुनकर कई रिपोर्टर थोड़ी देर के लिए हक्के-बक्के रह गए — आखिर किस आधार पर एक विदेशी नागरिक, जिसने भारत में कदम तक न रखा हो, अचानक हरियाणा के लोकतंत्र की निर्णायक भूमिका निभाने लगी?
राहुल गांधी ने कहा कि इस मॉडल का चेहरा कम से कम दस अलग-अलग बूथों पर इस्तेमाल किया गया। उन बूथों पर वह कभी सीमा बन गई, कभी रश्मि, कभी स्वीटी — और हर नाम पर उसने नागरिक अधिकार पाकर वोट डाला। किसी भी दृष्टि से यह किसी भी तरह की तकनीकी गलती नहीं मानी जा सकती, क्योंकि एक ही फोटो बार-बार अलग पहचान के साथ डेटा में तभी डाली जा सकती है जब पूरी मशीनरी किसी विशेष “फायदे” की दिशा में काम कर रही हो। यह “फोटो पहचान” का नहीं — बल्कि लोकतंत्र की पहचान का अपराध है। क्या ऐसा संभव है कि एक विदेशी मॉडल भारत के चुनाव का उतना अधिकार रखती हो जितना हरियाणा का आम वोटर? यह सिर्फ चिंता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर गहरी चोट है।
राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट कहा — “हम कोई कहानी नहीं सुना रहे, यह डिजिटल अपराध के पक्के सबूत हैं। अगर चुनाव आयोग चाहे, तो एक ही क्लिक में पता लगा सकता है कि कितनी तस्वीरें दोहराई गई हैं, कितने नाम फर्जी हैं। मगर चुनाव आयोग यह क्यों नहीं करता?” यह सवाल जितना सीधा है, उतना ही डराने वाला भी। क्योंकि जब लोकतंत्र का पहरेदार ही अपनी ड्यूटी से नज़रें फेर ले, तो फिर सत्ता के भूखे गिद्ध किसी भी सीमा तक जाकर जनादेश को निगल सकते हैं। राहुल गांधी ने सीधे कहा — “यह कोई बूथ-लेवल की धांधली नहीं है, यह एक सेंट्रलाइज़्ड ऑपरेशन है — और यह योजना केवल एक पार्टी के हित में चल रही है।” उन परतों को खोलते हुए उन्होंने बताया कि फर्जी वोटरों की यह फौज एक संगठित, राज्यव्यापी, डिजिटल नेटवर्क का परिणाम है।
इस पूरे प्रकरण में जो बात सबसे अधिक दिलचस्प और खतरनाक है, वह यह कि यह घटना किसी जालसाजी की सामान्य परिभाषा से परे जाती है। यह लोकतंत्र के सबसे पवित्र अधिकार — वोट — की फैक्टरी सेटिंग बदल देने जैसा है। यह वह स्तर है जहाँ वोटर अब नागरिक नहीं रहता — एक डेटा यूनिट बन जाता है, जिसे आवश्यकतानुसार लगाया, हटाया, बदला और क्लोन किया जा सकता है। लोकतंत्र का यह “डेटा क्लोनिंग सिस्टम” ही असल में सबसे डरावनी सच्चाई है। इसमें किसी भी नागरिक की पहचान इतनी मामूली हो जाती है कि उसकी वास्तविक उपस्थिति से अधिक महत्व उसकी नकली प्रोफाइल की उपस्थिति ले लेती है। इस स्थिति में किसी भी सरकार की वैधता पर सवाल उठना अनिवार्य हो जाता है।
यहीं से एक और गंभीर प्रश्न जन्म लेता है — यदि एक ब्राजीलियन मॉडल को बिना उसकी जानकारी के हरियाणा की वोटर सूची में शामिल किया जा सकता है, तो कोई भी भारतीय नागरिक किस भरोसे पर कह सकता है कि उसकी पहचान और मत का दुरुपयोग नहीं किया जा रहा? यह मुद्दा किसी राजनीतिक दल की सीटें बढ़ाने या घटाने का नहीं — यह इस बात का है कि भारत का भविष्य कौन लिख रहा है? वास्तविक मतदाता या कोई सॉफ़्टवेयर ऑपरेटर? यह किसी एक राज्य की समस्या नहीं — यह एक संकेत है कि तकनीक और सत्ता जब गलत हाथों में मिल जाती है, तो देश के 140 करोड़ मतदाता भी एक क्लिक से पराजित कर दिए जाते हैं।
राहुल गांधी की इस चेतावनी को हल्के में लेना उस चुप्पी को बढ़ावा देना होगा जिसकी वजह से इतिहास में तानाशाही उभरती है। उन्होंने कहा — “यह सिर्फ कांग्रेस की नहीं, भारत की लड़ाई है।” और यह कथन मात्र नारा नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की सुरक्षा की मांग है। एक विदेशी मॉडल का भारतीय लोकतंत्र में दखलदार बन जाना एक प्रतीक है — प्रतीक इस बात का कि अगर तंत्र को नहीं रोका गया, तो हमारे वोट की ताकत सिर्फ एक कल्पना बनकर रह जाएगी, और हमारा लोकतंत्र एक कृत्रिम वास्तविकता में बदल जाएगा, जहाँ परिणाम पहले तय होते हैं और चुनाव बाद में। यही कारण है कि यह रिपोर्ट दिलचस्प होते हुए भी अत्यंत भयावह है — क्योंकि इसमें मनोरंजन नहीं, एक सच्चाई छिपी है जो हम सबका भविष्य तय कर सकती है।




