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भारत के उन नेताओं के नाम बड़ा संदेश, जो उद्योगपतियों के सामने नतमस्तक हैं

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एबीसी डेस्क 3 जनवरी 2026

दुनिया की राजनीति में कभी-कभी कुछ भाषण, कुछ चेहरे और कुछ वाक्य ऐसे उभरते हैं, जो सीमाओं को लांघकर सीधे जनमानस को झकझोर देते हैं। ज़ोहरान ममदानी को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा संदेश भी ऐसा ही है। यह सिर्फ न्यूयॉर्क या अमेरिका की राजनीति की चर्चा नहीं है—यह दरअसल भारत के उस राजनीतिक वर्ग के लिए आईना है, जो लोकतंत्र को जनसेवा नहीं, बल्कि चंद कॉरपोरेट घरानों की सेवा का माध्यम बना चुका है।

वायरल हो रहे भाषण में कहा गया संदेश—कि सरकार अरबपतियों या ओलिगार्क्स को नहीं, बल्कि आम लोगों को जवाबदेह होगी—आज भारत में इसलिए गूंज रहा है क्योंकि यहां आम आदमी खुद को सत्ता के केंद्र से लगातार बाहर महसूस कर रहा है। भारत में चुनाव होते हैं, सरकारें बनती हैं, लेकिन नीतियों की दिशा तय होती दिखती है—बोर्डरूम में, कॉरपोरेट दफ्तरों में, और बंद दरवाज़ों के पीछे। आम आदमी सिर्फ आंकड़ा बनकर रह जाता है।

लोकतंत्र बनाम कॉरपोरेटतंत्र

भारत में समस्या यह नहीं है कि उद्योगपति हैं। समस्या यह है कि उद्योगपतियों को राष्ट्र से ऊपर बिठा दिया गया है। हवाई अड्डे हों, बंदरगाह हों, बिजली, खनन, मीडिया या डेटा—हर जगह वही नाम, वही चेहरे, वही घराने। सवाल यह है कि क्या सरकार जनता के लिए फैसले ले रही है या कुछ गिने-चुने लोगों की संपत्ति और ताकत बढ़ाने के लिए?

ज़ोहरान ममदानी के नाम से जुड़ा संदेश भारत में इसलिए चुभता है क्योंकि यहां का आम आदमी भी यही सुनना चाहता है—कि कोई नेता खुलकर कहे, “हम अरबपतियों के गुलाम नहीं हैं।” लेकिन दुर्भाग्य से भारत में ऐसा कहने वाले नेताओं को या तो हाशिये पर डाल दिया जाता है, या देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग और न जाने किन-किन तमगों से नवाज़ दिया जाता है।

पहचान से ज्यादा नीति की बात

यह चर्चा सिर्फ इसलिए नहीं हो रही कि ज़ोहरान भारतीय मूल के हैं, मुस्लिम हैं, या उनकी मां मीरा नायर और पिता महमूद ममदानी जैसे प्रतिष्ठित नाम हैं। असल चर्चा उनकी राजनीति की भाषा को लेकर है—जो साफ, बेबाक और वर्ग-पक्षधर है। कामगार, किरायेदार, बस में सफर करने वाला आदमी, बच्चे की देखभाल से जूझती मां—यही उनकी राजनीति का केंद्र बताया जा रहा है।

भारत में इसके उलट, नेता आम आदमी को “लाभार्थी” कहकर संबोधित करते हैं—मानो अधिकार कोई एहसान हो। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन—सब कुछ धीरे-धीरे बाजार के हवाले किया जा रहा है। सवाल उठाने वाला आदमी “विकास विरोधी” कहलाता है।

भारत के नेताओं के लिए सबक

यह संदेश भारत के उन नेताओं के लिए है जो मंच से राष्ट्रवाद की बात करते हैं, लेकिन नीतियां लिखते वक्त कॉरपोरेट लॉबी की भाषा बोलते हैं। जो गरीब को मुफ्त राशन देकर चुप कराना चाहते हैं, लेकिन उसे सम्मानजनक रोज़गार, सस्ती शिक्षा और सुलभ स्वास्थ्य देने से कतराते हैं।

अगर लोकतंत्र को सच में मजबूत करना है, तो नेताओं को यह तय करना होगा कि वे किसके प्रतिनिधि हैं—जनता के या उद्योगपतियों के। क्योंकि इतिहास गवाह है: जब सरकारें पूंजी के सामने झुकती हैं, तो अंत में कीमत देश और समाज को ही चुकानी पड़ती है।

ज़ोहरान ममदानी को लेकर वायरल बहस सही-गलत से परे, एक ज़रूरी सवाल खड़ा करती है—क्या राजनीति का मकसद अमीरों की हिफाज़त है या आम आदमी की ज़िंदगी बेहतर बनाना? भारत में इस सवाल पर जितनी तेज़ बहस होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। यही इस पूरे घटनाक्रम का असली संदेश है।

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