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स्मार्टफोन से आगे, स्मार्ट दिल की ज़रूरत — आधुनिक भारत को विकास के साथ संस्कारों की भी ज़रूरत

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9 अक्टूबर 2025

भारत आज एक तेज़ रफ़्तार वाले परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। हर दिशा में विकास की चमक है — नई सड़कों पर रफ़्तार, डिजिटल इंडिया की ताकत, बुलेट ट्रेन के सपने, चाँद पर पहुँचने की कामयाबी और आत्मनिर्भर भारत की गर्जना। यह नया भारत अब दुनिया के सामने एक आर्थिक और तकनीकी शक्ति के रूप में उभर रहा है। लेकिन इसी बीच एक गंभीर सवाल उठता है — क्या केवल आर्थिक तरक्की ही हमें “महान भारत” बना सकती है? क्या ऊँची इमारतें, तेज़ इंटरनेट और बड़ी कंपनियाँ ही किसी राष्ट्र की श्रेष्ठता का पैमाना हैं? जवाब है — नहीं। भारत का असली उत्थान तभी होगा जब उसकी रफ़्तार के साथ उसकी रूह भी आगे बढ़े। जब विकास के साथ संस्कार भी समानांतर चलें।

आधुनिक जीवनशैली ने भारत को सुविधाएँ दी हैं, लेकिन साथ ही उसने संवेदनाएँ कम कर दी हैं। आज के लाइफ़स्टाइल में तेज़ी है, ग्लैमर है, सुविधा है — लेकिन कहीं न कहीं शांति और सहजता खो रही है। हम दिनभर स्मार्टफोन से जुड़े हैं, लेकिन एक-दूसरे से कटे हुए हैं। हम तकनीक से मजबूत हुए हैं, पर रिश्तों में कमजोर पड़ गए हैं। हमारी लाइफ़ डिजिटल है, लेकिन दिलों में “ह्यूमन टच” की कमी है। यही वजह है कि इस समय भारत को केवल स्मार्ट सिटी नहीं, बल्कि स्मार्ट सोसाइटी की ज़रूरत है — ऐसी समाज व्यवस्था जिसमें विकास के साथ मूल्य हों, और आधुनिकता के साथ मानवीयता भी।

भारत की असली पहचान केवल विकास की गति में नहीं, बल्कि उसके जीवन मूल्यों में है। हमारी सभ्यता ने हमेशा यह सिखाया कि जीवन का उद्देश्य केवल “कमाना” नहीं, बल्कि “कमाई को सही दिशा में लगाना” है। रामायण, गीता, उपनिषद, कुरान और गुरुग्रंथ सभी यही बताते हैं — कि धन और ज्ञान तभी सार्थक हैं जब वे मानवता के हित में लगें। आज जब दुनिया भौतिकता की अंधी दौड़ में भाग रही है, भारत को अपने प्राचीन संतुलन की याद दिलानी होगी — जहाँ विज्ञान और वेदांत दोनों एक साथ चलते हैं।

विकास और संस्कार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे शरीर को भोजन चाहिए और आत्मा को शांति, वैसे ही राष्ट्र को तकनीक चाहिए, पर साथ में मूल्य भी। अगर हम केवल तकनीकी रूप से आगे बढ़ेंगे लेकिन नैतिक रूप से गिरेंगे, तो हमारा विकास अधूरा रहेगा। एक भ्रष्ट अफ़सर, एक बेईमान व्यापारी या एक संवेदनाहीन नेता — चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न हो — समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ता है। इसलिए भारत को चाहिए “Character with Competence” — यानी ऐसा विकास जो केवल दिमाग नहीं, दिल से भी संचालित हो।

भारत का इतिहास यही कहता है कि जब भी इस भूमि ने संस्कारों को प्राथमिकता दी, तब वह स्वर्णयुग में पहुँचा।

 चाणक्य ने नीतियों में चरित्र को प्रधानता दी, अशोक ने युद्ध के बाद करुणा को अपनाया, विवेकानंद ने आधुनिकता और अध्यात्म को जोड़ा। अब यह युग युवाओं का है — और युवाओं पर दोहरी जिम्मेदारी है। उन्हें दुनिया की दौड़ में भारत को आगे ले जाना है, लेकिन अपनी संस्कृति की जड़ों से भी जुड़े रहना है। अगर भारत का युवा केवल “ट्रेंडिंग कल्चर” में खो जाएगा और अपनी “सांस्कृतिक पहचान” भूल जाएगा, तो विकास खोखला रह जाएगा। लेकिन अगर वही युवा तकनीक, सेवा भावना और देशभक्ति को साथ लेकर चले, तो भारत दुनिया के लिए “लाइफस्टाइल मॉडल” बन सकता है — ऐसा मॉडल जो भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों को साथ लेकर चलता है।

संस्कार का अर्थ केवल पूजा या कर्मकांड नहीं है। संस्कार का अर्थ है — ईमानदारी, संवेदना और जिम्मेदारी। जब कोई बच्चा सड़क पर कचरा नहीं फेंकता, जब कोई युवक अपनी सीट किसी बुजुर्ग को देता है, जब कोई व्यापारी ईमानदारी से टैक्स भरता है, जब कोई नागरिक पेड़ लगाता है — यही आधुनिक संस्कार हैं। यही वह आचरण है जो किसी राष्ट्र को टिकाऊ बनाता है। भारत का सपना “5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी” बनने का नहीं, बल्कि “5 ट्रिलियन वैल्यूज़” वाला समाज बनने का होना चाहिए।

आज के दौर में भारत के पास अनोखा अवसर है — अमेरिका और चीन जहां केवल तकनीक के बल पर आगे बढ़ रहे हैं, भारत विज्ञान और विवेक दोनों का संगम बन सकता है। भारत को “मशीनों का देश” नहीं, “मानवता का देश” बनना है। और यह तभी होगा जब हम स्मार्टफोन के साथ स्मार्ट दिल भी रखेंगे — जो केवल सोचें नहीं, बल्कि महसूस भी करें।

हमारा लक्ष्य केवल “विकसित भारत” बनाना नहीं, बल्कि “संस्कारवान भारत” रचना होना चाहिए — ऐसा भारत जहाँ शिक्षा नौकरी का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम बने; जहाँ राजनीति सत्ता नहीं, सेवा का प्रतीक हो; जहाँ समाज में दिखावे की जगह समरसता और सहयोग हो; और जहाँ जीवन में अंतहीन दौड़ नहीं, बल्कि दिशा और उद्देश्य हो। यही भारत का सच्चा “लाइफस्टाइल अपग्रेड” है — जो गाड़ियों, गैजेट्स और ग्लैमर से नहीं, बल्कि गौरव, गरिमा और गुणों से परिभाषित होता है। भारत को आज तेज़ इंटरनेट से ज़्यादा ऊँचे इरादों और गहरे संस्कारों की ज़रूरत है, क्योंकि विकास हमें ऊपर उठाता है — लेकिन संस्कार हमें इंसान बनाए रखते हैं।

 

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