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राहुल गांधी को जनता ने नकार दिया, तो बीजेपी को कांग्रेस की सरकारें गिराने की जरूरत क्यों पड़ी?

किसी नेता को एक चुनाव की हार से हमेशा के लिए खारिज नहीं किया जा सकता

लेख | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 8 नवंबर 2026

भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प विरोधाभास है। एक तरफ कुछ लोग लगातार यह दावा करते हैं कि राहुल गांधी को देश की जनता ने पूरी तरह नकार दिया है, दूसरी तरफ बीजेपी और उसके शीर्ष नेतृत्व की राजनीति में राहुल गांधी और कांग्रेस लगातार चर्चा के केंद्र में बने रहते हैं। सवाल यह है कि अगर राहुल गांधी सचमुच राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो चुके हैं, तो फिर कांग्रेस को कमजोर करने, उसके विधायकों को तोड़ने और उसकी सरकारों को सत्ता से बाहर करने के लिए इतनी राजनीतिक ऊर्जा क्यों खर्च करनी पड़ी?

2019 की हार को पूरी कहानी बताना सही नहीं

यह सच है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। बीजेपी ने 303 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस सिर्फ 52 सीटों पर सिमट गई थी। राहुल गांधी अमेठी से भी चुनाव हार गए थे। कांग्रेस की न्यूनतम आय योजना यानी NYAY और उसके चुनावी घोषणापत्र को मतदाताओं का अपेक्षित समर्थन नहीं मिला था।

लेकिन क्या लोकतंत्र में एक चुनाव का नतीजा किसी नेता के राजनीतिक भविष्य का स्थायी फैसला बन जाता है? अगर ऐसा होता तो भारतीय राजनीति में कई ऐसे नेता और दल दोबारा कभी खड़े नहीं हो पाते, जिन्होंने एक समय बड़ी चुनावी पराजय देखी थी।

2019 का जनादेश अपनी जगह सच है, लेकिन 2024 का जनादेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

बीजेपी को पूर्ण बहुमत क्यों नहीं मिला?

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 99 सीटें हासिल कीं, जबकि बीजेपी 240 सीटों पर रह गई। बीजेपी अपने दम पर बहुमत से दूर रही और उसे सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों के समर्थन की जरूरत पड़ी। यह 2019 के मुकाबले बदली हुई राजनीतिक स्थिति थी।

राहुल गांधी ने इस चुनाव में बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, संविधान और जातिगत जनगणना जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखा। उनकी सभाओं में उमड़ी भीड़ और कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया कि पार्टी का राजनीतिक आधार समाप्त नहीं हुआ है।

यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि हर भीड़ वोट में बदल गई या हर मुद्दे ने चुनावी नतीजों को अकेले प्रभावित किया। लेकिन कांग्रेस की बढ़ी हुई सीटें और बीजेपी का बहुमत से दूर रह जाना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव जरूर था।

कांग्रेस की सरकारें और दल-बदल की राजनीति

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना, महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों के भीतर टूट, कर्नाटक में सरकारों का बदलना और दूसरे राज्यों में विधायकों के दल-बदल ने भारतीय लोकतंत्र में एक बड़ा सवाल खड़ा किया है।

विपक्ष लगातार बीजेपी पर आरोप लगाता रहा है कि वह निर्वाचित सरकारों को कमजोर करने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त और केंद्रीय जांच एजेंसियों के दबाव का इस्तेमाल करती है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने CBI और ED की कार्रवाई को भी राजनीतिक दबाव से जोड़कर सवाल उठाए हैं। बीजेपी इन आरोपों को खारिज करती रही है।

लेकिन लोकतंत्र के लिए असली सवाल यह है कि क्या जनता के चुने हुए जनादेश को दल-बदल और राजनीतिक जोड़तोड़ के जरिए पलट देना स्वीकार्य होना चाहिए? किसी भी पार्टी की सरकार हो, विधायकों की खरीद-फरोख्त और सत्ता के लिए राजनीतिक जोड़तोड़ लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसे को कमजोर करते हैं।

राहुल गांधी को लेकर विरोधाभास

राहुल गांधी की आलोचना करना हर नागरिक और राजनीतिक दल का अधिकार है। उनके चुनावी फैसलों, राजनीतिक रणनीति और विचारों पर सवाल उठाए जा सकते हैं। 2019 की हार को भी उनके राजनीतिक सफर का हिस्सा माना जाना चाहिए।

लेकिन 2019 के नतीजों को बार-बार दोहराकर 2024 के जनादेश और उसके बाद कांग्रेस के राजनीतिक विस्तार को नकार देना निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषण नहीं है।

अगर राहुल गांधी अप्रासंगिक हैं तो उनकी सभाओं, बयानों और राजनीतिक अभियानों पर इतनी चर्चा क्यों होती है? अगर कांग्रेस समाप्त हो चुकी है तो उसके चुनावी प्रदर्शन और संगठन को लेकर बीजेपी के राजनीतिक नेतृत्व की चिंता क्यों दिखाई देती है?

इन सवालों का जवाब नारों से नहीं, चुनावी आंकड़ों और राजनीतिक घटनाक्रम से देना चाहिए।

जनता का फैसला किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं

भारतीय मतदाता किसी एक पार्टी या नेता के स्थायी समर्थक नहीं होते। वे परिस्थितियों, मुद्दों, सरकार के प्रदर्शन और अपनी अपेक्षाओं के आधार पर फैसले बदलते हैं। 2019 में जनता ने बीजेपी को बड़ा जनादेश दिया। 2024 में उसी जनता ने बीजेपी को अपने दम पर बहुमत नहीं दिया और कांग्रेस की सीटों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।

यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। जनता किसी नेता को सत्ता देती है तो उससे सत्ता वापस लेने का अधिकार भी रखती है।

इसलिए राहुल गांधी को केवल 2019 की हार के आधार पर खारिज करना उतना ही अधूरा है, जितना 2024 के नतीजों को उनकी व्यक्तिगत जीत का अकेला प्रमाण मान लेना।

राजनीति में अंतिम फैसला किसी सोशल मीडिया अभियान, किसी पार्टी के प्रवक्ता या किसी समर्थक की टिप्पणी से नहीं होता। फैसला मतदाता करता है। और भारतीय मतदाता यह साबित कर चुके हैं कि उनका फैसला बदल सकता है।

राहुल गांधी को पसंद करना या नापसंद करना व्यक्तिगत राजनीतिक पसंद हो सकती है, लेकिन उनके राजनीतिक भविष्य का फैसला करने का अधिकार केवल जनता के पास है।

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