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वोट की डकैती पर देश का गुस्सा: लोकतंत्र के गुनहगारों की जवाबदेही तय करो!

मतदाता सूची, नए वोटरों के पंजीकरण और चुनावी सॉफ्टवेयर पर गंभीर सवाल; देश मांग रहा है पूरा हिसाब, जिम्मेदारों पर कठोरतम कानूनी कार्रवाई हो

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026

लोकतंत्र कोई खिलौना नहीं है, जिसे सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी मर्जी से चलाएं। वोट जनता की ताकत है, संविधान की बुनियाद है और सरकार बनाने का अधिकार है। यदि इसी वोट की सुरक्षा करने वाली व्यवस्था के भीतर मतदाता सूची, नए वोटरों के पंजीकरण और चुनावी सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, तो यह सामान्य प्रशासनिक विवाद नहीं—देश के लोकतांत्रिक भरोसे का संकट है।

देश को अब गोलमोल जवाब नहीं चाहिए। उसे पूरा हिसाब चाहिए। किसने क्या फैसला लिया? किस आधार पर लिया? किसकी आपत्ति दर्ज हुई? उस आपत्ति पर क्या कार्रवाई हुई? कितने योग्य मतदाताओं के नाम छूटे या हटे? नए मतदाताओं के पंजीकरण में कहां बाधा आई? मतदाता सूची तैयार करने वाले सॉफ्टवेयर की सुरक्षा और विश्वसनीयता की स्वतंत्र जांच क्यों न हो?

चुनावी व्यवस्था पर सवाल अब दबाए नहीं जा सकते

सामने आए विवरणों के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों ने दस महीनों में 14 बार कुछ फैसलों पर रिकॉर्ड में आपत्तियां दर्ज कीं। इनका संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता जैसे संवेदनशील विषयों से था। गोवा में वैध मतदाताओं के नाम छूटने और फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर भी चिंताएं सामने आईं।

यह सवाल मामूली नहीं हैं। मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम छूटने का मतलब है कि वह अपने सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित हो सकता है। यदि पंजीकरण की प्रक्रिया में अनुचित बदलाव हुए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। और यदि चुनावी सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं, तो स्वतंत्र तकनीकी जांच कराकर उसका निष्कर्ष जनता के सामने रखा जाना चाहिए।

14 बार आपत्ति के बाद भी पूरा हिसाब कहां है?

यदि किसी व्यवस्था के भीतर बार-बार आपत्तियां दर्ज होती हैं, तो उन पर कार्रवाई का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक होना चाहिए। किस अधिकारी ने आपत्ति उठाई, किस स्तर पर निर्णय लिया गया, किन नियमों का सहारा लिया गया और क्या सुधार किए गए—इन सवालों का जवाब देना संस्थागत जिम्मेदारी है।

लोकतंत्र में पारदर्शिता कोई एहसान नहीं है। जनता का विश्वास बनाए रखना संवैधानिक संस्थाओं का कर्तव्य है। यदि प्रक्रिया निष्पक्ष और सुरक्षित है, तो उसके प्रमाण सामने रखे जाएं। यदि गड़बड़ी हुई है, तो उसे छिपाने के बजाय उजागर किया जाए। यदि किसी अधिकारी ने जानबूझकर मतदाताओं के अधिकारों से खिलवाड़ किया है, तो उसे पद और प्रभाव के कारण बचाया नहीं जाना चाहिए।

लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ करने वालों पर कठोरतम कार्रवाई हो

देश की मांग स्पष्ट होनी चाहिए—मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराई जाए। सभी संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं। नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने की प्रक्रिया और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों का पूरा ऑडिट हो। जिन नागरिकों के नाम गलत तरीके से हटे हैं, उनके नाम बहाल करने की समयबद्ध व्यवस्था बने।

यदि जांच में किसी अधिकारी या जिम्मेदार व्यक्ति की ओर से जानबूझकर चुनावी प्रक्रिया में हेराफेरी, रिकॉर्ड से छेड़छाड़ या मतदाताओं के अधिकारों को नुकसान पहुंचाने का अपराध साबित होता है, तो उसके खिलाफ तत्काल मुकदमा चलाया जाए। दोष सिद्ध होने पर कानून में निर्धारित कठोरतम सजा दी जाए। कोई पद, राजनीतिक संबंध या सरकारी कुर्सी किसी को कानून से ऊपर नहीं बना सकती।

लेकिन सजा का फैसला अदालत में प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ है दोषियों को जवाबदेह बनाना—न कि न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार करना।

वोट जनता का है, किसी की जागीर नहीं

मतदाता सूची किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। चुनाव आयोग किसी सरकार या विपक्ष का कार्यालय नहीं, बल्कि संविधान के प्रति जवाबदेह संस्था है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसका वोट सुरक्षित है या नहीं और उसके नाम पर तैयार की जा रही सूची कितनी विश्वसनीय है।

यदि योग्य मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, तो उन्हें बहाल किया जाए। यदि पंजीकरण के नियमों में अनुचित बदलाव हुए हैं, तो उन्हें सुधारा जाए। यदि सॉफ्टवेयर में खामी या दुरुपयोग सामने आता है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो। और यदि किसी ने जानबूझकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाया है, तो उसे कानून के सामने जवाब देना होगा।

देश को चुप्पी नहीं, सच चाहिए। सफाई नहीं, पारदर्शी जांच चाहिए। पद की ढाल नहीं, जवाबदेही चाहिए।

वोट की रक्षा करना लोकतंत्र की रक्षा करना है। जनता के मताधिकार से खिलवाड़ करने वाला कोई भी व्यक्ति जवाबदेही से बचना नहीं चाहिए। लोकतंत्र के साथ विश्वासघात साबित हो जाए, तो कानून के तहत कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। यही जनता के अधिकारों का सम्मान है, यही संविधान की गरिमा है और यही लोकतंत्र को बचाने का रास्ता है।

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