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दिल्ली की हवा में जहर! क्या सालों तक प्रदूषण में सांस लेना बना सकता है फेफड़ों के कैंसर का कारण?

WHO की कैंसर एजेंसी ने वायु प्रदूषण और PM को माना Group-1 कार्सिनोजेन; PM2.5 के महीन कण DNA को नुकसान पहुंचाकर बढ़ा सकते हैं कैंसर का खतरा, धूम्रपान नहीं करने वाले भी जोखिम से बाहर नहीं

स्वास्थ्य | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 नवंबर 2026

दिल्ली में सर्दियों की शुरुआत होते ही हवा की गुणवत्ता लोगों की रोजमर्रा की चिंता बन जाती है। सुबह घर से निकलने से पहले AQI देखना, मॉर्निंग वॉक टालना, बच्चों और बुजुर्गों को बाहर जाने से रोकना और मास्क लगाकर निकलना अब आम बात हो गई है। लेकिन प्रदूषण का खतरा केवल आंखों में जलन, खांसी, सांस फूलने या अस्थमा तक सीमित नहीं है। एक और गंभीर सवाल है—अगर कोई व्यक्ति सालों या दशकों तक प्रदूषित हवा में सांस लेता रहे, तो क्या उसे फेफड़ों का कैंसर हो सकता है?

वैज्ञानिक शोध का जवाब है—हां, लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। यह खतरा केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं है। प्रदूषित हवा में मौजूद बेहद महीन कण शरीर के भीतर जाकर कोशिकाओं और उनके DNA को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसका असर धीरे-धीरे सामने आ सकता है।

वायु प्रदूषण को कैंसर पैदा करने वाला कारक मान चुका है WHO

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने 2013 में बाहरी वायु प्रदूषण और उसमें मौजूद पार्टिकुलेट मैटर यानी सूक्ष्म कणों को Group 1 carcinogen की श्रेणी में रखा था।

इस श्रेणी का अर्थ है कि इंसानों में कैंसर पैदा करने की क्षमता के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं। वायु प्रदूषण के मामले में इसका सबसे मजबूत संबंध फेफड़ों के कैंसर से स्थापित हुआ है।

यह वर्गीकरण केवल किसी आशंका या अनुमान पर आधारित नहीं है, बल्कि इंसानों पर हुए अध्ययनों और प्रयोगशाला में मिले वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित है।

PM2.5 के कण इतने खतरनाक क्यों हैं?

प्रदूषण में मौजूद PM2.5 ऐसे सूक्ष्म कण हैं जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच सकते हैं।

इन कणों के स्रोतों में वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियां, ईंधन जलना और दूसरे प्रदूषणकारी स्रोत शामिल हैं।

इनका खतरा केवल फेफड़ों में जमा होने तक सीमित नहीं है। कुछ कणों में मौजूद रासायनिक तत्व और विषैले पदार्थ शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव तथा लंबे समय तक सूजन पैदा कर सकते हैं। इससे कोशिकाओं के DNA को नुकसान पहुंचने और आनुवंशिक बदलाव होने की आशंका बढ़ती है। ऐसे बदलाव कैंसर के विकास की प्रक्रिया में भूमिका निभा सकते हैं।

धूम्रपान नहीं करते, फिर भी हो सकता है फेफड़ों का कैंसर

आमतौर पर फेफड़ों के कैंसर को सिगरेट और तंबाकू से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन प्रदूषित हवा का जोखिम उन लोगों के लिए भी मौजूद है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया।

जुलाई 2025 में अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) ने एक शोध के निष्कर्ष जारी किए। इसमें कभी धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों के फेफड़ों के कैंसर ट्यूमर का जीनोम विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि महीन कणों वाले वायु प्रदूषण के संपर्क का संबंध कैंसर को बढ़ावा देने वाले आनुवंशिक बदलावों से था।

इस अध्ययन ने इस बात को और मजबूत किया कि फेफड़ों के कैंसर का जोखिम समझने के लिए केवल धूम्रपान को देखना पर्याप्त नहीं है। आसपास की हवा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। NCI +1

कितना बढ़ता है कैंसर का खतरा?

2024 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 88 कोहोर्ट अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। इसमें PM2.5 के स्तर में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि के साथ फेफड़ों के कैंसर से मृत्यु के जोखिम में लगभग 11.8 प्रतिशत वृद्धि का संबंध पाया गया।

यह आंकड़ा किसी एक व्यक्ति के कैंसर होने की संभावना नहीं बताता, बल्कि विभिन्न अध्ययनों में लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क और कैंसर से मृत्यु के बीच देखे गए सांख्यिकीय संबंध को दर्शाता है।

क्या प्रदूषण से कैंसर का खतरा तुरंत बढ़ जाता है?

नहीं। प्रदूषण और कैंसर का संबंध मुख्य रूप से लंबे समय तक संपर्क से जुड़ा है। इसका मतलब यह नहीं कि कुछ दिन खराब AQI में सांस लेने से किसी व्यक्ति को कैंसर हो जाएगा।

जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति कितने समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहा, प्रदूषण का स्तर कितना था, उसमें कौन-कौन से विषैले तत्व मौजूद थे और उसकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति क्या है।

धूम्रपान, उम्र, पारिवारिक इतिहास और कार्यस्थल पर मौजूद दूसरे रासायनिक जोखिम भी फेफड़ों के कैंसर की आशंका को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या मास्क और एयर प्यूरीफायर बचा सकते हैं?

प्रदूषण के संपर्क को कम करने के लिए कुछ सावधानियां उपयोगी हो सकती हैं—

* AQI बहुत खराब होने पर खुले में व्यायाम और लंबी सैर से बचें।

* बाहर निकलते समय सही फिटिंग वाला N95 या समकक्ष प्रमाणित मास्क इस्तेमाल करें।

* घर और कार्यालय में HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर उपयोगी हो सकता है।

* घर के अंदर धूम्रपान, अगरबत्ती और अन्य धुआं पैदा करने वाली गतिविधियों को सीमित रखें।

* बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस या हृदय संबंधी बीमारी से जूझ रहे लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

* लगातार खांसी, खांसी में खून, बिना कारण वजन कम होना, सीने में दर्द या सांस लेने में परेशानी हो तो डॉक्टर से जांच कराएं।

इन उपायों से प्रदूषण का संपर्क कम किया जा सकता है, लेकिन कोई मास्क या एयर प्यूरीफायर कैंसर से पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।

दिल्ली के लिए सबसे बड़ा सवाल

दिल्ली और NCR में वायु प्रदूषण की समस्या को केवल सर्दियों की मौसमी परेशानी मानना पर्याप्त नहीं है। जब लाखों लोग साल-दर-साल प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य का दीर्घकालिक संकट बन जाता है।

कैंसर का खतरा केवल अस्पतालों, दवाओं और इलाज से जुड़ा विषय नहीं है। इसका संबंध उस हवा से भी है जिसे हर व्यक्ति रोजाना सांस के साथ अपने शरीर में लेता है।

व्यक्तिगत सावधानियां जरूरी हैं, लेकिन प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण, स्वच्छ परिवहन, औद्योगिक उत्सर्जन में कमी, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और बेहतर शहरी नियोजन के बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

साफ हवा केवल सुविधा नहीं, जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार है। दिल्ली के लिए सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि आज AQI कितना है, बल्कि यह भी है कि आने वाली पीढ़ियां दशकों तक कैसी हवा में सांस लेने को मजबूर होंगी।

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