राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 नवंबर 2026
इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले दो संगठनों—इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC)—के सोशल मीडिया अकाउंट बंद कराने की कोशिश का मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा। यहां सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X ने अदालत को बताया कि दिल्ली पुलिस के नाम से भेजे गए अकाउंट ब्लॉक करने के नोटिस असली नहीं थे, बल्कि किसी जालसाज ने पुलिस अधिकारी बनकर ये फर्जी संदेश भेजे थे।
मामले की सुनवाई शुक्रवार, 6 नवंबर को न्यायमूर्ति अमित महाजन की अदालत में हुई। X की ओर से पेश वकील ने बताया कि कंपनी की आंतरिक जांच में यह सामने आया कि दोनों संगठनों के अकाउंट बंद करने के लिए भेजे गए संदेश दिल्ली पुलिस की वास्तविक आधिकारिक मांग नहीं थे। प्लेटफॉर्म ने अदालत को यह भी भरोसा दिलाया कि उसने इन नोटिसों पर कोई कार्रवाई नहीं की है और आगे भी IFF तथा SFLC के अकाउंट बंद नहीं किए जाएंगे।
RSS पर पोस्ट को लेकर भेजे गए थे नोटिस
दोनों संगठनों की याचिकाओं में कहा गया था कि उन्हें भेजे गए इन संदेशों का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बारे में कथित मानहानिकारक पोस्ट से था। दिल्ली पुलिस के नाम से जारी बताए गए नोटिसों में सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक करने की मांग की गई थी।
लेकिन X की आंतरिक जांच ने इन संदेशों की प्रामाणिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिया। कंपनी ने अदालत को स्पष्ट किया कि ये वास्तविक पुलिस नोटिस नहीं थे। यानी पुलिस के नाम का इस्तेमाल करके ऐसे संदेश भेजे गए, जिनके आधार पर दो डिजिटल अधिकार संगठनों के अकाउंट बंद हो सकते थे।
हाईकोर्ट में मामला पहुंचने के बाद X के इस बयान ने पूरे विवाद की दिशा बदल दी।
अकाउंट बंद नहीं होंगे, X का अदालत में आश्वासन
सुनवाई के दौरान X ने स्पष्ट किया कि उसने फर्जी नोटिसों के आधार पर दोनों संगठनों के अकाउंट ब्लॉक नहीं किए। कंपनी ने आगे भी ऐसा न करने का आश्वासन दिया।
इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं पर चल रही कार्यवाही समाप्त कर दी। इस मामले में सबसे अहम तथ्य यह है कि जिस पुलिस कार्रवाई के नाम पर अकाउंट बंद कराने की मांग की गई थी, उसे X ने अपनी जांच में फर्जी पाया।
डिजिटल अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बड़ा सवाल
यह मामला केवल दो संगठनों के सोशल मीडिया अकाउंट का नहीं है। यह सवाल भी उठाता है कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी बनकर फर्जी नोटिस भेज दे और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उसकी सत्यता जांचे बिना कार्रवाई कर दे, तो किसी भी नागरिक, पत्रकार, संस्था या संगठन की ऑनलाइन आवाज को आसानी से दबाया जा सकता है।
IFF और SFLC जैसे संगठन इंटरनेट पर नागरिक अधिकारों, डिजिटल स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं। ऐसे संगठनों के अकाउंट बंद कराने के लिए पुलिस के नाम का कथित फर्जी इस्तेमाल डिजिटल व्यवस्था में पहचान और आधिकारिक संचार की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है।
अब सबसे जरूरी सवाल यह है कि दिल्ली पुलिस के नाम पर फर्जी नोटिस किसने भेजे, उनका उद्देश्य क्या था और पुलिस की पहचान का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति या समूह की पहचान के लिए क्या कार्रवाई होगी?
पुलिस के नाम पर फर्जी नोटिस भेजकर किसी की आवाज बंद कराने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। हाईकोर्ट में X का बयान इस मामले का अहम पहलू है, लेकिन फर्जी नोटिस भेजने वाले की पहचान और जवाबदेही तय होना भी उतना ही जरूरी है।



