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सिर्फ बैन से नहीं चलेगा काम: जर्मनी के वित्त मंत्री बोले—स्कूलों में मोबाइल फोन दुश्मन नहीं, पढ़ाई का नया औज़ार हैं

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क 23 नवंबर 2025

जर्मनी में बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की पहुंच को लेकर बहस तेज होती जा रही है। कई यूरोपीय देशों की तरह यहां भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या स्कूलों में स्मार्टफोन पर सख्त पाबंदी लगा देनी चाहिए या फिर तकनीक को समझदारी से पढ़ाई के साथ जोड़ा जाए। इसी तीखी बहस के बीच जर्मनी के वित्त मंत्री लार्स क्लिंगबाइल ने साफ शब्दों में कहा है कि वह स्कूलों में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हैं। क्लिंगबाइल का मानना है कि महज़ बैन लगा देने से न तो बच्चों की पढ़ाई बेहतर होगी और न ही उन्हें भविष्य की डिजिटल दुनिया के लिए तैयार किया जा सकेगा। उनका तर्क है कि आज की पीढ़ी की सीखने की शैली बदल चुकी है और तकनीक उस बदलाव का अविभाज्य हिस्सा बन गई है, ऐसे में इसे दीवार के बाहर नहीं धकेला जा सकता।

क्लिंगबाइल दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग स्थित विटवॉटर्सरैंड यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान छात्रों और डिजिटल विशेषज्ञों से बातचीत कर रहे थे। यह वही विश्वविद्यालय है जहां डिजिटल टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया जाता है। यहां उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि स्कूलों में मोबाइल फोन या सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना सही रास्ता है। इसके बजाय हमें यह देखना चाहिए कि आधुनिक शिक्षा में ‘गेमिफिकेशन’ जैसी चीज़ों का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।” गेमिफिकेशन से उनका मतलब उन तकनीकों से है जो कंप्यूटर और वीडियो गेम उद्योग में विकसित हुई हैं—जैसे पॉइंट्स, लेवल्स, रिवॉर्ड्स, चुनौतियां और इंटरैक्टिव टास्क—जिन्हें पढ़ाई, हेल्थकेयर या ट्रेनिंग जैसे क्षेत्रों में लगाकर सीखने की प्रक्रिया को ज़्यादा रोचक, प्रभावी और हिस्सेदारी वाला बनाया जा सकता है। क्लिंगबाइल ने तर्क दिया कि स्मार्टफोन और डिजिटल टूल्स को केवल ध्यान भटकाने वाला माध्यम मान लेना गलत है; अगर सही तरीके से प्रयोग किया जाए तो यही साधन बच्चों की एकाग्रता, रचनात्मकता और समस्या सुलझाने की क्षमता को भी मजबूत कर सकते हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तकनीक को शिक्षा से जोड़ने का मतलब यह नहीं है कि पारंपरिक मूल्यों को किनारे कर दिया जाए। क्लिंगबाइल के अनुसार, आधुनिक शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक तरफ तो एकाग्रता, अनुशासन, किताब से पढ़ना, शिक्षक के साथ प्रत्यक्ष संवाद और कक्षा का अनुशासन जैसे पुराने मूल्यों को बचाकर रखा जाए, और दूसरी तरफ डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करके बच्चों को उस दुनिया के लिए तैयार किया जाए जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑनलाइन लर्निंग, ऐप्स और गेमिफाइड प्लेटफॉर्म आम हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा “केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं होनी चाहिए”, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि तकनीक को पूरी तरह बाहर कर देना भी “व्यवहारिक नहीं है।” उनके मुताबिक सवाल मोबाइल फोन को हटाने या रखने का नहीं, बल्कि यह है कि बच्चों को कब, कैसे और किस उद्देश्य से इन उपकरणों का इस्तेमाल सिखाया जाए।

यह बयान ऐसे समय आया है जब जर्मनी के भीतर ही राजनीतिक नेतृत्व में इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स, जिनके साथ क्लिंगबाइल इस सप्ताहांत जोहान्सबर्ग में जी20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं, पहले ही प्राइमरी स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध का समर्थन कर चुके हैं। मैर्त्स ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि छोटे बच्चों को मोबाइल पर खेलने की नहीं, बल्कि गणित, लेखन और पढ़ना सीखने की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी माना था कि 16 वर्ष से कम उम्र के युवाओं के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाना आसान काम नहीं है, लेकिन उन्होंने उन देशों के प्रति “गहरी सहानुभूति” जताई थी जिन्होंने स्कूलों में मोबाइल और सोशल मीडिया पर सख्त कदम उठाए हैं। एक तरफ यह दृष्टिकोण है जो मोबाइल को सीधे-सीधे पढ़ाई का दुश्मन मानता है, वहीं दूसरी तरफ क्लिंगबाइल जैसे नेता हैं जो तकनीक को दुश्मन नहीं, बल्कि संभावित सहयोगी मानकर नीतियों को पुनर्विचार के लिए कह रहे हैं।

