राष्ट्रीय/ पश्चिम बंगाल | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 28 अक्टूबर 2026
19 लोगों की मौत के बाद भी अगर जांच एजेंसियों को घटनास्थल की पूरी तस्वीर जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह केवल एक हादसे की कहानी नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर सवाल है। कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में 17 अक्टूबर को हुई भगदड़ की जांच में सामने आया है कि वहां लगे 30 CCTV कैमरों में से 17 काम नहीं कर रहे थे। यानी आधे से अधिक कैमरे केवल दिखावे के लिए लगे थे। जिस जगह हजारों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए थी, वहां निगरानी व्यवस्था ही नाकाम मिली।
19 लोगों की जान चली गई। अब जांचकर्ता उपलब्ध फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पंडाल की बनावट के आधार पर घटनाक्रम जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि पंडाल के निकास द्वार पर लगे तीन कैमरों में से दो बंद थे। भगदड़ जैसी आपात स्थिति में यही वह जगह होती है, जहां प्रभावी निगरानी और सुरक्षित निकासी सबसे ज्यादा जरूरी होती है।
CCTV लगे थे, लेकिन रिकॉर्डिंग कहां गई?
जांच में सामने आया कि पंडाल में लगे 30 कैमरों की रिकॉर्डिंग दो DVR में दर्ज होने की बात कही गई थी। पुलिस ने दोनों DVR जब्त किए, लेकिन एक DVR से केवल 13 कैमरों की रिकॉर्डिंग ही बरामद हो सकी। इससे जांच की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
अब फॉरेंसिक विशेषज्ञ काम कर रहे कैमरों की फुटेज का आपस में मिलान कर रहे हैं, ताकि भगदड़ से पहले और उसके दौरान हुई घटनाओं की कड़ियां जोड़ी जा सकें। लेकिन सवाल यह है कि जब इतने बड़े धार्मिक आयोजन में CCTV लगाए गए थे, तो उनकी कार्यशीलता और रिकॉर्डिंग की नियमित जांच किसकी जिम्मेदारी थी?
कैमरे लगाना ही सुरक्षा नहीं है। उन्हें चालू रखना, रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखना और आपात स्थिति में तुरंत निगरानी सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। 19 लोगों की मौत के बाद यदि जरूरी फुटेज ही उपलब्ध नहीं है, तो सुरक्षा इंतजामों की गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए।
निकास द्वार पर ही निगरानी कमजोर
जांच से पता चला है कि पंडाल के निकास द्वार पर लगे तीन कैमरों में से दो काम नहीं कर रहे थे। भगदड़ में बाहर निकलने के रास्ते सबसे संवेदनशील स्थान होते हैं। वहां कैमरों का बंद होना भीड़ की आवाजाही, धक्का-मुक्की और लोगों के फंसने की स्थिति समझने में बड़ी बाधा बन गया है।
पुलिस अब उपलब्ध फुटेज के साथ घायलों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर घटनाक्रम तैयार कर रही है। अब तक 25 घायलों से पूछताछ किए जाने की जानकारी सामने आई है। पुलिस पंडाल की रूपरेखा, प्रवेश और निकास के इंतजाम तथा भीड़ संभालने की योजना की भी जांच कर रही है।
यह मामला सिर्फ तकनीकी खराबी तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या आयोजन से पहले सुरक्षा व्यवस्था की पर्याप्त जांच हुई थी और क्या निकास मार्गों को आपात स्थिति के लिए तैयार रखा गया था?
एक घोषणा, दहशत और भगदड़
पुलिस की शुरुआती जांच के मुताबिक, पंडाल में भगदड़ मचने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। हालांकि, जांचकर्ताओं का मानना है कि सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली से की गई एक भ्रामक घोषणा निर्णायक साबित हुई। लोगों को बताया गया कि पंडाल गिरने वाला है। इस संदेश से श्रद्धालुओं में दहशत फैल गई और लोग तेजी से बाहर निकलने के लिए दौड़ पड़े।
पुलिस अधिकारी के अनुसार, यदि यह भ्रामक घोषणा नहीं होती, तो हालात शायद संभाले जा सकते थे और इतनी बड़ी संख्या में जानें जाने से बच सकती थीं। यह जांच का महत्वपूर्ण पहलू है कि ऐसी घोषणा किसने की, किस परिस्थिति में की गई और उसे रोकने या सही सूचना देने के लिए कोई व्यवस्था मौजूद थी या नहीं।
भीड़भाड़ वाले धार्मिक आयोजन में गलत सूचना भी जानलेवा साबित हो सकती है। ऐसे स्थानों पर स्पष्ट संवाद, प्रशिक्षित कर्मचारियों और आपातकालीन प्रतिक्रिया की व्यवस्था अनिवार्य है। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि पंडाल के भीतर पर्याप्त रोशनी थी या नहीं और उसकी बनावट भीड़ की सुरक्षित आवाजाही के अनुकूल थी या नहीं।
सात गिरफ्तारियां, लेकिन जवाबदेही के सवाल कायम
17 अक्टूबर को हुई इस त्रासदी के बाद कोलकाता पुलिस ने चोरबागान दुर्गा पूजा समिति के प्रमुख पदाधिकारियों सहित सात लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस आयोजन से जुड़े लोगों, पंडाल डिजाइन करने वाले कलाकार, घायलों और मृतकों के परिजनों से बातचीत कर रही है।
गिरफ्तारियां जांच का एक हिस्सा हैं, लेकिन 19 लोगों की मौत के मामले में जवाबदेही तय करने के लिए यह पता लगाना जरूरी है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी किसके पास थी, कैमरे क्यों बंद थे, रिकॉर्डिंग क्यों उपलब्ध नहीं हुई और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कौन-से इंतजाम किए गए थे।
सिर्फ गिरफ्तारियों से यह सुनिश्चित नहीं होगा कि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो। इसके लिए सुरक्षा मानकों, आयोजन की अनुमति, निगरानी व्यवस्था और आपातकालीन योजना की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल
कोलकाता की यह त्रासदी सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। धार्मिक आयोजनों में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के बावजूद यदि निगरानी कैमरे बंद हों, निकास द्वार की रिकॉर्डिंग अधूरी हो और एक भ्रामक घोषणा से भगदड़ मच जाए, तो सुरक्षा इंतजामों की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी खामियों के लिए सीधे तौर पर सरकार जिम्मेदार थी। लेकिन आयोजन की सुरक्षा, निगरानी और आपातकालीन तैयारियों की जवाबदेही तय करना संबंधित प्रशासन और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
19 मौतों का जवाब केवल जांच रिपोर्ट नहीं हो सकता। जरूरी है कि जिम्मेदार लोगों की भूमिका स्पष्ट हो, सुरक्षा में हुई चूकों पर कार्रवाई हो और भविष्य के आयोजनों के लिए ठोस मानक लागू किए जाएं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा किसी औपचारिकता, दिखावटी कैमरों या कागजी इंतजामों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।



