अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/तेहरान | 29 अक्टूबर 2026
पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की दहलीज पर खड़ा दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने ईरान पर नए और बड़े हमले की तैयारी कर रखी है। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के बाद ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया जा सकता है। बताया गया है कि मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सेना राष्ट्रपति ट्रंप की मंजूरी मिलने के चार दिनों के भीतर अभियान शुरू करने की स्थिति में है।
इस संभावित कार्रवाई को पहले की सीमित सैन्य रणनीति से अलग बताया जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, नए अभियान का उद्देश्य केवल ऐसे बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना नहीं होगा, जिसकी मरम्मत ईरान कुछ ही समय में कर सके। हालांकि, ट्रंप ने अभी तक नए हमले को अंतिम मंजूरी नहीं दी है। इसलिए सैन्य कार्रवाई की योजना और वास्तविक हमले के बीच अंतर करना जरूरी है।
चुनाव के बाद हमले की तैयारी, ट्रंप के सामने राजनीतिक चुनौती
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन के भीतर इस बात पर चर्चा जारी है कि ईरान के खिलाफ अगला अभियान कब शुरू किया जाए। कुछ अधिकारियों का मानना है कि सवाल यह नहीं रह गया है कि हमला होगा या नहीं, बल्कि यह है कि ट्रंप कब इसकी अनुमति देंगे। दूसरी ओर, प्रशासन से जुड़े कुछ अधिकारियों ने कार्रवाई को नवंबर के मध्यावधि चुनाव के बाद तक टालने की बात कही है।
ईरान युद्ध अमेरिकी राजनीति में भी ट्रंप के लिए चुनौती बनता जा रहा है। युद्ध के आर्थिक प्रभाव, सैन्य खर्च और क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर अमेरिकी नागरिकों में नाराजगी बढ़ने की बात सामने आई है। ऐसे समय में चुनाव से पहले बड़े सैन्य अभियान का फैसला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील हो सकता है।
ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट, ईरान युद्ध बना बड़ा मुद्दा
रिपोर्ट में उद्धृत रॉयटर्स/इप्सोस सर्वेक्षण के अनुसार, 26 अक्टूबर को ट्रंप की अनुमोदन रेटिंग 32% थी, जबकि इससे पिछले सप्ताह यह 31% के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई थी। प्यू रिसर्च सेंटर के एक अलग सर्वेक्षण में करीब 65% अमेरिकी नागरिकों ने ईरान संघर्ष से निपटने के ट्रंप के तरीके पर असहमति जताई।
इन आंकड़ों के बीच ट्रंप ने टेक्सास के लब्बॉक में एक चुनावी रैली के दौरान कहा कि ईरान युद्ध तब समाप्त होगा, जब वह चाहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध का अंत उचित तरीके से होना चाहिए और इसके लिए निर्णायक परिणाम जरूरी है।
नेतन्याहू का दबाव, अमेरिका-इजराइल के बीच बातचीत
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान के खिलाफ अमेरिका के साथ संयुक्त सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू करने के पक्ष में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों के बीच इस विषय पर बातचीत जारी है। नेतन्याहू ने इजराइल के चुनाव से पहले ही ट्रंप को संयुक्त हमले के लिए मनाने की कोशिश की थी, लेकिन उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति ने हरी झंडी नहीं दी।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर रणनीतिक सहमति के बावजूद सैन्य कार्रवाई के समय और उसके स्वरूप पर फैसले आसान नहीं हैं। इजराइल ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के लिए अधिक कठोर कदम चाहता है, जबकि अमेरिकी प्रशासन को सैन्य, आर्थिक और घरेलू राजनीतिक परिणामों का भी हिसाब रखना पड़ रहा है।
ईरान युद्ध पर 47 अरब डॉलर से अधिक खर्च
रिपोर्ट के अनुसार, 28 अक्टूबर तक ईरान युद्ध पर अमेरिका का खर्च 47 अरब डॉलर से अधिक हो चुका था। इतने बड़े खर्च के बावजूद यदि संघर्ष फिर व्यापक रूप लेता है, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और सरकारी वित्त पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। सैन्य अभियान के विस्तार से हथियारों, रसद, सैनिकों की तैनाती और क्षेत्रीय सुरक्षा पर खर्च बढ़ने की आशंका है।
इसका असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रह सकता। पश्चिम एशिया में युद्ध बढ़ने पर तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा हो सकती है। भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए भी यह चिंता का विषय होगा, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि से महंगाई और आयात बिल पर दबाव पड़ सकता है।
क्या पश्चिम एशिया एक और बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है?
अमेरिकी सेना की कथित तैयारी, नेतन्याहू का दबाव और ट्रंप प्रशासन के भीतर चल रही चर्चा ने क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। लेकिन फिलहाल नए हमले की अंतिम मंजूरी की पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन के फैसले, इजराइल की रणनीति और ईरान की प्रतिक्रिया यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि हालात सैन्य टकराव की ओर बढ़ेंगे या कूटनीतिक रास्ते की गुंजाइश बनेगी।
नवंबर के मध्यावधि चुनाव अब इस संकट का एक अहम पड़ाव बन गए हैं। सवाल केवल यह नहीं है कि अमेरिका ईरान पर हमला करेगा या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या किसी नए सैन्य अभियान से क्षेत्रीय सुरक्षा मजबूत होगी या पश्चिम एशिया और पूरी दुनिया को एक और लंबे, महंगे और विनाशकारी संघर्ष में धकेल दिया जाएगा।