क्लिंगबाइल ने जोहान्सबर्ग में छात्रों से बातचीत करते हुए माना कि जर्मनी में इस समय स्कूलों से “स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को कैसे हटाया जाए” इस पर जोरदार राजनीतिक और सामाजिक बहस चल रही है, लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि असली चर्चा सिर्फ बैन की नहीं, बल्कि अनुकूलन की होनी चाहिए। उनके अनुसार, शिक्षा प्रणाली को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि वह नई तकनीकों के साथ खुद को कैसे ढाले, ताकि छात्र न सिर्फ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सीखें, बल्कि उसे जिम्मेदारी से उपयोग करने की समझ भी विकसित कर सकें। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बात करते हुए क्लिंगबाइल ने कहा कि वह इस विषय पर “ज्यादा आशावादी बहस” चाहते हैं। उन्होंने माना कि दुनिया भर में लोग यह डर महसूस कर रहे हैं कि एआई कई नौकरियां खत्म कर देगा, लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि नई नौकरियों और नए कौशलों की मांग भी पैदा होगी। उन्होंने कहा, “हमें दोनों पहलुओं पर बात करनी चाहिए—खतरों पर भी और संभावनाओं पर भी।”

जर्मनी में डिजिटल शिक्षा को लेकर बहस पिछले कई वर्षों से जारी है। विभिन्न राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग को सीमित करने के नियम बनाए हैं। कुछ जगहों पर छात्रों को केवल ब्रेक टाइम या विशेष अनुमति के साथ फोन रखने की छूट है, वहीं कई स्कूलों ने क्लासरूम के अंदर फोन के इस्तेमाल पर लगभग पूरी तरह रोक लगा दी है। दूसरी तरफ कुछ स्कूल और शिक्षा-विशेषज्ञ गेमिफिकेशन, डिजिटल इंटरैक्टिव टूल्स, ऑनलाइन क्विज़, वर्चुअल लैब और ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म जैसे प्रयोग भी कर रहे हैं। हाल के शिक्षा मंचों में यह बहस तेज हुई है कि क्या बच्चों को डिजिटल उपकरणों से पूरी तरह दूर रखना व्यवहारिक है, या बेहतर यह होगा कि उन्हें जिम्मेदारी से और सीमित दायरे में डिजिटल दुनिया का हिस्सा बनना सिखाया जाए।

क्लिंगबाइल ने इसी संदर्भ में कहा कि अगली पीढ़ी को केवल तकनीक चलाना ही नहीं सिखाना, बल्कि यह भी सिखाना ज़रूरी है कि तकनीक का इस्तेमाल सोचने, सहयोग करने, क्रिटिकल थिंकिंग और जिम्मेदार फैसले लेने में कैसे किया जाए। उनका कहना था कि अगर बच्चे सिर्फ स्क्रीन पर गेम खेलने या सोशल मीडिया स्क्रॉल करने के आदी हो जाएं, तो यह शिक्षा की हार होगी; लेकिन अगर उन्हें वही उपकरण पढ़ाई, रिसर्च, टीमवर्क और क्रिएटिव प्रोजेक्ट्स के लिए इस्तेमाल करना सिखाया जाए, तो यह आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी जीत होगी। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे तकनीक को डर के रूप में नहीं, बल्कि विकास के औज़ार के रूप में देखें, और यह समझें कि डिजिटल दुनिया में भी इंसानी मूल्यों, सामाजिक संवेदनशीलता और अनुशासन की जरूरत उतनी ही है जितनी किताबों के ज़माने में थी।

वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो जर्मनी अकेला देश नहीं है जो इस दुविधा से जूझ रहा है। ब्राजील ने जनवरी 2025 में एक संघीय कानून के जरिए सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा और स्कूल परिसर के कई हिस्सों में स्मार्टफोन के सामान्य उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। यूरोप में फ्रांस के कई स्कूलों में मोबाइल फोन पर पहले से पाबंदी लागू है। हंगरी ने सितंबर 2024 से राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लागू किया, जबकि ऑस्ट्रिया ने मई 2025 से प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूलों में मोबाइल और स्मार्टवॉच जैसे उपकरणों पर रोक की घोषणा की। ऑस्ट्रेलिया ने भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया तक पहुंच पर सख्त नियम अपनाए हैं। इन उदाहरणों को देखते हुए जर्मनी में प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाले लोग कहते हैं कि अगर दूसरे देश बच्चों को स्क्रीन से बचाने के लिए सख्त कदम उठा सकते हैं तो जर्मनी पीछे क्यों रहे। इसके जवाब में क्लिंगबाइल और उनके समर्थक तर्क देते हैं कि हर समाज को अपनी शिक्षा नीति अपने सामाजिक ढांचे, डिजिटल तैयारियों और भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनानी होगी; केवल दूसरे देशों की नकल कर लेने से समस्या हल नहीं होगी।

आखिर में बहस यहीं आकर टिकती दिख रही है कि क्या स्कूल का काम बच्चों को तकनीक से बचाना है या उन्हें तकनीक के साथ जीने का सलीका सिखाना है। क्लिंगबाइल जैसे नेताओं का मानना है कि टेक्नोलॉजी को पूरी तरह बंद कर देने की नीति आसान तो लग सकती है, लेकिन यह न तो यथार्थवादी है और न दीर्घकालिक समाधान। वहीं, प्रतिबंध के समर्थक कहते हैं कि कम से कम शुरुआती उम्र में बच्चों का ध्यान पढ़ाई, खेल और सामाजिक कौशल पर होना चाहिए, ना कि स्क्रीन पर। जर्मनी में यह बहस अभी अपने चरम पर है और यह साफ है कि आने वाले समय में शिक्षा नीति, डिजिटल अधिकारों और बच्चों के हितों के बीच संतुलन खोजने की कोशिश और भी तेज होगी। फिलहाल इतना तय है कि मोबाइल फोन अब सिर्फ एक गैजेट नहीं, बल्कि शिक्षा, राजनीति और समाज के बीच खिंची एक नई रेखा बन चुका है, जिसके आर-पार जाने का रास्ता हर देश अपने तरीके से तलाश रहा है।

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