राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 अक्टूबर 2026
दिल्ली का जंतर-मंतर महज एक प्रदर्शन स्थल नहीं रहा, बल्कि पिछले 33 वर्षों से लोकतंत्र में जनता की आवाज़ और सत्ता की जवाबदेही का एक अहम प्रतीक बना रहा है। यहां कभी किसान अपनी मांगों के साथ पहुंचे, कभी छात्र शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ खड़े हुए, कभी कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए जुटे तो कभी आम नागरिकों ने सरकार के फैसलों पर सवाल उठाए। जंतर-मंतर की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि यह सत्ता के केंद्र के करीब था। यहां उठने वाली आवाज़ को अनसुना करना आसान नहीं था। अब इस स्थल की प्रदर्शनकारी पहचान समाप्त किए जाने के बाद यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या विरोध की आवाज़ को राजधानी के केंद्र से दूर करके उसे कमजोर किया जा सकता है?
जंतर-मंतर की अहमियत केवल इस बात में नहीं थी कि वहां प्रदर्शन की अनुमति मिलती थी। उसका महत्व इस बात में भी था कि वह संसद, सरकारी संस्थानों और राजनीतिक सत्ता के करीब था। यहां जुटने वाले लोग अपनी समस्याएं देश के सामने रख सकते थे और सत्ता में बैठे लोगों को उनके वादों की याद दिला सकते थे। जब विरोध सत्ता की आंखों के सामने होता है, तो उसके सवाल सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनते हैं। लेकिन जब प्रदर्शन शहर के किनारे या आम लोगों की पहुंच से दूर निर्धारित स्थानों तक सीमित हो जाते हैं, तो उनके संदेश की पहुंच प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है।
जंतर-मंतर: सत्ता को जनता के सवालों की याद दिलाने वाला मंच
पिछले तीन दशकों में जंतर-मंतर ने अलग-अलग विचारधाराओं और राजनीतिक पक्षों से जुड़े लोगों को अपनी बात रखने का अवसर दिया। यहां होने वाले आंदोलनों में सरकार के समर्थक भी कभी अपनी मांगों के साथ पहुंचे और विरोधी विचार रखने वाले लोग भी। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि सार्वजनिक स्थानों पर असहमति के लिए जगह बनी रहे और नागरिक सरकार की नीतियों पर सवाल उठा सकें।
जंतर-मंतर का इतिहास इस बात की याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने या सरकार बनाने तक सीमित नहीं है। चुनावों के बीच भी नागरिकों को अपनी समस्याएं उठाने, फैसलों का विरोध करने और सत्ता से जवाब मांगने का अवसर चाहिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
जब किसी किसान को अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता, किसी छात्र को शिक्षा व्यवस्था में अन्याय महसूस होता है या किसी कर्मचारी को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो प्रदर्शन उसकी आवाज़ को सार्वजनिक मंच देते हैं। जंतर-मंतर जैसे स्थान इस आवाज़ को राजधानी की राजनीतिक हलचल से जोड़ते रहे हैं।
प्रदर्शन शहर के केंद्र से दूर हुए तो क्या बदलेगा?
जंतर-मंतर की प्रदर्शनकारी पहचान समाप्त किए जाने और विरोध के लिए वैकल्पिक स्थानों पर निर्भरता बढ़ने से सबसे बड़ा सवाल पहुंच का है। यदि प्रदर्शन स्थल आम नागरिकों, पत्रकारों और राजनीतिक प्रतिनिधियों की पहुंच से दूर होगा, तो प्रदर्शनकारियों को अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए अधिक प्रयास करना पड़ सकता है।
राजधानी के केंद्र में होने वाले प्रदर्शन अक्सर मीडिया का ध्यान आकर्षित करते हैं। वहां से गुजरने वाले लोग भी आंदोलन को देखते हैं और उसकी मांगों के बारे में जान पाते हैं। इसके विपरीत, शहर के बाहरी हिस्सों में सीमित पहुंच वाले प्रदर्शन आम लोगों की नजरों से दूर रह सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर प्रदर्शन अपने आप प्रभावी होता है या हर वैकल्पिक स्थल अनुपयुक्त है, लेकिन स्थान का चुनाव किसी आंदोलन की दृश्यता और पहुंच को प्रभावित कर सकता है।
यही वजह है कि प्रदर्शन स्थलों के निर्धारण पर चर्चा केवल यातायात, सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच और सरकार की जवाबदेही जैसे सवाल भी शामिल होने चाहिए।
सुरक्षा और व्यवस्था जरूरी, लेकिन विरोध की जगह भी जरूरी
किसी भी शहर में प्रदर्शन के दौरान यातायात, स्थानीय कारोबार, अस्पतालों तक पहुंच और आम लोगों की आवाजाही प्रभावित नहीं होनी चाहिए। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह इन चिंताओं का समाधान करे। लेकिन इन समस्याओं का समाधान ऐसा भी होना चाहिए, जिससे शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार व्यवहार में कमजोर न पड़े।
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन को सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होता है। इसके लिए पर्याप्त सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल, स्पष्ट अनुमति प्रक्रिया, पारदर्शी नियम और ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिसमें प्रदर्शनकारी अपनी बात रख सकें और आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी भी बाधित न हो।
यदि किसी प्रदर्शन स्थल पर पाबंदियां लगाई जाती हैं, तो यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि लोगों के पास अपनी मांगें उठाने के लिए वास्तविक और सुलभ विकल्प मौजूद हों। केवल किसी दूसरे स्थान का नाम बता देना पर्याप्त नहीं है; उसकी पहुंच, सुविधाएं और सार्वजनिक दृश्यता भी मायने रखती हैं।
लोकतंत्र की परीक्षा असहमति के प्रति रवैये से होती है
जंतर-मंतर का सवाल उस व्यापक बहस से जुड़ता है कि लोकतंत्र में असहमति को कितनी जगह मिलती है। सरकारों के सामने अक्सर विरोध, आलोचना और सार्वजनिक असंतोष का सामना करने की चुनौती होती है। लेकिन नागरिकों के सवालों का जवाब देना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए उचित व्यवस्था करना भी लोकतांत्रिक शासन की जिम्मेदारी है।
संसद का स्वरूप बदल सकता है, राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल के नियम भी बदल सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत नहीं बदलती: जनता के पास सत्ता से सवाल पूछने का रास्ता होना चाहिए।
जंतर-मंतर की पहचान समाप्त किए जाने के बाद अब असली सवाल यह है कि क्या दिल्ली में विरोध के लिए ऐसी जगहें उपलब्ध रहेंगी, जहां नागरिक आसानी से पहुंच सकें, मीडिया उनकी आवाज़ सुन सके और सत्ता को उनकी मांगों का जवाब देना पड़े।
क्योंकि लोकतंत्र में आवाज़ उठाने का अधिकार तभी सार्थक है, जब उस आवाज़ को सुना भी जा सके।



