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यूपी में वोटर लिस्ट से नाम कटवाने के लिए फर्जी फॉर्म-7 का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, चुनाव आयोग से मांगी रिपोर्ट

चुनाव आयोग का दावा—नियमों के खिलाफ दाखिल कोई फॉर्म स्वीकार नहीं किया गया; कांग्रेस सांसद ने SIR के दौरान बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का आरोप लगाया

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 31 अक्टूबर 2026

उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान वोटरों के नाम कटवाने के लिए फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में चुनाव आयोग से रिपोर्ट मांगी है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने स्वीकार किया कि उसे कुछ ऐसे फॉर्म-7 मिले थे, जिन्हें गलत और फर्जी बताया गया। हालांकि आयोग का दावा है कि नियमों का उल्लंघन कर दाखिल किए गए किसी भी फॉर्म को स्वीकार नहीं किया गया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने शुक्रवार, 30 अक्टूबर को चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि गलत तरीके से दाखिल किए गए फॉर्म की जानकारी मिलते ही अधिकारियों ने तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए और नियमों के विरुद्ध पाए गए फॉर्म खारिज कर दिए गए।

फॉर्म-7 के दुरुपयोग पर विवाद

फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। इस फॉर्म के जरिए किसी मतदाता का नाम हटाने की मांग की जा सकती है। लेकिन यदि इस प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल हो, तो किसी योग्य मतदाता का नाम भी सूची से हटने का खतरा पैदा हो सकता है।

कांग्रेस के एक सांसद ने उत्तर प्रदेश में SIR प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े और फॉर्म-7 के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। इसी शिकायत के संदर्भ में मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने उठा।

दो करोड़ से अधिक नाम हटे, अंतिम सूची में 13.39 करोड़ मतदाता

उत्तर प्रदेश में SIR की प्रक्रिया अप्रैल में पूरी हुई थी। अंतिम मतदाता सूची के मुताबिक, राज्य में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 13.39 करोड़ हो गई। पुनरीक्षण के दौरान दो करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जबकि अंतिम सूची में कुल मतदाताओं की संख्या में करीब 84 लाख की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के कारण मतदाता सूची की शुद्धता, पारदर्शिता और पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

अब चुनाव आयोग को देनी होगी सफाई

सुप्रीम कोर्ट की ओर से रिपोर्ट मांगे जाने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग फर्जी फॉर्म-7 की शिकायतों, उन्हें खारिज करने की प्रक्रिया और अधिकारियों की ओर से उठाए गए सुधारात्मक कदमों के बारे में क्या जानकारी देता है।

चुनाव आयोग का कहना है कि नियमों के खिलाफ दाखिल फॉर्म स्वीकार नहीं किए गए। हालांकि, अदालत के सामने पेश होने वाली रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायतें कितनी गंभीर थीं, कितने गलत फॉर्म सामने आए और उन्हें रोकने के लिए किस स्तर पर कार्रवाई की गई।

मतदाता का नाम सुरक्षित रखना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी

मतदाता सूची में नाम होना केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा विषय है। किसी भी योग्य मतदाता का नाम फर्जी शिकायत या गलत आवेदन के आधार पर नहीं हटना चाहिए। इसलिए ऐसी हर शिकायत की निष्पक्ष जांच और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की रिपोर्ट पर रहेंगी। यह रिपोर्ट बताएगी कि उत्तर प्रदेश में SIR के दौरान फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग को लेकर उठे सवालों पर आयोग ने क्या कदम उठाए और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की गई।

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