अरिंदम बनर्जी | कोलकाता | 13 जनवरी 2026
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी पर ऐसा सीधा और तीखा हमला बोला है, जिसने देश के लोकतंत्र की जड़ों को हिला कर रख दिया है। ममता बनर्जी का आरोप है कि बंगाल में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं और यह कोई तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सोची-समझी राजनीतिक साजिश है। उनका कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर चुनाव आयोग ने बीजेपी के AI टूल का इस्तेमाल किया और उसी के जरिए वोटरों को सूची से बाहर किया गया, ताकि चुनाव से पहले ही नतीजे अपने हिसाब से मोड़ दिए जाएं।
ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ शब्दों में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त देश को जवाब दें—उन्हें यह अधिकार किसने दिया कि वे हजारों-लाखों नागरिकों से उनका वोट छीन लें। उन्होंने आरोप लगाया कि खास तौर पर शादीशुदा महिलाओं को निशाना बनाया गया, जिन्होंने शादी के बाद अपना उपनाम बदला। उनके नाम वोटर लिस्ट से गायब कर दिए गए। ममता ने तीखा सवाल दागा—क्या शादी करना अब गुनाह हो गया है? क्या महिला का वोट सिर्फ कुंवारी रहने तक ही मान्य है? उन्होंने इसे महिलाओं के सम्मान और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया।
मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यह संस्था अब स्वतंत्र संवैधानिक संस्था नहीं रही, बल्कि बीजेपी के एजेंट की तरह काम कर रही है। बिना नोटिस, बिना कारण बताए नाम काटे जा रहे हैं और SIR के नियम रोज बदले जा रहे हैं। ममता बनर्जी का आरोप है कि चुनाव आयोग अब संविधान से नहीं, बल्कि व्हाट्सएप मैसेज और बीजेपी के फरमानों से चल रहा है। उन्होंने कहा कि जब नियम हर दिन बदलेंगे, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे—अपने वोट पर या सत्ता की मर्जी पर?
ममता बनर्जी ने बंगाल के साथ खुले भेदभाव का आरोप भी लगाया। उन्होंने पूछा कि जब बिहार में SIR के दौरान निवास प्रमाण पत्र मान्य है, तो बंगाल में उसे क्यों खारिज किया जा रहा है। सिर्फ बंगाल में ही माइक्रो-ऑब्जर्वर क्यों तैनात किए गए, जबकि SIR के नियमों में इसकी कोई इजाज़त नहीं है। उनका कहना है कि यह सब इस बात का साफ सबूत है कि बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि यहां बीजेपी चुनावी तौर पर कमजोर है और जनता का समर्थन उसके साथ नहीं है।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि “नामों में विसंगति” का बहाना शुरू में SIR प्रक्रिया में था ही नहीं। इसे बाद में जोड़ा गया, ताकि वोट काटने को जायज़ ठहराया जा सके। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग ने डेटा सुधार के नाम पर बीजेपी के तकनीकी टूल और AI सिस्टम का सहारा लिया, जिससे पूरी प्रक्रिया संदिग्ध हो गई है। ममता ने सवाल उठाया कि जब चुनाव आयोग खुद अपने डेटा पर भरोसा नहीं कर सकता, तो वह देश में निष्पक्ष चुनाव कराने का दावा कैसे कर सकता है?
इस पूरे मामले ने देशभर में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या चुनाव आयोग अब भी लोकतंत्र का रक्षक है, या सत्ता का सेवक बन चुका है? विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ बंगाल का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश में लोकतंत्र को कमजोर करने की एक बड़ी रणनीति है—जहां पहले जांच एजेंसियों का इस्तेमाल हुआ और अब सीधे वोट के अधिकार पर हमला किया जा रहा है।
ममता बनर्जी ने चेतावनी दी कि बंगाल झुकेगा नहीं और चुप नहीं बैठेगा। उन्होंने कहा कि अगर जनता से वोट देने का अधिकार छीना गया, तो यह सिर्फ एक राज्य की राजनीतिक लड़ाई नहीं होगी, बल्कि देश के लोकतंत्र को बचाने की निर्णायक लड़ाई होगी। उन्होंने चुनाव आयोग को याद दिलाया कि उसे संविधान के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, न कि बीजेपी के IT सेल या AI टूल के प्रति।




