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मणिपुर, अरुणाचल और नागालैंड के हिस्सों में AFSPA छह महीने बढ़ा

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नई दिल्ली, 27 सितम्बर 2025

केंद्र सरकार ने एक बार फिर पूर्वोत्तर भारत के संवेदनशील इलाकों में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) की अवधि छह महीने के लिए बढ़ाने का निर्णय लिया है। गृह मंत्रालय (MHA) ने गुरुवार को अधिसूचना जारी कर मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के कुछ हिस्सों को “अशांत क्षेत्र” घोषित करते हुए AFSPA को 30 मार्च 2026 तक लागू रखने का आदेश दिया है।

गृह मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा है कि इन इलाकों में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की स्थिति को देखते हुए AFSPA का जारी रहना जरूरी है। अधिसूचना में यह भी कहा गया कि हाल के महीनों में उग्रवादी गतिविधियों, हथियारों की तस्करी और सीमा पार से घुसपैठ की घटनाओं में वृद्धि हुई है, जिसके चलते सुरक्षा बलों को अतिरिक्त अधिकारों की जरूरत है।

AFSPA के तहत सुरक्षा बलों को विशेष शक्तियां मिलती हैं, जिनमें बिना वारंट के तलाशी और गिरफ्तारी करने, संदिग्धों पर कार्रवाई करने और आवश्यक होने पर बल प्रयोग तक का अधिकार शामिल है। यही कारण है कि यह कानून हमेशा से विवाद का विषय रहा है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि AFSPA से नागरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है और अक्सर इसके तहत फर्जी मुठभेड़ों और बल प्रयोग के आरोप लगते हैं।

पूर्वोत्तर में कई स्थानीय संगठनों और नागरिक समाज समूहों ने इस फैसले पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि AFSPA को धीरे-धीरे हटाने के बजाय इसे फिर से बढ़ाना केंद्र सरकार के “सैन्य समाधान” पर भरोसे को दर्शाता है। मणिपुर में हालिया जातीय हिंसा और तनाव के बाद AFSPA की वापसी की उम्मीदें जगी थीं, लेकिन इस निर्णय ने लोगों की नाराजगी और बढ़ा दी है।

विपक्षी दलों ने भी इस फैसले पर केंद्र सरकार को घेरा है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, “केंद्र सरकार के पास पूर्वोत्तर की समस्याओं का कोई राजनीतिक समाधान नहीं है। AFSPA को बढ़ाना वहां के लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। सरकार को वार्ता और विश्वास बहाली की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।” वहीं भाजपा का कहना है कि यह कदम पूरी तरह सुरक्षा स्थिति को ध्यान में रखकर उठाया गया है और आम नागरिकों की सुरक्षा इसकी प्राथमिकता है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि AFSPA को हटाने से पहले वहां की स्थिति का स्थिर होना जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इसे हमेशा के लिए स्थायी समाधान न बनाया जाए। उनका कहना है कि राजनीतिक संवाद और विकास योजनाओं के जरिए ही पूर्वोत्तर में स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है।

 

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